सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 466 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1अलक्ष्य प्रभु का रूप सूक्ष्म है, उसका नाम निरंजन है और यह दुनिया ही उसका शरीर है।

2दानी के मन में संतोष उत्पन्न होता है और वह दान देने के बारे में विचार करते हैं।

3परन्तु दिए दान के फलस्वरूप हजारों गुणा माँगता है और अभिलाषा करता है कि संसार उसकी शोभा करता रहे।

4चोर, व्यभिचारी तथा झूठे आचरण वाले पापी विकारी ऐसे लोग भी हैं,

5जो कुछ उनके पास था, कर्म-फल भोगकर यहाँ से खाली ही चले जाते हैं। क्या उन्होंने कोई शुभ-कर्म किया ?

6समुद्र, धरती, देवताओं की पुरियों, लोकों, सूर्य, चन्द्रमा एवं तारों वाले इस जगत में बेअंत जीव रहते हैं।

7हे प्रभु ! यह जीव जो कुछ कहते हैं, तू उन्हें जानता है। तू ही उनका भरण-पोषण करता है।

8हे नानक ! भक्तों को परमात्मा की महिमा-स्तुति करने की भूख लगी रहती है और उसका सत्य नाम ही उनका आधार है।

9वे गुणवान पवित्र-पुरुषों के चरणों की धूल बनकर रात-दिन सदा आनंद में रहते हैं।॥ १॥

10महला १ ॥

11मुसलमान जब मरता है तो उसे दफनाया जाता है और उसका शरीर मिट्टी बन जाता है लेकिन जब वह मिट्टी कुम्हार के पास आती है तो

12वह इससे बर्तन एवं ईंटें बनाता है, यह जलती हुई मिट्टी चीखती-चिल्लाती है।

13बेचारी मिट्टी जल-जलकर रोती है और जलते हुए अंगारे उस पर गिरते हैं।

14गुरु नानक देव जी कहते हैं कि जिस कर्ता प्रभु ने यह संसार बनाया है, वही इसका भेद जानता है कि जलाना भला है अथवा दफन करना ॥ २ ॥

15पउड़ी॥

16सच्चे गुरु के बिना किसी भी मनुष्य को प्रभु प्राप्त नहीं हुआ और ना कभी होगा क्योंकि

17सतिगुरु के अन्तर्मन में प्रभु ने खुद को रखा हुआ है, मैंने यह तथ्य प्रत्यक्ष तौर पर कहकर सबको सुना दिया है।

18जिन्होंने अपने अन्तर से सांसारिक मोह को मिटा दिया है, वे सतिगुरु से मिलकर मुक्त हो गए हैं।

19उत्तम विचार यही है केि जिसने अपना चित्त सत्य से लगा लिया है,

20उसने जगत का जीवनदाता प्रभु पा लिया है॥ ६॥

21श्लोक महला १॥

22मनुष्य अहंकार में जगत में आया है और अहंकार में ही जगत से चला गया है।

23उसने अहंकार में जन्म लिया था और अहंकार में ही मर गया है।

24अहंकार में ही उसने किसी को कुछ दिया था और अहंकार में ही किसी से कुछ लिया था।

25अहंकार में ही मनुष्य ने धन कमाया था और अहंकारवश ही वह गंवा गया था।

26अहंकारवश ही वह सत्यवादी और झूठा बन जाता है।

27अहंकार में ही वह पाप एवं पुण्य का विचार करता है।

28अहंकार में ही मनुष्य नरक अथवा स्वर्ग में जन्म लेता है।

29अहंकार में ही वह कभी हँसता है और अहंकारवश ही वह कभी रोता है।

30अहंत्व में उसकी मति पापों से भर जाती है और अहंत्व में ही अपने पापों को तीर्थ-स्नान द्वारा शुद्ध करता फिरता है।

31वह अहंत्व में अपनी जाति-पाति भी गंवा लेता है।

32अहंकार में ही मनुष्य मूर्ख एवं बुद्धिमान बनता है।

33लेकिन वह मोक्ष एवं मुक्ति के सार (रहस्य) को नहीं जानता।

34वह अभिमान में ही माया को सत्य समझता है और अभिमान में ही इसे पेड़ की छाया की तरह झूठी समझता है।

35अहंकारवश ही प्राणी बार-बार योनियों में जन्म लेता है।

36यदि अहंकार दूर हो जाए तभी प्रभु का द्वार सूझता है।

37अन्यथा ज्ञान-विहीन मनुष्य वाद-विवादों में ही उलझा रहता है।

38हे नानक ! प्रभु के हुक्मानुसार मनुष्य की किस्मत का लेख लिखा जाता है।

39मनुष्य जैसी विचारधारा रखता है, वैसा ही सत्य को मानने लगता है॥ १ ॥

40महला २॥

41अहंकार का यह स्वभाव है कि मनुष्य अहंकार में ही कर्म करता है।

42यह अहंकार जीव के बंधनों का कारण है, इसलिए जीव बार-बार योनियों में पड़ता है।

43वास्तव में यह अहंकार कहाँ से उत्पन्न होता है और किस युक्ति द्वारा इस पर प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है।

44प्रभु की रज़ा यह है केि अहंकार के कारण मनुष्य अपने पूर्व कर्मो के अनुसार भटकता रहे।

45अहंकार एक दीर्घ रोग है परन्तु इसका उपचार भी शामिल है।

46यदि प्रभु कृपा-दृष्टि धारण करे तो मनुष्य गुरु के शब्द अनुसार कर्म करता है (यही इस रोग का उपचार है)।

47नानक का कथन है कि हे लोगो ! सुनो, संयम द्वारा यह अहंकार दुःख का रोग निवृत्त हो जाता है।(संयम मुक्त भोग और पूर्ण त्याग के मध्य आत्मनियंत्रण की स्थिति है।) ॥ २ ॥

48पउड़ी॥

49जिन्होंने एक परम सत्य का ही ध्यान किया है, उन संतोषी व्यक्तियों ने ही परमात्मा की सेवा-भक्ति की है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं