गुरु ग्रंथ साहिब 498 · Raag Gujri · Guru Arjan Dev Ji
1मैं आठ प्रहर हरि का गुणगान करता रहता हूँ एवं प्रेम-भक्ति द्वारा हरि रस में मस्त रहता हूँ।
2हर्ष एवं शोक दोनों में निर्लेप रहता हूँ तथा अपने रचयिता को पहचान लिया है॥ २॥
3मैं जिस प्रभु का सेवक बना था, उतने ही मेरी रक्षा की है और मेरी सभी युक्तियाँ सम्पन्न हो गई हैं।
4हे नानक ! उस दयालु प्रभु (की दयालता) का मूल्यांकन नहीं बताया जा सकता ॥३॥१॥९॥
5गूजरी महला ५ दुपदे घरु २
6ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
7ईश्वर ने पतितों को भी पवित्र-पावन करके अपना बना लिया है और सारी दुनिया उन्हें प्रणाम करती है।
8अब कोई भी उनके वर्ण एवं जाति के बारे में नहीं पूछता, लोग उनकी चरण-धूलि के अभिलाषी बने हुए हैं।॥ १॥
9हे ठाकुर ! तेरे नाम का ऐसा तेज-प्रताप है कि
10तू समूची सृष्टि का मालिक कहलवाता है तथा अपने भक्तजनों का निराला ही पक्ष करता है॥ १॥ रहाउ ॥
11सत्संगति में नानक को बुद्धि प्राप्त हो गई है और हरि का भजन-कीर्तन करना उसका जीवन का आधार है।
12हरि-कीर्तन से ही नामदेव, त्रिलोचन, कबीरदास एवं रविदास चमार भी मुक्ति प्राप्त कर गए हैं। २॥ १॥ १० ॥
13गूजरी महला ५
14उस परमात्मा को बूझने वाला कोई भी नहीं, उसकी युक्तियों को कौन जान सकता है।
15शिव, ब्रह्मा तथा मुनिजन भी उसकी गति को समझ नहीं सकते॥ १॥
16प्रभु की कथा अगम्य एवं अगाध है.
17यह सुनने में कुछ और है परन्तु समझने में कुछ और ही तरह की है। यह वर्णन एवं कथन करने से परे है॥ १॥ रहाउ॥
18परमात्मा स्वयं ही भक्त है और स्वयं ही स्वामी है। यह अपने आप से ही आसक्त रहता है।
19नानक का प्रभु सारे विश्व में बसा हुआ है और वह उसे सर्वत्र देखता है ॥२॥२॥११॥
20गूजरी महला ५ ॥
21प्रभु के सेवक को कोई सलाह-मशविरा एवं चतुराई कुछ भी नहीं आता।
22जहां-कहीं भी संकट का अवसर बनता है, वहाँ वह हरि का ध्यान करता है॥ १॥
23भक्त-वत्सल होना प्रभु का विरद् है।
24वह अपने सेवकों का बालक की तरह भरण-पोषण करता है और अपने बच्चों की तरह उन्हें लाड लडाता है। ॥ रहाउ ॥
25सेवक ने हरि-कीर्तन गाया है और हरि का कीर्तन ही उसके जप, तप, संयम एवं धर्म-कर्म हैं।
26हे नानक ! सेवक अपने ठाकुर जी की शरण में पड़ा है और उसने उससे अभयदान का सुख पाया है॥ २॥ ३॥ १२॥
27गूजरी महला ५ ॥
28हे प्रिय भक्तजनो ! दिन-रात भगवान की आराधना करो तथा क्षण भर के लिए भी विलम्ब मत करो।
29अपने अभिमान एवं हठ को त्याग कर श्रद्धा से संतों की सेवा करो।॥ १॥
30मोहन प्रभु बड़ा रंगीला है जो मेरे प्राण एवं मान-सम्मान है।
31वह मेरे हृदय के साथ बसता है और उसकी लीला देखकर मेरा मन मुग्ध हो गया है॥ १॥ रहाउ॥
32जिस का सुमिरन करने से मन में आनंद होता है और मन (की जंग) मैल उतर जाती है,
33ऐसे प्रभु के मिलन की महिमा वर्णन नहीं की जा सकती। हे नानक ! उसकी महिमा अनुमान से परे अनंत है॥ २॥ ४॥ १३॥
34गूजरी महला ५ ॥
35जो स्वयं को मुनि, योगी एवं शास्त्रों के ज्ञाता कहलवाते हैं, माया ने उन सभी को अपने वश में किया हुआ है।
36माया की इतनी प्रबलता देखकर त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु, महादेव और तेतीस करोड़ देवी-देवताओं की आश्चर्य की कोई सीमा न रही।॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं