गुरु ग्रंथ साहिब 482 · Raag Aasaa · Bhagat Kabeer Ji
1तू अधिक जीवन जीने की आशा करता है परन्तु यम तेरी सांसें देख रहा है।
2हे कबीर ! यह दुनिया तो बाजीगर का खेल है इसलिए सोच-समझकर जीवन बाजी जीतने के लिए प्रभु-सिमरन की चाल चल ॥ ३ ॥ १॥ २३ ॥
3आसा ॥
4अपने तन को मैंने रंगने वाला पात्र बनाया है और फिर मन को शुभ गुणों से रंगा है। पाँच मूल तत्वों को मैंने अपना बराती बनाया है।
5राम जी से मैं अपने विवाह के फेरे ले रही हूँ और मेरी आत्मा उसके प्रेम में लीन हो गई है॥ १॥
6हे दुल्हन सखियो ! तुम विवाह के मंगल गीत गायन करो।
7मेरे घर में राजा राम दूल्हा बन कर आए हैं।॥ १॥ रहाउ ॥
8अपनी नाभि कमल में मैंने वेदी बनाई है और ब्रह्म-ज्ञान रूपी मंत्र उच्चरित किया है।
9मैं बड़ी भाग्यशालिनी हूँ जो राम जी को मैंने अपने दूल्हे (वर) के रूप में पाया है॥ २॥
10सुर, नर, मुनिजन एवं तेतीस करोड़ देवता अपने विमानों में सवार होकर इस आश्चर्यजनक विवाह का कौतुक देखने हेतु पधारे हैं।
11कबीर जी कहते हैं कि एक आदिपुरुष भगवान मुझे ब्याह कर ले चले हैं।॥ ३॥ २॥ २४॥
12आसा ॥
13मैं अपनी माया रूपी सास द्वारा बहुत दुःखी हूँ तथा अपने ससुर की प्यारी हूँ लेकिन अपने जेठ मृत्यु के नाम से मैं डरती हूँ।
14हे मेरी सखी सहेलियो ! मेरी अज्ञानता (इन्द्रियों) रूपी ननद ने मुझे पकड़ लिया है। अपने देवर (विवेक बुद्धि) के विरह में अत्यंत जल रही हूँ॥ १॥
15मेरी बुद्धि बावली हो गई है, क्योंकि मैंने राम को भुला दिया है। अब मैं कैसे उपयुक्त जीवन बिता सकती हूँ।
16मेरा पति-परमात्मा मेरी सेज में विराजमान है परन्तु मेरे नयनों से वह मुझे दिखाई नहीं देता। यह दुःख मैं किससे व्यक्त करूं ॥ १॥ रहाउ॥
17मेरा सौतेला पिता मुझ से झगड़ा करता है और माया मोहिनी सदैव नशे में मस्त रहती है।
18जब मैं बड़े भाई (ध्यान-मनन) की संगति करती थी तो मैं अपने प्रियतम की प्यारी थी। २॥
19कबीर जी कहते हैं कि कामादिक पाँचों विकारों से झगड़ा झगड़ते ही मेरा जीवन नष्ट हो गया है।
20झुठी माया ने सारे जगत को बाँध लिया है परन्तु राम के नाम का भजन-सुमिरन करने से मुझे सुख प्राप्त हो गया है॥ ३॥ ३॥ २५ ॥
21आसा ॥
22हे ब्राह्मण ! हमारे घर में प्रतिदिन सूत का ताना ही तनता है परन्तु तुम्हारे गले में केवल सूत का जनेऊ ही है।
23तुम गायत्री-मंत्र का जाप एवं वेदों का अध्ययन करते रहते हो लेकिन हमारे हृदय में गोबिन्द निवास करता है॥ १॥
24मेरी जिव्हा में विष्णु, नयनों में नारायण एवं हृदय में गोविन्द बसता है।
25हे मुकुंद ब्राह्मण ! जब यम द्वार पर कर्मो का लेखा जोखा पूछा जाएगा तो बावले तब तुम क्या कहोगे॥ १॥ रहाउ॥
26हम गौएं हैं और तुम ब्राह्मण हमारे ग्वाले बने हुए हो और जन्म-जन्म से हमारी रक्षा कर रहे हो।
27परन्तु तुम कभी भी हमें चराने हेतु पार उतार नहीं लेकर गए अर्थात् कोई ब्रह्म-ज्ञान प्रदान नहीं किया। फिर तुम हमारे कैसे स्वामी हो ? ॥ २॥
28तुम ब्राह्मण हो तथा मैं कांशी का जुलाहा हूँ। मेरी ज्ञान की बात को समझकर उसका सही उत्तर दो।
29तुम जाकर राजाओं-महाराजाओं से दान मॉगते फिरते हो किन्तु मेरा ध्यान हरि के चरणों में ही लीन रहता है॥ ३ ॥ ४ ॥ २६ ॥
30आसा ॥
31जगत में जीवन ऐसा है, जैसे कि एक स्वप्न होता है। यह जीवन एक स्वप्न के समान है
32परन्तु इसे सत्य मानकर हमने पकड़ लिया है और प्रभु नाम के परम खजाने को छोड़ दिया है। १॥
33हे बाबा ! हम उस माया-मोह से इतना स्नेह करते हैं
34जिसने हमारा ज्ञान-रत्न छीन लिया है। १॥ रहाउ॥
35नयनों से देखता हुआ पतंगा भी दीपक की लौ से उलझ जाता है। मूर्ख कीड़ा अग्नि को नहीं देखता।
36मूर्ख मनुष्य सोने एवं कामिनी (स्त्री) में मुग्ध होकर मृत्यु के फंदे का ख्याल ही नहीं करता॥ २॥
37हे प्राणी ! तू सोच-विचार कर विकारों को त्याग दे, भगवान तुझे संसार-सागर से पार करवाने हेतु एक जहाज है।
38कबीर जी कहते हैं कि जगत का जीवन प्रभु इतना महान् एवं सर्वोपरि है कि उस जैसा दूसरा कोई नहीं ॥ ३॥ ५॥ २७ ॥
39आसा ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं