सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 488 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1इस तरह की कथाएँ सुनकर धन्ना जाट भी प्रेरित होकर भगवान की भक्ति करने लगा।

2धन्ना जाट भाग्यवान हो गया है, जो उसे साक्षात् गोसाई के दर्शन प्राप्त हुए॥ ४॥ २॥

3हे मेरे चित! तू दयालु दामोदर भगवान को याद क्यों नहीं करता ? भगवान के सिवाय किसी अन्य सहारे की उम्मीद मत रखो।

4यदि तू खंडों-ब्रह्माण्डों पर भी भागता-फिरता रहेगा, फिर भी वही होगा जो कर्ता-प्रभु को मंजूर होगा ॥ १॥ रहाउ॥

5भगवान ने जननी के उदर-जल में हमारा दसों द्वारों वाला शरीर बनाया।

6हमारा मालिक प्रभु ऐसा है कि वह गर्भ में ही आहार देकर गर्भ की अग्नि से रक्षा करता है॥ १॥

7कछुआ जल में रहता है लेकिन उसके बच्चे जल से बाहर रहते हैं। उनकी रक्षा न ही माता के पंखों से होती है और न ही उनकी पालना उसके दूध से होती है।

8फिर भी अपने मन में सोच-समझ एवं देख कि पूर्ण परमानंद मनोहर उनका भरण-पोषण करता है॥ २॥

9पत्थर में कीट छिपा हुआ रहता है। उसके लिए बाहर आने-जाने का कोई मार्ग नहीं होता।

10धन्ना कहता है कि फिर भी प्रभु उसका पालनहार है। हे जीव ! तू भय मत कर ॥ ३॥ ३॥

11आसा सेख फरीद जीउ की बाणी

12ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

13जो लोग दिल से खुदा से मुहब्बत करते हैं, वही उसके सच्चे आशिक हैं।

14जिन लोगों के मन में कुछ और है तथा मुँह में कुछ और है, वे कच्चे तथा झूठे कहे जाते हैं।॥ १॥

15जो लोग खुदा के इश्क में रंगे हुए हैं, वे उसके दर्शन-दीदार के रंग में मस्त रहते हैं।

16जो लोग खुदा के नाम को भुला देते हैं, वे धरती पर बोझ बनकर ही रह जाते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

17जिन लोगों को अल्लाह अपने दामन (शरण) से मिला लेता है, वही उसके द्वार पर सच्चे दरवेश हैं।

18उनको जन्म देने वाली माता धन्य है और उनका इस दुनिया में आगमन सफल है॥ २॥

19हे परवदगार ! तू अपार, अगम्य एवं बेअंत है।

20जिन्होंने सत्य को पहचान लिया है, मैं उनके पैर चूमता हूँ॥ ३॥

21हे बक्शणहारे खुदा ! मैं तेरी पनाह में रहु।

22शेख फरीद को बंदगी (भक्ति) की खैर (दान) प्रदान॥४॥१॥

23आसा ॥

24शेख फरीद जी कहते हैं हे प्यारे ! उस अल्लाह के साथ लग।

25यह तन एक दिन मिट्टी हो जाएगा तथा इसका निवास बेचारी कब्र में होगा।॥ १॥

26हे शेख फरीद ! तेरा खुदा से मिलाप आज ही हो सकता है, यदि तू अपने मन को चंचल करने वाली इन्द्रियों पर अंकुश लगा दे ॥ १॥ रहाउ॥

27यदि यह पता है कि अन्तः मृत्यु के वश में ही होना है और दोबारा वापिस नहीं आना तो

28इस झूठी दुनिया में लिप्त होकर अपने आपको बर्बाद नहीं करना चाहिए॥ २॥

29सत्य तथा धर्म ही बोलना चाहिए तथा झूठ कभी नहीं बोलना चाहिए।

30गुरु जो मार्ग दिखाता है, मुरीदों को उसी मार्ग पर चलना चाहिए॥ ३॥

31छैल-छबीले नवयुवकों को पार होते देखकर सुन्दर युवती के मन में भी धैर्य हो जाता है।

32जो लोग सोने की झलक की तरफ मुड़ते हैं, वे नरक में आरे से चीरे जाते हैं।॥ ४॥

33हे शेख ! किसी भी मनुष्य का जीवन इस दुनिया में स्थिर नहीं रहता।

34जिस आसन पर अभी हम बैठे हैं, अनेकों ही इस पर बैठ कर चले गए हैं।॥ ५ ॥

35जैसे कार्तिक के मास में कुंजों का उड़ना, चैत्र महीने में दावाग्नि, श्रावण महीने में बिजली चमकती दिखाई देती है तथा

36शीतकाल (सर्दियों) में सुन्दर पत्नी की बाहें पति-प्रियतम के गले में शोभा देती हैं।॥ ६॥

37वैसे ही संसार से चले जाने वाले मनुष्य शरीर चले जा रहे हैं। अपने मन में इसे सोच-समझ लो।

38प्राणी को बनाने में छ: महीने लगते हैं लेकिन उसे तोड़ने (खत्म करने) में एक क्षण भर लगता है॥ ७ ॥

39हे फरीद ! जमीन आसमान से पूछती है कि जीव रूपी खेवट कहाँ चले गए हैं ?

40आसमान जवाब देता है कि कई लोगों के शरीर कब्रों में पड़े गल-सड़ रहे हैं परन्तु उनके कर्मो के दोष आत्मा सहन कर रही ॥८॥२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं