गुरु ग्रंथ साहिब 473 · Raag Aasaa
1पउड़ी।
2जिस सतगुरु में महान् गुण मौजूद हैं, उसे बड़ा मानकर उसी की स्तुति करनी चाहिए।
3भगवान की कृपा से सतगुरु मिल जाए तो वह सतगुरु की बड़ाई को देखता है।
4जब उसे अच्छा लगता है तो वह मनुष्य के मन में बसा देता है।
5ईश्वर का हुक्म हो तो सतगुरु मनुष्य के मस्तक पर हाथ रखकर तमाम बुराइयाँ निकाल कर फेंक देता है।
6जब प्रभु प्रसन्न हो जाए तो नवनिधियाँ प्राप्त हो जाती हैं॥ १८ ॥
7श्लोक महला १ ॥
8पहले ब्राह्मण आप निर्मल होकर पवित्र चौके पर बैठ जाता है।
9शुद्ध भोजन जिसे किसी ने स्पर्श नहीं किया होता, उसके समक्ष लाकर परोसा जाता है।
10इस तरह पवित्र होकर वह भोजन ग्रहण करता है और तब श्लोक पढ़ने लग जाता है।
11उसने पवित्र भोजन को अपने पेट में अशुद्ध स्थान में डाल लिया, यह दोष किसे लगा है ?
12अन्न, जल, अग्नि एवं नमक चारों ही देवता अर्थात् पवित्र पदार्थ हैं। जब पाँचवां पदार्थ घी डाल दिया जाता है
13तो शुद्ध एवं पवित्र भोजन बन जाता है।
14देवताओं की तरह पवित्र भोजन पापी तन के संयोग से अपवित्र हो जाता है और उस पर फिर थूका जाता है।
15हे नानक ! वह मुँह जो नाम का उच्चारण नहीं करता और नाम के बिना रसों का भोग करता है,
16यूं समझ लीजिए कि उस मुँह पर थूक ही पड़ता है॥ १॥
17महला १॥
18नारी जन्मदाती है, उसी के माध्यम से मनुष्य गर्भ में से जन्म लेता है, उसी के माध्यम से प्राणी का शरीर बनता है। नारी से ही उसकी सगाई एवं विवाह होता है।
19नारी से ही मनुष्य दोस्ती करता है और नारी द्वारा ही दुनिया की उत्पत्ति का मार्ग जारी रहता है।
20यदि किसी मनुष्य की पत्नी मर जाती है तो वह दूसरी स्त्री की खोज करता है। नारी से ही उसका दूसरों से रिश्ता बनता है।
21फिर उस नारी को क्यों बुरा कहें ? जिसने बड़े-बड़े राजा महाराजा एवं महापुरुषों को जन्म दिया है।
22नारी से ही नारी पैदा होती है और नारी के बिना कोई भी पैदा नहीं हो सकता।
23किन्तु हे नानक ! केवल एक परमात्मा ही नारी के बिना अयोनि में है।
24जिस मुख से सदा ही प्रभु की गुणस्तुति होती है, वह भाग्यशाली एवं सुन्दर है।
25हे नानक ! वह मुख उस सत्य प्रभु के दरबार में उज्ज्वल होता है।॥ २॥
26पउड़ी ॥
27हे प्रभु ! सभी तुझे अपना मालिक कहते हैं लेकिन जिसका तू नहीं है, उसे चुनकर बाहर निकाल दिया जाता है।
28हर किसी प्राणी ने अपने कर्मो का फल भोगना है और अपना लेखा-जोखा चुकाना है।
29यदि मनुष्य ने इस जगत में सदा नहीं रहना तो वह क्यों अभिमान करे।
30किसी को भी बुरा मत कहो और विद्या पढ़कर इस बात को समझना चाहिए।
31मूर्खो से कदापि झगड़ा नहीं करना चाहिए ॥१९॥
32श्लोक महला १॥
33हे नानक ! फीका बोलने से तन-मन दोनों ही फीके (शुष्क) हो जाते हैं।
34कड़वा बोलने वाला दुनिया में कटुभार्षी ही मशहूर हो जाता है और लोग भी उसके कड़वे वचनों से ही याद करते हैं।
35कड़वे स्वभाव वाला जीव प्रभु के दरबार में दुत्कार दिया जाता है और कटुभार्षी के मुँह पर थूक ही पड़ता है।
36कटुभाषी मनुष्य मूर्ख कहा जाता है और उसे दण्ड के तौर पर जूते पड़ते हैं।॥ १॥
37महला १॥
38मन से झूठे पर बाहर से सत्यवादी होने का दिखावा करने वाले दुनिया में पाखण्ड ही बनाए रखते हैं।
39चाहे वे अड़सठ तीर्थों का स्नान कर लें परन्तु फिर भी उनकी मन की मैल दूर नहीं होती।
40इस दुनिया में वही लोग भले हैं, जिनके मन में रेशम की तरह कोमलता है, चाहे बाहर से उन्होंने शरीर पर फटे-पुराने ही कपड़े पहने हुए हैं।
41उनका भगवान से बहुत प्रेम है और उसके दर्शनों का ध्यान धारण करते हैं।
42प्रभु के प्रेम में वे हँसते हैं, प्रेम में ही रोते हैं और चुप भी हो जाते हैं।
43वह अपने सत्यस्वरूप परमेश्वर के अलावा किसी की भी परवाह नहीं करते।
44भु-द्वार के मार्ग पर बैठे हुए वह भोजन की याचना करते हैं और जब वह देता है तो ही खाते ।
45परमात्मा की कचहरी एक है और एक ही उसकी जीवों की तकर्दीर लिखने की कलम है। हमारा और तुम्हारा वहाँ मेल होता है अर्थात् छोटे-बड़े का मेल होता है।
46प्रभु के दरबार में कर्मो का लेखा-जोखा किया जाता है। हे नानक ! अपराधी मनुष्य कोल्हू में तेल वाले बीजों की तरह पीसे जाते हैं। २॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं