सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 469 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1अन्धी प्रजा ज्ञान से विहीन है और मृतक की भाँति चुपचाप अन्याय सहती है।

2ज्ञानी नृत्य करते हैं, बाजे बजाते और अनेक प्रकार के रूप धारण करके श्रृंगार करते हैं।

3वे ऊँची आवाज़ में पुकारते हैं एवं युद्ध काव्य एवं शूरवीरों की शूरवीरता की कहानियाँ गाते हैं।

4मूर्ख पण्डित अपनी चतुराई एवं हुज्जत द्वारा धन-संग्रह करता है, उसका केवल धन से ही प्रेम है।

5धर्मी लोग धर्म का कर्म करते हैं और मोक्ष की माँग करते हैं।

6परन्तु उसके प्रभाव से वंचित हो जाते हैं क्योंकि स्वार्थवश वो यती कहलवाने वाले जीवन की युक्ति को नहीं समझते और व्यर्थ ही घर-बार छोड़ देते है।

7सभी अपने आप को पूर्ण भक्त साबित करते है कोई स्वयं को कम नहीं समझता

8हे नानक ! यदि इज्जत का तराजू पिछले पलड़े में डाल दिया जाए तो ही मनुष्य भलीभांति तुला हुआ मालूम होता है॥ २॥

9महला १॥

10हे नानक ! बुराई भली प्रकार उजागर हो जाती है क्योंकि वह सत्य-परमशेवर सब कुछ देखता है।

11हरेक ने जगत में आगे बढ़ने हेतु छलांग लगाई है परन्तु जो कुछ जगत का रचयिता करता है, वही होता है।

12परलोक में जाति एवं बाहुबल का कोई मूल्य नहीं क्योंकि वहाँ तो जीव नवीन होते हैं।

13जिन्हें कर्मो का लेखा-जोखा होने पर सम्मान प्राप्त होता है, वही भले कहे जा सकते हैं। ३ ॥

14पउड़ी॥

15हे विधाता ! तूने आरम्भ से ही जिन जीवों का अच्छा भाग्य लिख दिया है तो ही उन्होंने अपने मालिक-प्रभु को याद किया है।

16इन जीवों के वश में कुछ भी नहीं, यह विभिन्न प्रकार का जगत तूने ही उत्पन्न किया है।

17हे प्रभु ! कुछ जीवों को तू अपने साथ मिला लेता है और कुछ जीवों को स्वयं ही दूर करके ख्वार करता रहता है।

18जहाँ तूने खुद ही किसी को अपनी सूझ प्रदान की है, गुरु की कृपा से उसने ही तुझे जाना है

19और वह सहज ही सत्य में समा गया है॥ ११॥

20श्लोक महला १॥

21दुःख औषधि है और सुख रोग है, क्योंकि जब सुख मिल जाता है तो जीव को प्रभु-स्मरण ही नहीं होता।

22हे प्रभु ! तू सृष्टि रचयिता है, मैं कुछ भी नहीं कर सकता। यदि मैं कुछ करने का प्रयास भी करूं तो भी कुछ नहीं होता।॥ १॥

23हे जगत-रचयिता ! मैं तुझ पर बलिहारी जाता हूँ, तू अपनी कुदरत में निवास कर रहा है,

24और तेरा अन्त नहीं पाया जा सकता ॥ १॥ रहाउ॥

25हे प्रभु ! जीवों में ही तेरी ज्योति विद्यमान है और जीव तेरी ज्योति में विद्यमान हैं। हे सर्वकला सम्पूर्ण ! तू सर्वव्यापक है। तू सच्चा मालिक हैं।

26तेरी महिमा अत्यंत सुन्दर है, जो तेरी स्तुति करता है, वह संसार सागर से पार हो जाता है।

27हे नानक ! यह तो जगत-रचयिता की ही सब लीला है, जो कुछ प्रभु ने करना है, उसे वह किए जा रहा है॥ २॥

28महला २ ॥

29योगियों का धर्म ज्ञान प्राप्त करना है और ब्राहाण का धर्म वेदों का अध्ययन करना है।

30क्षत्रियों का धर्म शूरवीरता के कार्य करना है और शूद्रों का धर्म दूसरों की सेवा करना है।

31परन्तु सभी का धर्म एक ईश्वर का सुमिरन करना है। यदि कोई इस रहस्य को जानता है तो नानक उसका दास है और वह पुरुष स्वयं ही निरंजन प्रभु है॥ ३॥

32महला २॥

33एक कृष्ण ही सभी देवताओं का देव है। वह उन देवताओं ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव सब की भी आत्मा है।

34सब जीवों में बसने वाला वासुदेव स्वयं ही इनकी आत्मा है, यदि कोई इस रहस्य को समझता हो, नानक उसका दास है, वह स्वयं ही निरंजन प्रभु है॥ ४॥

35महला १॥

36जैसे घड़े में बंधा हुआ जल टिका रहता है वैसे ही जल के बिना घड़ा भी नहीं बन सकता।

37इसी तरह (गुरु के) ज्ञान का वश में किया हुआ मन टिका रहता है परन्तु गुरु के बिना ज्ञान नर्हीं होता॥ ५॥

38पउड़ी॥

39यदि पढ़ा-लिखा विद्वान व्यक्ति गुनहगार हो तो अनपढ़ इन्सान को डरना नहीं चाहिए क्योंकि नेक होने के कारण उस अनपढ़ को दण्ड नहीं मिलता।

40मनुष्य जैसे कर्म करता है, वैसा ही उसका नाम दुनिया में गूंजता है।

41हमें ऐसी जीवन की खेल नहीं खेलनी चाहिए, जिसके फलस्वरूप प्रभु के दरबार में पहुँचने पर हारना पड़े।

42विद्वान एवं अनपढ़ के कर्मों का लेखा-जोखा परलोक में होगा,

43स्वेच्छाचारी मनुष्य को परलोक में कर्मों का दण्ड अवश्य मिलता है॥ १२॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं