सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 472 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1ब्राह्मण नीले वस्त्र पहन कर मुसलमानों की नजर में स्वीकृत होना चाहते हैं।

2मुसलमानों से धन-धान्य लेते हैं, जिन्हें मलेच्छ कहते हैं और पुराणों की फिर भी पूजा करते हैं।

3एक तरफ अभाषा अरबी-फारसी का कलमा पढकर हलाल किया बकरा खाते हैं

4परन्तु दूसरी तरफ अपनी रसोई के भीतर किसी को दाखिल नहीं होने देते।

5वे रसोई की लिपाई करके उसके गिर्द रेखा लगाते हैं और

6चौकी रसोई में वे झूठे आकर बैठ जाते हैं।

7दूसरों को वे कहते हैं कि, “रसोई (चौकी) के निकट मत आना, हमारी चौकी को स्पर्श मत करना, अन्यथा हमारा भोजन भ्रष्ट हो जाएगा।”

8भ्रष्ट मलिन शरीर से वे दुष्कर्म करते हैं।

9अपवित्र मन से वे जूठन की चुल्लू करते हैं।

10हे नानक ! सत्य का ध्यान करने से

11जब मन शुद्ध हो जाता है तो सत्य (प्रभु) प्राप्त हो जाता है॥ २ ॥

12पउड़ी ॥

13परमात्मा सब जीवों को अपने चित्त में याद रखता है और वह सबको देखकर अपनी निगाह में रखकर अपनी इच्छा से चलाता है।

14वह खुद ही जीवों को प्रशंसा प्रदान करता है और खुद ही उन से कर्म करवाता है।

15बड़ों से बड़ा प्रभु महान है और उसकी सृष्टि भी अनन्त है। वह हरेक को कामकाज में लगाता है।

16यदि प्रभु कोप-दृष्टि धारण कर ले तो वह राजाओं-महाराजाओं को भी घास के तृण की तरह कगाल बना देता है।

17चाहे वे द्वार-द्वार माँगते रहें परन्तु उन्हें भिक्षा नहीं मिलती॥ १६ ॥

18श्लोक महला १॥

19यदि कोई चोर पराया धर लूट ले और पराए घर की लूट पितरों के नमित श्राद्ध करे तो

20परलोक में वस्तु पहचानी जाती है। इस तरह वह पितरों को चोर बना देती है। (अर्थात् पित्तरों को दण्ड मिलता और चोरी की वस्तु से पुण्य नहीं मिलता)

21प्रभु आगे यह न्याय करता है कि जो ब्राहाण अपने यजमान से वह चोरी की वस्तु पितरों नमित्त दान करवाता है, उस दलाल ब्राहाण के हाथ काट दिए जाते हैं।

22हे नानक ! आगे परलोक में केवल यही प्राप्त होता है, जो मनुष्य अपने परिश्रम से कम कर देता है॥ १॥

23महला १॥

24जैसे स्त्री को बार-बार मासिक-धर्म होता है,

25वैसे झूठे इन्सान के मुँह में झूठ ही बना रहता है। ऐसा इन्सान सदैव ही दु:खी होता है।

26ऐसे इन्सान पवित्र नहीं कहे जाते, जो अपने शरीर को शुद्ध करके बैठ जाते हैं।

27हे नानक ! पवित्र लोग वही हैं, जिनके मन में प्रभु निवास करता है॥ २ ॥

28पउड़ी।

29जिन लोगों के पास पवन-वेग की तरह तेज चलने वाले सुन्दर काठीधारी घोड़े हैं,

30जिन्होंने अपनी रानियों के रनिवास को हर प्रकार के रंगों से सजाया है, जो मकानों, मंडपों एवं ऊँचे मन्दिरों में रहते हैं और आडम्बर करते रहते हैं।

31जो अपनी मन लुभावनी बातें करते हैं, परन्तु प्रभु को नहीं जानते इसलिए उन्होंने अपने जीवन की बाजी हार दी है।

32जिन व्यक्तियों ने दूसरों पर हुक्म चला कर भोजन खाया है और अपने महलों को देखकर मृत्यु को भुला दिया है

33जब उन पर बुढ़ापा आ गया तो उसके आगे उनका यौवन हार गया अर्थात् बुढ़ापे ने उनका यौवन नष्ट कर दिया ॥ १७ ॥

34श्लोक महला १॥

35यदि सूतक रूपी वहम को सत्य मान लिया जाए तो सूतक सब में होता है।

36गोबर एवं लकड़ी में भी कीड़ा होता है।

37जितने भी अनाज के दाने इस्तेमाल किए जाते हैं, कोई भी दाना जीव के बिना नहीं।

38सर्वप्रथम जल ही जीवन है, जिससे सब कुछ हरा-भरा (ताजा) होता है।

39सूतक किस तरह दूर रखा जा सकता है ? यह सूतक हमारी पाकशाला (रसोई) में भी रहता है।

40हे नानक ! भ्रमों के कारण पड़ा सूतक इस तरह कभी दूर नहीं होता, इसे ज्ञान द्वारा ही शुद्ध करके दूर किया जा सकता है॥ १॥

41महला १॥

42मन का सूतक लोभ है अर्थात् लोभ रूपी सूतक मन को चिपकता है और जीभ का सूतक झूठ है अर्थात् झुठ रूपी सूतक जीभ से लगता है।

43ऑखों का सूतक पराई नारी, पराया-धन एवं रूप-यौवन को देखना है।

44कानों का सूतक कानों से पराई निन्दा सुनना है।

45हे नानक ! इन सूतकों के कारण मनुष्य की आत्मा जकड़ी हुई यमपुरी जाती है॥ २॥

46महला १॥

47यह जीवन-मृत्यु वाला सूतक सिर्फ भ्र्म ही है, जो द्वैतभाव के कारण सबको लगा हुआ है।

48जन्म एवं मरण प्रभु का हुक्म है और उसकी रज़ा द्वारा ही मनुष्य जन्म लेता और प्राण त्यागता है।

49खाना-पीना पवित्र है, क्योंकि प्रभु ने सभी जीवों को भोजन दिया है।

50हे नानक ! जो गुरुमुख बनकर इस भेद को समझ लेता है, उसे सूतक नहीं लगता॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं