गुरु ग्रंथ साहिब 495 · Raag Gujri
1गूजरी महला ५ चउपदे घरु १
2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
3हे मन ! तू किसलिए सोचता है, जबकि समस्त सृष्टि के प्रबन्ध का उद्यम तो स्वयं अकालपुरुष कर रहा है।
4चट्टानों एवं पत्थरों में जिन जीवों को निरंकार ने पैदा किया है, उनका भोजन भी उसने पहले ही तैयार करके रखा है॥१॥
5हे निरंकार ! जो भी संतों की संगति में जाकर बैठा है वह भव-सागर से पार उतर गया है।
6उसने गुरु की कृपा से परमपद (मोक्ष) प्राप्त किया है और उसका हृदय मानो यूं हो गया जैसे कोई सूखी लकड़ी हरी हो जाती है।॥ १ ॥ रहाउ ॥
7जीवन में माता, पिता, पुत्र, पत्नी व अन्य सम्बन्धीजन में से कोई भी किसी जगह आश्रय नहीं होता।
8प्रत्येक जीव को सृष्टि में पैदा करके निरंकार स्वयं भोग पदार्थ पहुँचाता हे, फिर हे मन ! तू भय किंसलिए करता है ॥ २॥
9कूजों का समूह उड़ कर सैंकड़ों मील दूर चला आता हे और अपने बच्चों को वह पीछे (अपने घोंसले में ही) छोड़ आता है।
10उनको पीछे कोन खाना खिलाता है, कौन खेल खिलाता है, अर्थात् उनका पोषण उनकी माता के बिना कौन करता है, (उत्तर में कहा) उनकी माता के हृदय में अपने बच्चों का स्मरण होता है, वही उनके पोषण का साधन बन जाता है ॥३॥
11(पदम्-शंखादि) समस्त नौ निधियों, (महापुराण श्री मद्भागवत में अंकित) अठ्ठारह सिद्धियाँ निरंकार ने अपनी हथेली पर रखी हुई हैं।
12हे नानक ! ऐसे अकाल-पुरुष पर मैं सदा-सर्वदा बलिहार जाता हूँ, असीम निरंकार का कोई पारावार व अंत नहीं है ॥ ४ ॥ १॥
13गूजरी महला ५ चउपदे घरु २
14ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
15दुनिया के लोग जीवन में कर्मकाण्ड एवं षटकर्म करते रहते हैं,
16लेकिन उनके अन्तर से अहंकार की मेल दूर नहीं होती। गुरु के बिना वे अपने जीवन की बाजी हार जाते हैं। १॥
17हे मेरे ठाकुर ! कृपा करके मुझे बचा लो।
18करोड़ों में से कोई विरला पुरुष ही प्रभु का सेवक है, शेष सभी सांसारिक व्यापारी ही हैं।॥ १ ॥ रहाउ॥
19शास्त्र, वेद, स्मृतियाँ इत्यादि ग्रंथों का विश्लेषण किया है, वे सभी एक ही बात सत्य बताते हैं कि
20गुरु के बिना किसी को भी मोक्ष नहीं मिल सकता चाहे अपने मन में विचार करके देख लो ॥ २ ॥
21यदि कोई मनुष्य चाहे अड़सठ तीर्थों पर स्नान कर ले, चाहे सारी धरती पर भ्रमण कर ले तथा
22यदि वह दिन-रात अनेक शारीरिक पवित्रता के साधन कर ले परन्तु सच्चे गुरु के बिना मोह-माया का अन्धकार दूर नहीं होगा ॥ ३॥
23समूचे जगत में भटकते-भटकते अब हम हरि के द्वार आए हैं।
24प्रभु ने मेरी दुर्मति मिटाकर बुद्धि को उज्ज्वल कर दिया है। हे नानक ! गुरु के माध्यम से भगवान ने मुझे भवसागर से तार दिया है॥ ४॥ १॥ २॥
25गूजरी महला ५ ॥
26हरि का नाम धन ही मेरा जाप, मेरी तपस्या तथा मेरा मनपसंद भोजन है, यह नाम-धन मुझे बहुत भाया है।
27एक क्षण भर के लिए भी मैं परमात्मा को अपने मन से विस्मृत नहीं करता, जिसे मैंने साधुओं की संगति में रहकर पाया है॥ १॥
28हे मेरी माता ! तेरा पुत्र नाम-धन का लाभ कमा कर घर आया है।
29अब में चलते, बैठते, जागते एवं सोते समय भी हरि-नाम धन ही कमाता रहता हूँ॥१॥ रहाउ ॥
30हरि का नाम धन ही मेरा तीर्थ स्नान एवं ज्ञान है और हरि के साथ ही मैंने अपना ध्यान केन्द्रित किया हुआ है।
31हरि के नाम का धन मेरी तुलहा एवं नाव है और हरि-प्रभु ही मुझे संसार-सागर से पार करवाने हेतु जहाज है॥ २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं