सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 478 · Raag Aasaa · Bhagat Kabeer Ji

1जब प्राण रूपी तेल जल जाता है अर्थात् शरीर में से प्राण निकल जाते हैं तो सुरति रूपी बाती बुझ जाती है। चारों ओर अंधेरा होने से शरीर रूपी मन्दिर सुनसान हो जाता है॥ १॥

2हे बावरे मनुष्य ! तेरे प्राण पखेरू होने के उपरांत तुझे एक घड़ी भर के लिए भी कोई रखने को तैयार नहीं होता।

3इसलिए तू राम-नाम का भजन-सुमिरन कर ले॥ १॥ रहाउ ॥

4बता ! कौन किसकी माता है और कौन किसका पिता है? कौन किसी पुरुष की पत्नी है?

5जब प्राणी रूपी घड़ा फूट जाता है अर्थात् देहांत होने पर कोई बात नहीं पूछता। हर कोई यही कहता है मृतक शरीर को घर से शीघ्र ही बाहर निकाल दो॥ २॥

6देहुरी पर बैठी हुई माता रोती है और भाई अर्थी उठाकर श्मशानघाट ले जाते हैं।

7अपने बाल खिलार कर मृतक की पत्नी फूट-फूट कर रोती है और आत्मा अकेली ही चली जाती है।॥ ३॥

8कबीर जी कहते हैं कि हे संतजनो ! इस भवसागर संबंधी सुन लो।

9हे गुसाई ! यह मनुष्य अपने कर्मों के कारण बहुत अत्याचार सहन करता है और यमदूत उसका पीछा नहीं छोड़ते ॥ ४॥ ६ ॥

10दुतुके

11ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

12आसा श्री कबीर जीउ के चउपदे इकतुके ॥

13ब्रह्मा के चार पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन एवं सनत कुमार ने बड़े ज्ञानी होते हुए भी प्रभु का अन्त नहीं पाया।

14वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा ने भी वेद पढ़-पढ़ कर अपना अमूल्य जन्म गंवा लिया। अर्थात् वह भी भगवान का अन्त न पा सका।॥१॥

15हे मेरे भाई ! हरि का बिलोना बिलोवो अर्थात् जैसे दूध का मंथन किया जाता है, वैसे ही बार-बार हरि का जाप करो।

16जैसे दूंध का धीरे-धीरे मंथन करने से मक्खन दूध में नहीं मिलता, वैसे ही सहज अवस्था में हरि का नाम जपो, चूंकेि सिमरन का फल परम तत्व प्रभु प्राप्त हो जाए॥ १॥ रहाउ ॥

17अपने तन को मटकी बनाओ और उसमें अपने मन की मधानी से मंथन करो।

18इस मटकी के भीतर शब्द रूपी दही को संचित करो ॥ २॥

19हरि नाम का मंथन मन से उसका सुमिरन करना है।

20गुरु की कृपा से मनुष्य नाम रूपी अमृत धारा को प्राप्त कर लेता है॥ ३॥

21हे कबीर ! यदि प्रभु-बादशाह दया-दृष्टि धारण करे तो

22मनुष्य राम के नाम से लगकर भवसागर से पार होकर किनारे पहुँच जाता है॥ ४॥ १॥ १०॥

23आसा ॥

24शरीर रूपी दीपक में से प्राण रूपी तेल खत्म हो गया है अर्थात् शरीर में से प्राण पखेरू हो गए हैं। सुरति रूपी बाती सूख गई है अर्थात् जीव की सुरति नष्ट हो गई है।

25जीव रूपी नट सदा की नींद सो गया है और अब ढोल-मंजीरा भी नहीं बज रहा अर्थात् जीव का सारा कामकाज बंद हो गया है॥ १॥

26तृष्णा रूपी अग्नि बुझ गई है और संकल्प-विकल्प रूपी धुआं नहीं निकल रहा।

27एक प्रभु ही सारे जगत में बसा हुआ है, दूसरा अन्य कोई भी नहीं ॥ १॥ रहाउ ॥

28तार टूट गई है तथा वीणा बज नहीं रही अर्थात् परमात्मा से जीव की वृत्ति टूट गई है।

29भूल से मनुष्य ने अपना कार्य बिगाड़ लिया है॥ २॥

30जब मनुष्य को ज्ञान प्राप्त होता है तो वह उपदेश देना, डींगे मारना, विवाद करना (अर्थात् मौखिक बातें जो कहने-सुनने की थीं) तथा गाना-बजाना भूल जाता है॥ ३॥

31कबीर जी कहते हैं कि जो मनुष्य कामादिक पाँच विकार नष्ट कर देता है, उससे परम पदवी (मोक्ष की प्राप्ति) दूर नर्हौं होती॥ ४॥ २॥ ११॥

32आसा ॥

33पुत्र जितने भी अपराध करता है,

34माता उसे अपने चित्त में नहीं रखती॥ १॥

35हे मेरे राम ! मैं तेरा नादान बालक हूँ,

36तू मेरे अवगुणों को नष्ट क्यों नहीं करता ?॥ १॥ रहाउ॥

37यदि नासमझ पुत्र अत्यंत क्रोध में अपनी माता को मारने के लिए भाग कर भी आए

38तो भी माता उसके इतने बड़े अपराध को अपने चित्त में नहीं रखती ॥ २ ॥

39मेरा मन चिन्ता-फिक्र के भेंवर में पड़ गया है।

40प्रभु नाम के बिना यह कैसे पार हो सकता है? ॥ ३॥

41हे प्रभु ! मेरे शरीर को सदैव निर्मल बुद्धि प्रदान कर चूंकि

42सहज-सहज कबीर तेरा गुणगान करता रहे॥ ४॥ ३॥ १२॥

43आसा ॥

44हमारा हज्ज गोमती-किनारे चले जाने से हो जाता है,

45जहाँ पीताम्बर पीर (परमात्मा) बसता है॥ १॥

46वाह ! वाह! मेरा मन कितना खूब गाता है।

47हरि का नाम मेरे मन को बहुत लुभाता है॥ १॥ रहाउ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं