सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 471 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1जब वह नग्न ही नरक को जाता है तो वह सचमुच ही बड़ा भयानक लगता है।

2वह अपने किए हुए अवगुणों पर पश्चाताप करता है॥ १४ ॥

3श्लोक महला १॥

4हे पण्डित ! दया की कपास हो, संतोष का धागा हो, यतीत्व की गांठ हो और सत्य द्वारा बल डाला हो,

5यह ही आत्मा का जनेऊ है, हे पण्डित ! यदि तेरे पास ऐसा जनेऊ है तो मुझे पहना दे।

6ऐसा आत्मा का जनेऊ न ही टूटता है, न इसे मैल लगती है, न ही यह जलता है और न ही यह गुम होता है।

7हे नानक ! वह मनुष्य धन्य हैं जिन्होंने ऐसा जनेऊ अपने गले में पहन लिया है।

8हे पण्डित ! यह जनेऊ तो तुमने चार कौड़ियाँ मूल्य देकर मंगवा लिया और विशिष्ट अनुष्ठान पर अपने यजमान के चौके में बैठकर उसके गले में पहना दिया,

9फिर तुम उसे कान में उपदेश देते हो कि आज से तेरा गुरु ब्राह्मण हो गया।

10परन्तु कुछ समय उपरांत वह यजमान जब प्राण त्याग देता है तो वह जनेऊ उसके पार्थिव शरीर सहित जल जाता है और आत्मा धागे के बिना ही दुनिया से चली जाती है॥ १॥

11महला १॥

12इन्सान लाखों ही चोरियाँ, लाखों ही व्यभिचार करता है और लाखों ही झूठ एवं लाखों ही मंदे वचन बोलता है।

13वह दिन-रात लाखों ही ठगियों एवं गोपनीय पाप प्राणों के साथ बनाए रखता है।

14कपास को कातकर धागा बनाया जाता है और ब्राह्मण आकर इसे बल देकर पहना देता है।

15घर आए हुए अतिथियों को बकरा मार कर पकाया एवं खिलाया जाता है। सभी लोग कहते हैं कि जनेऊ पहना दो।

16जब जनेऊ पुराना हो जाता है तो इसे फॅककर नया जनेऊ पहना दिया जाता है।

17हे नानक ! यदि धागे में दया, संतोष एवं सत्य का बल हो तो आत्मा का यह धागा कभी टूटता नहीं ॥ २ ॥

18महला १॥

19यदि श्रद्धा से प्रभु का नाम-सिमरन किया जाए तो ही सम्मान उत्पन्न होता है।

20प्रभु की गुणस्तुति ही सच्चा जनेऊ है। ऐसा पवित्र धागा प्रभु के दरबार में पहनाया जाता है और यह कभी टूटता नहीं ॥ ३॥

21महला १ ॥

22मनुष्य की इन्द्रिय हेतु कोई धागा नहीं और नारी के लिए भी कोई धागा नहीं अर्थात् स्त्री-पुरुष के भोग-विलास के अंगों पर कोई बन्धन नहीं।

23इनके कारण मनुष्य की दाढ़ी (मुँह) पर नित्य ही अपमान का थूक जाता है अर्थात् भोग-विलास के कारण बेइज्जत होता है।

24पैरों के लिए कोई धागा नहीं जो मंदे स्थान पर जाते हैं और न ही कोई हाथों के लिए धागा है जो मंदे कर्म करते हैं।

25धागा जीभ के लिए भी नहीं जो पराई निंदा करती है और न ही नेत्रों के लिए कोई धागा है जो पराया रूप देखते हैं।

26सत्यता के धागे के बिना ब्राह्मण स्वयं भटकता रहता है।

27दूसरों को धागे वह बंट-बंट कर पहनाता है।

28विवाह करवाने का वह भाड़ा लेता है और

29पत्री निकाल कर वह मार्ग दिखाता है।

30हे लोगो ! सुनो और देखो, यह कितनी आश्चर्यचकित बात है कि

31आत्मिक तौर पर अन्धा होता हुआ भी पण्डित अपना नाम (बुद्धिमान) सुजान कहलवाता है॥ ४ ॥

32पउड़ी॥

33जब प्रभु दयालु होता है तो कृपा करके वह जीवों से कर्म करवाता है।

34वही सेवक उसकी सेवा-भक्ति करता है, जिसे वह हुक्म का भेद बताकर मनवा लेता है।

35प्रभु का हुक्म मानने से मनुष्य स्वीकृत हो जाता है और तब वह सत्य के महल को पा लेता है।

36जो कुछ प्रभु-पति को अच्छा लगता है, वही कुछ वह (पालन) करता है, जब उसकी सेवा सफल हो जाती है तो उसे मनोवांछित फल मिल जाता है।

37वह तब मान-सम्मान सहित प्रभु के दरबार में जाता है॥ १५ ॥

38श्लोक महला १॥

39हे भाई ! गाय एवं ब्राह्मण पर तो तुम कर लगाते हो। गाय के गोबर ने तुझे मोक्ष प्रदान नहीं करना।

40एक तरफ धोती, तिलक एवं माला धारण करते हो लेकिन दूसरी तरफ मुसलमानों से धन-धान्य खाते हो, जिन्हें मलेच्छ कह कर पुकारते हो।

41हे भाई ! अपने घर के अन्दर तुम पूजा-अर्चना करते हो लेकिन बाहर मुसलमानों से डर कर पाखंड करके कुरान पढ़ते एवं मुसलमानों की भाँति जीवन-आचरण धारण करते हो।

42हे भाई ! यह पाखण्ड त्याग दो।

43प्रभु का नाम-सुमिरन करने से ही तुझे मोक्ष प्राप्त होगा ॥ १॥

44महला १॥

45मानव-भक्षी मुसलमान पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ते हैं।

46दूसरी तरफ अत्याचार की छुरी चलाते हैं, उनके गले में धागा है।

47उनके घर में ब्राह्मण शंख बजाते हैं।

48उनको भी वही स्वाद आता है।

49उनकी पूंजी झूठी है और उनका व्यापार झूठा है।

50झुठ बोलकर वह भोजन ग्रहण करते हैं।

51लज्जा एवं धर्म का बसेरा उनसे कहीं दूर है।

52हे नानक ! झूठ उन सभी को भरपूर कर रहा है।

53वे माथे पर तिलक लगाते हैं और कमर के साथ भगवां धोती पहनते हैं।

54उनके हाथ में छुरी है और जगत पर कसाइयों की भाँति अत्याचार कर रहे हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं