गुरु ग्रंथ साहिब 465 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1ज्ञान की प्राप्ति केवल बातों से नहीं होती, इसका कथन करना लोहे की भाँति कठिन है।
2यदि भगवान की मेहर हो जाए तो ही ज्ञान प्राप्त होता है, अन्य चतुराई एवं छल-कपट तो नाश करने वाले हैं।॥ २॥
3पउड़ी॥
4यदि दयालु प्रभु करुणा-दृष्टि धारण करे तो उसकी कृपा से सच्चे गुरु की लब्धि होती है।
5यह जीवात्मा अनेक जन्मों में भटकती रही, परन्तु सतिगुरु की शरण में आने से उसे सतिगुरु ने शब्द का भेद सुनाया।
6हे संसार के सब लोगो ! ध्यान से सुनो, सतिगुरु जैसा बड़ा कोई दाता नहीं।
7जो मनुष्य अपने मन से अहंत्व मिटा देता है उसे सतिगुरु मिलता है और सच्चे गुरु के माध्यम से सत्य की प्राप्ति होती है।
8सच्चा गुरु ही सत्य के रहस्य को समझाता है॥ ४॥
9श्लोक महला १ ॥
10(जैसे रासघारी रास करते हैं, वैसे ही परमात्मा की भी रासलीला हो रही है।) इस रासलीला में घड़ियों नृत्य करने वाली गोपियाँ हैं और सारे प्रहर कान्हा-गोपाल है।
11पवन, पानी एवं अग्नि इस रास लीला के पात्रों के आभूषण हैं और सूर्य एवं चाँद स्वांग धारण करने वाले नट हैं।
12समस्त धरती नाटक करने वालों का माल, धन है परन्तु ये सभी जंजाल ही हैं।
13हे नानक ! ज्ञान से विहीन दुनिया इस नाटक में लुट जाती है और यमदूत उसे अपना ग्रास बना लेता है॥ १॥
14महला १॥
15(समाज की अदभुत विडम्बना है कि) चेले ताल बजाते हैं और उनके गुरु नाचते हैं।
16वह धुंघरु बांधकर अपने पैर हिलाते हैं और मस्त होकर अपना सिर घुमाते हैं।
17उनके सिर के बालों पर उड़-उड़कर धूल पड़ती है।
18यह तमाशा देखकर लोग हँसते हैं और घर को चले जाते हैं।
19रोटी के कारण वे ताल मिलाते हैं
20वह अपने आपको धरती पर पछाड़ते हैं।
21(संसार के मंच पर नाटक करने वाले जीव) गोपियों एवं कान्हा बनकर गाते हैं।
22सीता, राजा राम बनकर गाते हैं।
23किन्तु निर्भय, निरंकार प्रभु का ही नाम सत्य है
24जिसने समूची सृष्टि की रचना की है।
25जिन सेवकों का भाग्य उदय होता है, वे प्रभु की सेवा करते हैं।
26जिनके मन में प्रभु प्रेम का चाव है उनकी रात्रि सुहावनी हो जाती है।
27जिन्होंने गुरु विचारधारा द्वारा यह शिक्षा सीख ली है,
28दयालु स्वामी अपनी कृपा-दृष्टि से ही उन्हें मुक्ति प्रदान कर देता है।
29अनेकों ही कोल्हू, चरखा, चक्कियों एवं चाक हैं।
30मारूथल के बवन्डर भी अनन्त हैं।
31अनेकों ही लद्रु, मधानियाँ एवं अन्न निकालने के यन्त्र हैं।
32पक्षी घूमते हुए दम नहीं लेते।
33कई यंत्र लोहे के शूल पर चढ़ाकर घुमाए जाते हैं।
34हे नानक ! घूमने वाले एवं यंत्रों की गणना का कोई अन्त नहीं।
35जो प्राणी माया के बन्धनों में फंस जाते हैं, उन्हें धर्मराज ऐसे ही कर्मों के अनुसार घुमाता है।
36अपने किए कर्मो अनुसार ही प्रत्येक जीव नृत्य करता है।
37जगत की मोहिनी में फँसकर जो नाच-नाचकर हँसता है वह मृत्यु के समय रोता है।
38वे उड़कर भी बच नहीं सका और न ही कोई सिद्धि हासिल कर सकता है।
39नाचना एवं कूदना मन का चाव है।
40हे नानक ! जिनके हृदय में प्रभु का भय विद्यमान है, उनके हृदय में ही उसका प्रेम है ॥ २ ॥
41पउड़ी ॥
42हे प्रभु ! तेरा नाम निरंकार है और तेरा नाम याद करने रो मनुष्य नरक में नहीं जाता।
43प्राण एवं तन उस प्रभु के दिए हुए हैं, जो कुछ वह देता है, जीव वही कुछ खाता है। अन्य कुछ कहना निरर्थक है।
44हे प्राणी ! यदि तू अपना भला चाहता है तो पुण्य कर्म कर और नीच (विनीत) कहलवा अर्थात् विनीत रहना चाहिए।
45यदि कोई जोरावर इन्सान बुढ़ापे को दूर रखना चाहे तो भी बुढ़ापा अपना वेष धारण करके आ ही जाता है।
46जब मनुष्य के जीवन की घड़ियाँ पूरी हो जाती हैं तो दुनिया में कोई नहीं रह सकता अर्थात् आयु पूर्ण होने के बाद मृत्यु ही प्राप्त होती है।॥ ५॥
47श्लोक महला १॥
48मुसलमानों को शरीअत की प्रशंसा सबसे अच्छी लगती है और वे उसे पढ़-पढ़कर विचार करते हैं (अर्थात् शरीअत को ऊँचा मानते हुए उसे ही कानून समझते हैं)।
49मुसलमानों का यही मानना है कि खुदा का प्यारा बन्दा वही है जो अल्लाह के दर्शन-दीदार करने हेतु शरीअत की बन्दिश में पड़ता है।
50हिन्दू शास्त्र द्वारा प्रशंसनीय भगवान की स्तुति करते हैं, जिसका रूप बेअंत सुन्दर है।
51वे तीर्थ-स्थानों पर स्नान करते, देवताओं की मूर्तियों की पूजा-अर्चना करते हैं और चन्दन की सुगन्धि का प्रयोग करते हैं।
52योगी समाधि लगाकर निर्गुण प्रभु का ध्यान करते हैं और करतार को ‘अलख' नाम से पुकारते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं