सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 494 · Raag Gujri · Guru Raam Daas Ji

1जब हरि-प्रभु को अच्छा लगता है तो वह गुरुमुखों से मिला देता है, जिनके मन को गुरु-सतगुरु की वाणी बड़ी मधुर लगती है।

2गुरु के प्यारे सिक्ख भाग्यवान हैं, जो निर्वाणी प्रभु के द्वारा निर्वाण-पद प्राप्त कर लेते हैं।॥ २॥

3गुरु की सत्संगति हरि की प्यारी है, जिन्हें हरि-प्रभु का नाम मीठा एवं मधुर लगता है।

4जिन्हें सतिगुरु की संगति एवं साथ प्राप्त नहीं हुआ, उन भाग्यहीन पापियों को यमदूत निगल जाता है॥ ३॥

5यदि कृपालु प्रभु स्वयं कृपा धारण करे तो गुरुमुखों के मिलाने से प्राणी ईश्वर से मिल पाता है।

6नानक भी गुणों वाली वाणी (गुरुवाणी) ही बोलता है। गुरुवाणी के माध्यम से जीव हरि के नाम में समा जाता है॥ ४॥ ५॥

7गूजरी महला ४ ॥

8मेरी कामना है कि जिसने महापुरुष सतगुरु, हरि-प्रभु को पा लिया है, वह मुझे भी उपदेश देकर हरि से मेरा प्रेम लगा दे।

9जो भाग्यवान इन्सान हरि के नाम का ध्यान करता है, उसका मन एवं तन शीतल हो जाता है और उसका मुरझाया हुआ सारा शरीर ही प्रसन्न हो जाता है॥ १॥

10हे मेरे भाई ! मेरी कामना है कि कोई ऐसा संत आकर मुझे मिले, जो मेरे अन्तर्मन में हरि का नाम बसा दे।

11जो मुझे मेरे प्रभु की हरि कथा सुनाएगा, मैं अपने प्राण, मन एवं तन उस प्रीतम को अर्पित कर दूँगा ॥ १॥ रहाउ॥

12गुरु के उपदेश द्वारा मुझे धैर्य, धर्म एवं हरि-प्रभु प्राप्त हुए हैं। हरि-नाम द्वारा मैं अपना चित्त हरि से लगाए रखता हूँ।

13सतिगुरु की वाणी अमृत वचन हैं, जो मनुष्य वाणी उच्चरित करता है, उसके मुँह में अमृत टपकता है॥ २॥

14हरि का नाम बड़ा पावन है, जिसका सिमरन करने से मन को अहंत्व की मैल नहीं लगती। जो व्यक्ति गुरु के उपदेश से प्रभु-नाम का जाप करता है, उसकी वृति प्रभु-चरणों में लगी रहती है।

15जिस मनुष्यको प्रभु के नाम का पदार्थ प्राप्त नहीं हुआ, वह भाग्यहीन है और बार-बार मरता रहता है॥ ३॥

16हे जगजीवन दाता ! तू आनंद का स्रोत है। जो हरि का नाम-सुमिरन करते हैं, वह अपने सभी सेवकों को आनंदित कर देता है।

17नानक का कथन है कि हे प्रभु ! तू सब जीवों का दाता है और सब जीव तेरे पैदा किए हुए हैं। तू अपने जीवों को गुरु के माध्यम से क्षमा करके अपने साथ मिला लेता है॥ ४ ॥ ६ ॥

18ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

19गूजरी महला ४ घरु ३ ॥

20माता, पिता एवं पुत्र इत्यादि सभी हरि ने बनाए हुए हैं।

21हरि ने स्वयं सभी के परस्पर संबंध कायम किए हैं॥ १॥

22हे मेरे भाई ! ईश्वर के समक्ष हमारा कोई भी जोर नहीं चल सकता।

23हमारे यह तन-मन सभी हरि के हैं और यह समूचा शरीर उसके वश में है॥ १॥ रहाउ॥

24हरि आप ही भक्तजनों में अपनी श्रद्धा लगाता है और

25भक्तजन गृहस्थ जीवन में निर्लेप बने रहते हैं।॥ २ ॥

26जब हरि के साथ हृदय में प्रेम बन जाता है तो

27जो कुछ भी जीव करता है वह मेरे हरि-प्रभु को भला लगता है॥ ३॥

28जिस कार्य एवं काम में हरि ने हमें लगाया है,

29हम वही कार्य करते हैं जो वह हमसे करवाता है॥ ४॥

30हे नानक ! जिनकी भक्ति मेरे प्रभु को लुभाती है,

31वे पुरुष अपना ध्यान राम नाम के साथ लगाकर रखते हैं॥ ५ ॥ १॥ ७ ॥ १६ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं