सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 490 · Raag Gujri

1रागु गूजरी महला ३ घरु १

2ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

3ऐसे जीवन को तो धिक्कार है, जिसमें हरि के साथ प्रीति नहीं लगती।

4ऐसे कार्य को भी धिक्कार है जिसमें हरि भूल जाता है तथा मन द्वैतभाव के साथ लग जाता है।॥ १॥

5हे मन ! ऐसे सतगुरु की श्रद्धा से सेवा करनी चाहिए, जिसकी निष्काम सेवा करने से गोविन्द से प्रीति उत्पन्न हो जाए एवं शेष सब कुछ भूल हो जाए।

6इस प्रकार चित्त ईश्वर के साथ लगा रहेगा एवं वृद्धावस्था का भय नहीं रहेगा और जीवन का मनोरथ मुक्ति मिल जाएगी॥ १॥ रहाउ॥

7गोविंद के प्रेम से मेरे मन में एक ऐसा सहज सुख पैदा हो गया है कि मेरी भक्ति आनंदमय बन गई है।

8जब मैंने अपने अहंत्व को मार दिया तो मेरा मन पावन हो गया और मेरी ज्योति परम-ज्योति में समा गई॥ २॥

9अहोभाग्य के बिना ऐसा सतगुरु प्राप्त नहीं हो सकता, जितनी चाहे सभी अभिलाषा कर लें।

10यदि झूठ का पर्दा भीतर से दूर हो जाए तो सदैव सुख प्राप्त हो जाता है॥ ३॥

11हे नानक ! ऐसे सतगुरु की वह सेवक क्या सेवा कर सकता है ? केवल गुरु के समक्ष उसे अपना मन एवं जीवन अर्पित कर देना ही सच्ची सेवा है।

12यदि वह सतगुरु की रज़ा को याद रखे तो वह स्वयं ही उस पर कृपा-दृष्टि कर देता है॥ ४ ॥ १॥ ३॥

13गूजरी महला ३ ॥

14हे भाई ! तुम हरि की ही सेवा -भक्ति करो तथा उसके अतिरिक्त किसी दूसरे की सेवा मत करो।

15हरि की सेवा-भक्ति करने से मनोवांछित फल प्राप्त होता है परन्तु किसी दूसरे की सेवा करने से अमूल्य मानव-जन्म व्यर्थ ही चला जाता है॥ १॥

16हे भाई ! हरि ही मेरा प्रेम एवं जीवन-आचरण है तथा हरि ही मेरी कथा एवं कहानी है।

17गुरु की दया से मेरा मन प्रभु-प्रेम में भीग गया है, यही मेरी सेवा-भक्ति बनी है॥ १॥ रहाउ॥

18हे भाई ! हरि ही मेरी स्मृति, मेरा शास्त्र, संबंधी एवं मेरा भाई है।

19हरि की मुझे भूख लगी रहती है और हरि के नाम से मेरा मन जाता है। हरेि ही मेरा रिश्तेदार है और वही मेरा अंतिमकाल का सखा है॥ २॥

20हरि के बिना दूसरी सब पूंजी झूठी है। जब प्राणी संसार से कूच करता है तो यह उसके साथ नहीं जाती।

21हरि मेरा अमूल्य धन है जो मेरे साथ (परलोक में) चलेगा, जहाँ किधर भी मैं जाऊँगा, वंही यह साथ जाएगा ॥ ३॥

22जो झूठ से लगा हुआ है, वह झूठा है और जो कर्म वह करता है, वे भी झूठे हैं।

23नानक कहते हैं कि दुनिया में सब कुछ हरि की इच्छानुसार ही होता है। नश्वर प्राणी का इसमें कोई हस्तक्षेप नहीं ॥ ४॥ २॥ ४

24गूजरी महला ३ ॥

25इस कलियुग में भगवान का नाम बड़ा दुर्लभ है तथा गुरु की शरण लेने से ही इसकी प्राप्ति होती है।

26नाम के बिना जीव की मुक्ति नहीं होती, चाहे कोई जितना भी उपाय करके देख लो॥ १॥

27मैं अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, सदैव ही उन पर न्यौछावर हूँ।

28सच्चे गुरु को मिलने से हरि-प्रभु मन में बस जाता है और तब वह सहज ही उसमें समाया रहता है॥ १॥ रहाउ ॥

29जब हरि का भय मन में उत्पन्न होता है तो जीव संसार से वैरागी हो जाता है।

30वैराग्य द्वारा ही हरि-प्रभु प्राप्त होता है तथा जीव हरि के साथ समाया रहता है।॥ २॥

31वही जीव मुक्त होते हैं, जो अपने मन को जीत लेते हैं और माया उनके साथ दोबेारा नहीं लगती।

32वे दशम द्वार में रहते हैं और उन्हें तीनों लोकों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है॥ ३॥

33गुरु नानक की कृपा-दृष्टि से भाई लहना गुरु अंगद बन गया, उस परमात्मा की आश्चर्यजनक रज़ा देखो।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं