सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 46 · Siree Raag

1श्रीरागु महला ५ ॥

2सतिगुरु के मिलन से समस्त दुःख निवृत्त हो गए हैं और सुख स्वरूप परमात्मा हृदय में आ बसा है।

3एक ईश्वर के साथ सुरति लगाने से अन्तर्मन में पवित्र ज्ञान-ज्योति का प्रकाश हो गया है।

4साधू-संतों से भेंट करके मेरा चेहरा उज्ज्वल हो गया है तथा पूर्व कर्मों के लिखे शुभ लेख के कारण मैंने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है।

5सृष्टि के स्वामी गोविंद तथा सत्य नाम का यश सदैव करने से मैं निर्मल हो गया हूँ॥१॥

6हे मेरे मन ! गुरु के शब्द द्वारा ही सुख प्राप्त होता है।

7सतिगुरु की सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती, अपितु गुरु की सेवा से अवश्य फल प्राप्त होता है।॥१॥ रहाउ॥

8भगवान ने मेरी मनोकामनाएँ पूर्ण कर दी हैं और मुझे नाम रूपी खजाना प्राप्त हो गया है।

9अंतर्यामी सदैव तेरे अंग-संग है तथा वह निरपेक्ष कर्ता है, उसकी पहचान कर लो।

10गुरु कृपा द्वारा नाम-सिमरन, दान-पुण्य एवं पवित्र तीर्थ-स्नान करने से मानव का मुख उज्ज्वल हो जाता है अर्थात् ख्याति प्राप्त होती है।

11ऐसे व्यक्ति के अन्तर्मन से काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि सब नष्ट हो जाते हैं तथा अहंकार का त्याग कर देते हैं ॥ २ ॥

12जिन्होंने भगवान के नाम-सिमरन का जीवन में लाभार्जित किया है, उनके समस्त कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।

13ऐसे जीवों को भगवान स्वयं कृपा करके अपने साथ मिलाता है और उन्हें अपना नाम-सिमरन प्रदान करता है।

14जिन पर भगवान कृपालु हुआ है, उनका आवागमन समाप्त हो गया है।

15उन्होंने गुरु के उपदेश का मनन करके सत्यस्वरूप परमात्मा का दर प्राप्त किया है॥ ३॥

16परमात्मा अपनी दया-दृष्टि से भक्तों की स्वयं विषय-विकारों से रक्षा करता है।

17इहलोक एवं परलोक में उनके मुख उज्ज्वल हो जाते हैं, जो पारब्रह्म के गुणों को हृदय में स्मरण करते हैं।

18दिन के आठों पहर ही वह ईश्वर के सर्वगुणों का यशोगान करते हैं तथा उसकी अनन्त प्रीत में मग्न हैं।

19हे नानक ! मै सुखों के सागर पारब्रह्म पर सदैव बलिहारी जाता हूँ ॥४॥११॥८१॥

20श्रीरागु महला ५ ॥

21मानव को यदि पूर्ण सतिगुरु मिल जाए तो उसे नाम रूपी खजाना मिल जाता है।

22हे प्रभु ! तुम मुझ पर अपनी ऐसी कृपा करो कि मैं तुम्हारे नामामृत का जाप करूँ।

23मेरे जन्म-मरण का दुख दूर हो जाए तो मेरा सहजावस्था में ध्यान लग जाए॥१॥

24हे मेरे मन ! तुम प्रभु की शरण प्राप्त करो।

25उस एक परमात्मा के नाम का ध्यान करो, क्योंकि उस हरि के बिना अन्य कोई नहीं है ॥१॥ रहाउ ॥

26उस परमेश्वर का मूल्यांकन कदापि नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह परमात्मा अथाह गुणों का सागर है।

27सौभाग्य के कारण तुम सत्संग में मिल जाओ तथा वहाँ से श्रद्धा रूपी मूल्य देकर गुरु से सत्य उपदेश खरीद लो।

28उस सुखों के सागर की सेवा कर अर्थात् श्रद्धा सहित उस परमात्मा की आराधना कर, वह राजाओं का भी महाराजा सबसे बड़ा मालिक है॥ २॥

29हमें प्रभु के चरण कवलों का सहारा है क्योंकि उसके अतिरिक्त अन्य कोई ठिकाना नहीं।

30हे परमेश्वर ! तुम्हारी शक्ति से ही मेरा अस्तित्व है। मुझे आपका ही आश्रय है और आपके सत्य द्वारा ही मैं जीवित हूँ।

31हे प्रभु ! सम्मानहीनों का ही तू सम्मान है जिन पर तुम्हारी कृपा हुई है, वह तुझ में ही विलीन हुए हैं।॥३॥

32गोविन्द को आठों प्रहर जपते रहना चाहिए, उसकी आराधना करनी चाहिए।

33भगवान अपनी कृपा करके जीवों के प्राणों, तन, धन की विषय-विकारों से रक्षा करता है।

34हे नानक ! परमात्मा ने मेरे समस्त पाप दूर कर दिए हैं, चूकि वह पारब्रह्म क्षमाशील है॥ ४॥ १२॥ ६२॥

35श्रीरागु महला ५ ॥

36भक्तों की उस परमसत्य परमात्मा से प्रीति लगी है, जो न कभी जन्म लेता है और न ही मरता है।

37जुदा किए भी वह जुदा नहीं होता क्योंकि वह परमात्मा कण-कण में विद्यमान है।

38वह प्रभु अनाथों के दुःख-दर्द नाश करता है और अपने भक्तों को आदर-सहित मिलता है।

39हे मेरी माता ! वह माया रहित प्रभु आश्चर्यजनक स्वरूप वाला है तथा गुरु ने आकर मुझे उससे मिला दिया है॥१॥

40हे भाई ! उस परमेश्वर को अपना मित्र बना।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं