सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 474 · Raag Aasaa

1पउड़ी।

2हे परमात्मा ! तू स्वयं ही सृष्टि रचयिता है और स्वयं ही सत्ता को धारण किया हुआ है।

3तू अपनी रचना एवं कच्ची-पक्की गोटियों (अच्छे-बुरे जीवों) को धरती पर देखता है।

4जो भी जीव इस दुनिया में आया है, वह चला जाएगा। अपनी बारी आने पर सभी ने जाना ही होता है।

5अपने मन में से हम उस प्रभु को क्यों विस्मृत करें, जिसने हमें जीवन एवं प्राण दिए हुए हैं?

6आओ, अपने हाथों से हम स्वयं ही अपने कार्य सम्पूर्ण करें अर्थात् शुभ कर्मों द्वारा भगवान को प्रसन्न करके अपना जीवन कार्य संवार ले ॥ २० ॥

7श्लोक महला २ ॥

8यह कैसी आशिकी है, जो भगवान को छोड़कर द्वैतवाद से लगती है।

9हे नानक ! सच्चा आशिक वही कहलाता है, जो सदा प्रभु के प्रेम में ही समाया रहता है।

10जो व्यक्ति अपने किए शुभ कर्म के दिए फल सुख को अच्छा मानता है और अपने किए बुरे कर्म के दिए फल दुख को बुरा मानता है,

11उसे भगवान का आशिक नहीं कहा जा सकता। वह तो अच्छे एवं बुरे के लेखे में पड़कर प्रेम का हिसाब-किताब करता है। प्रभु जो कुछ करता है, ऐसा जीव उसमें सहमत नहीं रहता ॥ १ ॥

12महला २ ॥

13जो मनुष्य अपने प्रभु के हुक्म को कभी प्रणाम करता है और कभी उसके किए पर संशय (ऐतराज) करता है, वह आदि से ही कुमार्गगामी हो जाता है।

14हे नानक ! उसके दोनों ही कार्य झूठे हैं और प्रभु के दरबार में उसको कोई स्थान नहीं मिलता॥ २॥

15पउड़ी॥

16जिसकी सेवा करने से सुख मिलता है, सदैव उस प्रभु को याद करते रहना चाहिए।

17जब अपने किए कर्मो का आप ही भोगना है तो फिर हम बुरे कर्म क्यों करें ?

18बुरा कर्म कदापि नहीं करना चाहिए, दूर-दृष्टि से नतीजे का ध्यान रखना चाहिए।

19हमें कर्मो का ऐसा खेल नहीं खेलना चाहिए, जिसके फलस्वरूप प्रभु के समक्ष हमें लज्जित होना पड़े, अर्थात् शुभ कर्म ही करने चाहिएँ।

20मनुष्य जन्म में ऐसी सेवा-भक्ति करो, जिससे लाभ प्राप्त हो।॥ २१॥

21श्लोक महला २ ॥

22यदि कोई सेवक अपने मालिक की सेवा करता है और साथ ही अभिमानी, विवादास्पद झगड़ालू है।

23यदि वह अधिकतर बातें बनाता है तो वह अपने मालिक की प्रसन्नता का पात्र नहीं होता।

24लेकिन यदि वह अपना अहंकार मिटाकर सेवा करे तो कुछ मान-सम्मान प्राप्त कर लेता है।

25हे नानक ! वह मनुष्य अपने उस मालिक से मिल जाता है, जिसकी सेवा में जुटा हुआ है, उसकी लगन स्वीकृत हो जाती है॥ १॥

26महला २ ॥

27जो (संकल्प) दिल में होता है, वह (कर्मों के रूप में) प्रगट हो जाता है। मुंह से कही बात तो हवा की तरह महत्वहीन होती है।

28मनुष्य विष बोता है परन्तु अमृत,माँगता है। देखो ! यह कैसा न्याय है ॥ २ ॥

29महला २॥

30मूर्ख के साथ मित्रता कदापि ठीक नहीं होती।

31जैसा वह जानता है, वैसा ही वह करता है। चाहे कोई इसका निर्णय करके देख ले।

32किसी वस्तु में दूसरी वस्तु तभी समा सकती है, यद्यपि पहले पड़ी हुई वस्तु को निकाल दिया जाए।

33प्रभु के समक्ष हुक्म करना सफल नहीं होता, अपितु उसके समक्ष तो विनम्र प्रार्थना ही करनी चाहिए।

34हे नानक ! छल-कपट की कमाई करने से छल-कपट ही हासिल होता है। लेकिन प्रभु का यशोगान करने से प्राणी प्रसन्न हो जाता है।॥ ३ ॥

35महला २॥

36अज्ञानी व्यक्ति के साथ मित्रता एवं बड़े आदमी के साथ प्रेम

37जल में लकीर की भाँति है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं रहता॥ ४॥

38महला २॥

39यदि एक नासमझ व्यक्ति कोई कार्य करे तो वह इसे सम्पूर्ण नहीं कर सकता।

40यदि एकाध भला काम कर भी ले तो वह दूसरा विगाड़ देता है॥ ५॥

41पउड़ी॥

42जो सेवक अपने स्वामी की इच्छानुसार चले तो ही मानो कि वह अपने स्वामी की नौकरी कर रहा है,

43इससे एक तो उसे बड़ा मान-सम्मान मिलेगा, दूसरा वेतन भी स्वामी से दुगुना प्राप्त करेगा।

44यदि वह अपने स्वामी की बराबरी करता है तो वह मन में लज्जित ही होता है।

45परिणामस्वरूप अपनी पहली कमाई भी गंवा लेता है और सदा जूते खाता है।

46जिसका दिया हम खाते हैं, उसका हमें कोटि-कोटि आभार व्यक्त करना चाहिए।

47हे नानक ! प्रभु के समक्ष हुक्म नहीं सफल होता अपितु उसके समक्ष विनम्र प्रार्थना ही कारगर होती है।॥ २२॥

48श्लोक महला २॥

49यह कैसी देन है, जो हम स्वयं माँगकर प्राप्त करते हैं ?

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं