सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 480 · Raag Aasaa · Bhagat Kabeer Ji

1जब यम का दण्ड उसके सिर पर पड़ता है तो एक क्षण में ही निर्णय हो जाता है अर्थात् जब मनुष्य का देहांत हो जाता है तो धन वही रह जाता है॥ ३॥

2हरि का सेवक उत्तम भक्त कहलवाता है और वह हरि की आज्ञा मानकर सुख प्राप्त करता है।

3जो हरि को अच्छा लगता है, वह सत्य मानकर स्वीकृत करता है और ईश्वरेच्छा को वह अपने मन में बसाता है॥ ४॥

4कबीर जी कहते हैं कि हे संतजनो ! सुनो, यह मैं-मेरी की रट झूठी है क्योंकि

5मृत्यु (जीवात्मा रूपी) पक्षी के पिंजरे (रूपी शरीर) को फाड़कर आत्मा को ले जाती है और निर्जीव शरीर रूपी धागे वहीं टूट जाते हैं।॥ ५॥ ३॥ १६॥

6आसा ॥

7हे काजी ! हम मसकीन उस खुदा के पैदा किए हुए बंदे हैं। तुझे अपने चित्त की हकूमत भली लगती है अर्थात् तुझे उस पर बड़ा अभिमान है लेकिन

8अव्वल अल्लाह दीन धर्म का मालिक है और वह किसी पर जुल्म करने की आज्ञा नहीं देता॥ १॥

9हे काजी ! तेरे मुंह से निकली बातें अच्छी नहीं लगतीं ॥ १॥

10रोजा रखने, नमाज पढ़ने और कलमा पढ़ने से जन्नत (स्वर्ग) नहीं मिलती।

11अल्लाह का घर काबा तो तेरे अन्तर्मन के भीतर ही मौजूद है परन्तु मिलता तभी है यदि कोई इस भेद को जान ले ॥ २ ॥

12जो न्याय का विचार करता है, वही सच्ची नमाज पढ़ता है। यदि कोई अल्लाह को पहचानता है तो वही उसका कलमा है।

13जो मनुष्य पाँच विकारों को मारकर वश में करता है तो नमाज का मुसल्ला (आसन) बिछाता है और धर्म को पहचानता है॥ ३॥

14हे काजी ! अपने मालिक-खुदा को पहचान और अपने मन में तरस धारण कर तू अपने अहंत्व को मिटाकर फीका कर दे।

15जब मनुष्य अपने आपको समझा कर दूसरों को अपने जैसा समझता है तो वह जन्नत (स्वर्ग) का हकदार बन जाता है।॥ ४॥

16मिट्टी तो एक ही है परन्तु इसने अनेक स्वरूप धारण किए हुए हैं। मैं उन सभी में एक परमात्मा को ही पहचानता हूँ।

17कबीर जी कहते हैं कि हे काजी ! तूने तो जन्नत (स्वर्ग) के मार्ग को त्याग कर अपना मन जानबूझ कर दोजख (नरक) से जोड़ लिया है॥ ५ ॥ ४॥ १७॥

18आसा ॥

19दशम द्वार रूपी गगन नगरी में अब एक बूंद भी नहीं बरसती। कहाँ है वह नाद जो इसके भीतर समाया हुआ था।

20ब्रहा-परमेश्वर आत्मा रुपी परमहंस को ले गया है॥ १॥

21हे बाबा ! जो आत्मा बातें करती एवं शरीर के साथ रहती थी, वह कहाँ चली गई है ?

22वह आत्मा मन में नृत्य करती थी और कथा-वात करती थी ॥ १॥ रहाउ ॥

23वह बजाने वाला आत्मा कहाँ चला गया है जिसने इस शरीर रूपी मन्दिर को अपना बनाया हुआ था ?

24कोई साखी, शब्द, चेतना पैदा नहीं होती। प्रभु ने समूचा तेज-बल खींच लिया है॥ २॥

25तेरे संगी कान बलहीन हो गए हैं तेरी काम-वासना का बल भी क्षीण हो गया है।

26तेरे पैर भी चलने में असमर्थ हैं, हाथ भी शिथिल हो गए हैं तथा तेरे मुँह से कोई बात भी नहीं निकलती॥ ३॥

27तेरे कामादिक पाँचों विकार थक गए हैं तथा वे सभी चोर अपने-आप भटकने से हट गए हैं।

28मन रूपी हाथी भी हार-थक गया है और सूत्रधार हृदय जिसके द्वारा शरीर की इन्द्रियाँ चलती-फिरती थीं, वे भी थक गई हैं।॥ ४॥

29मृत्यु होने के पश्चात् दसों ही द्वारों के बन्धन टूट गए हैं तथा वह अपने मित्रों एवं भाईयों को छोड़ गया है।

30कबीर जी कहते हैं कि जो मनुष्य भगवान का ध्यान करता है, वह जीवित ही तमाम बन्धनों को तोड़ देता हैं ॥५॥५॥१८॥

31आसा ॥

32सारे विश्व में माया रूपी सर्पिणी से अधिकतर कोई बलशाली नहीं,

33जिसने (त्रिदेवों) ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव को भी छल लिया है॥ १॥

34हर तरफ मारा-मार करती हुई माया रूपी सर्पिणी अब सत्संगति रूपी निर्मल जल में बैठ गई है।

35जिस माया रूपी सर्पिणी ने त्रिभवनों अर्थात् समूचा जगत डंस लिया था, उसे मैंने गुरु की कृपा से देख लिया है॥ १॥ रहाउ॥

36हे भाई ! तुम यह माया को सर्पिणी-सर्पिणी कहकर क्यों शोर मचा रहे हो ?

37जो सत्य को पहचान लेता है वह माया रूपी सर्पिणी को निगल जाता है॥ २॥

38सिमरन करने वालों के बिना अन्य कोई भी इस सर्पिणी से नहीं बचा है।

39जिसने माया रूपी सर्पिणी को जीत लिया है, यमराज भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं