गुरु ग्रंथ साहिब 477 · Raag Aasaa · Bhagat Kabeer Ji
1जो तंत्र, मंत्र एवं समस्त औषधियों को जानता है, आखिरकार सबकी मृत्यु आनी है॥ २॥
2राज को भोगने वाले, सिंहासन पर छत्र धारण करने वाले, अनेक सुन्दर नारियों से रमण करने वाले,
3पान, कपूर तथा चन्दन की सुगन्धियों का आनंद लेने वाले भी अंततः प्राण त्याग देंगे ॥ ३॥
4चाहे कोई वेद, पुराण एवं स्मृतियों को खोज ले फिर भी उसका जन्म-मरण के चक्र से बचाव नहीं होना।
5हे कबीर ! इसलिए राम नाम का भजन-सुमिरन करने से ही जन्म-मरण का चक्र मिट सकता है॥ ४॥ ५ ॥
6आसा ॥
7मन रूपी हाथी सुन्दर वीणा बजाने वाला बन गया है। बैल वृत्ति पखावज बजाने लगी है और कौए वाला स्वभाव ताल बजा रहा है।
8मन के गधे वाला जिद्दी स्वभाव प्रेम रूपी चोला पहनकर नृत्य कर रहा है और मन का भैसा जैसा स्वभाव भक्ति में मग्न है॥ १॥
9मेरे राजा राम ने आक के आम समान फलों को रसदायक आम बना दिया है अर्थात् मन के कड़वे एवं कटु स्वभाव में मिठास भर गई है।
10परन्तु इस रस का स्वाद किसी विरले विवेकी पुरुष ने ही चखा है॥ १॥ रहाउ ॥
11मन रूपी निर्दयी शेर अपने घर में बैठकर पान का बीड़ा तैयार कर रहा है तथा मन रूपी छघूंदर तृष्णा सुपारी लाती है, अर्थात् सेवा में लीन है।
12मेरी इन्द्रियाँ रूपी चुहियाँ मंगलगान गा रही हैं और मन रूपी कछुआ जो सत्संगति से भयभीत होकर बैठा था, अब शंख बजाता है॥ २॥
13बांझ स्त्री माया का पुत्र विवाह करवाने हेतु चल दिया है तथा सोने के मंडप सजाए गए हैं।
14अब मन ने प्रभु से जुड़ी वृत्ति रूपवान एवं सुन्दर कन्या से विवाह कर लिया है और खरगोश एवं शेर प्रभु का स्तुतिगान कर रहे हैं।॥ ३॥
15कबीर कहता है कि हे संतजनो ! मेरी बात ध्यान से सुनो, मन की विनम्रता चींटी ने अभिमान रूपी पर्वत को निगल लिया है।
16अब मन रूपी कछुआ मानवीय महानुभूति रूपी अंगार का अभिलाषी बन गया है तथा उसका अज्ञान अब ज्ञान में परिवर्तन होकर गुरु का शब्द सुना रहा है॥ ४॥ ६॥
17आसा ॥
18यह शरीर एक बटुआ है जो बहतर शारीरिक नाड़ियों से तैयार हुआ है परन्तु इसका एक ही द्वार दशमद्वार है।
19इस जगत में केवल वही सच्चा योगी है जो एक ईश्वर के नाम की भिक्षा मॉगता है, जिस नाम ने नवखण्डों वाली पृथ्वी को धारण किया हुआ है॥ १॥
20ऐसा योगी ही नवनिधियाँ प्राप्त कर लेता है।
21वह अपनी आत्मा को तल से उठाकर गगनमण्डल में ले जाता है ॥१॥ रहाउ॥
22वह ज्ञान-गुदड़ी को प्रभु-ध्यान की सुई में ब्रह्म शब्द के मजबूत धागे से टांकता है
23और वह पाँच इन्द्रियों को अपनी मृगशाला बनाकर अपने गुरु के मार्ग चल देता है॥ २॥
24वह दया को अपनी फावड़ी एवं अपने शरीर को धूनी बनाता है और प्रभु-दृष्टि की वह अग्नि जलाता है।
25उसके प्रेम को वह अपने हृदय में बसाता है और चारों ही युगों में वह समाधि अवस्था में लीन रहता है॥३॥
26समूचा योगीपन राम का नाम जपने में है जिसके दिए हुए यह शरीर एवं प्राण हैं।
27हे कबीर ! यदि प्रभु कृपा धारण करे तो वह मनुष्य को सत्य का चिन्ह प्रदान करता है॥ ४॥ ७॥
28आसा ॥
29हिन्दू तथा मुसलमान कहाँ से आए हैं ? धर्म के अलग-अलग यह दो मार्ग किसने चलाए हैं ?
30हे झगड़ालु काजी ! अपने दिल में अच्छी तरह सोच-विचार कर, कौन स्वर्ग एवं कौन नरक को प्राप्त करता है ? ॥ १॥
31हे काजी ! तूने कौन-सा कतेब पढ़ा है ?
32तेरे जैसे कतेब पढ़ने एवं विचार करने वाले सभी नष्ट हो गए हैं। लेकिन किसी को भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ ॥ १॥ रहाउ॥
33मुसलमानों में स्त्री से आसक्ति-प्रेम के कारण सुन्नत करवाई जाती है लेकिन इसका संबंध अल्लाह के मिलन से नहीं। हे भाई ! इसलिए मैं (सुन्नत पर) विश्वास नहीं करता।
34यदि अल्लाह ने मुझे मुसलमान बनाना था तो अपने आप ही सुन्नत जन्मजात हो जाती ॥ २॥
35यदि सुन्नत करने से कोई मुसलमान बनता है तो औरत का क्या होगा ?
36नारी तो अधागिनी है, जो मनुष्य के शरीर का आधा भाग है, उसे छोड़ा नहीं जा सकता। इसलिए हिन्दू बने रहना ही बेहतर है (सुन्नत का पाखण्ड नहीं करना चाहिए) ॥ ३॥
37हे मूर्ख प्राणी ! कतेबों को छोड़कर राम नाम का भजन कर। निरर्थक विवादों में फँसकर तू भारी अत्याचार कर रहा है।
38कबीर ने एक राम की टेक ही पकड़ी है तथा मुसलमान बुरी तरह ख्वार हो रहे हैं।॥ ४॥ ८॥
39आसा ॥
40जब तक अन्तरात्मा रूपी दीपक में प्राण रूपी तेल रहता है, इस दीपक के मुँह में सुरति रूपी बाती जलती रहती है, तब तक जीवात्मा को शरीर रूपी मंदिर में हर वस्तु की सूझ होती है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं