सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 464 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1पवन और जल भी विस्मय का कारण है।

2बड़ी हैरानी है कि अनेक प्रकार की अग्नियाँ अदभुत खेलें खेलती हैं।

3धरती का वजूद भी हैरानी का विषय है और जीवों की उत्पत्ति के चारों स्रोत भी हैरान कर रहे हैं।

4जीव जिन पदाथों के स्वाद में लगे हुए हैं, ये भी विस्मयकारक हैं।

5संयोग और वियोग भी विचित्र हैं।

6संसार की भूख एवं भोग-विलास भी हैरानी का कारण बनी हुई है।

7भगवान की महिमा-स्तुति भी आश्चर्यजनक है।

8इन्सान का कुमार्गगामी होना और सन्मार्ग पर आ जाना भी विचित्र है।

9यह एक बड़ा ही विस्मय का विषय है कि परमात्मा जीवों के पास भी है और उनसे दूर भी है।

10वे भक्त अदभुत हैं जो परमात्मा को अपने नेत्रों से प्रत्यक्ष देखते हैं।

11नानक का कथन है कि हे मालिक ! तेरी कुदरत का बड़ा विस्मय देखकर मैं आश्चर्यचकित हो रहा हूँ।

12तेरी कुदरत के इस अदभुत कौतुक को पूर्ण भाग्यवान ही समझ सकता है। १॥

13महला १॥

14जो कुछ दिखाई देता है और सुना जा रहा है, यह सब कुदरत के अन्तर्गत ही है, कुदरत अनुसार ही भय एवं सुख का सार है।

15आकाश, पाताल में कुदरत ही मौजूद है और यह सारी सृष्टि रचना कुदरत के अनुरूप ही है।

16कुदरत द्वारा ही वेद, पुराण, शरीयत इत्यादि धार्मिक ग्रंथ हैं और कुदरत अनुसार ही सर्व विचार हैं।

17कुदरत अनुसार ही खाना, पीना एवं पहनना है, कुदरत द्वारा ही हर तरफ प्रेम-भावना है।

18कुदरत अनुसार ही जगत के जीवों में जातियाँ, रंग एवं प्रकार हैं।

19कुदरत अनुसार ही अच्छाइयाँ एवं बुराइयाँ हैं, कुदरत अनुसार ही मान एवं अभिमान है।

20कुदरत अनुसार ही पवन, पानी एवं अग्नि है, कुदरत अनुसार ही धरती एवं मिट्टी है।

21हे प्रभु! यह सब तेरी कुदरत है, तू अपनी कुदरत का मालिक एवं रचयिता है और अपने पावन नाम के कारण तेरी बड़ी महिमा है।

22हे नानक ! प्रभु अपने हुक्म अनुसार अपनी सृष्टि को देखता एवं क्रियाशील है, वह सर्वव्यापक है एवं अपने विधान अनुसार ही सबकुछ करता है॥२॥

23पउड़ी ॥

24मनुष्य जगत में अपने भोग भोगकर मरणोपरांत ढेरी हो जाता है अर्थात् आत्मा चली जाती है।

25जब मनुष्य दुनिया के धंधों में बड़ा मानकर चला जाता है तो उसकी गर्दन में जंजीर डाल दी जाती है और उसे आगे धकेल दिया जाता है।

26वहाँ उसके कर्मो का विचार किया जाता है और उसे बिठा कर उसका लेखा समझाया जाता है।

27जब उसे दण्ड मिलता है तो उसे कोई स्थान नहीं मिलता, अब उसका रोना भी कौन सुनेगा ?

28ज्ञानहीन मनुष्य ने अपना दुर्लभ जीवन व्यर्थ ही नष्ट कर लिया ॥ ३॥

29श्लोक महला १॥

30प्रभु के भय में अनेक प्रकार की पवन हमेशा चलती रहती है।

31परमात्मा के भय में ही लाखों दरिया बहते हैं।

32उसके भय में ही अग्नि अपना कार्य करती है।

33भय में ही घरती भार के नीचे दबी रहती है।

34परमेश्वर के आदेश में ही इन्द्र बादल बनकर सिर पर बोझ लिए चलता फिरता है।

35भय में ही धर्मराज उसके द्वार पर खड़ा है।

36प्रभु के भय में ही सूर्य एवं चंद्रमा सक्रिय हैं।

37करोड़ों कोस चलते रहने के पश्चात् भी उनकी यात्रा का कोई अन्त नहीं।

38सिद्ध, बुद्ध, देवते एवं नाथ-योगी ईश्वर के भय में ही विचरण करते हैं।

39भय में ही आकाश चारों ओर फैला हुआ है।

40प्रभु के भय में ही बड़े-बड़े योद्धा, महाबली एवं शूरवीर क्रियाशील हैं

41प्रभु के भय में ही झुण्ड के झुण्ड जन्मते-मरते रहते हैं।

42प्रभु ने अपने भय में ही सबका भाग्य निश्चित कर रखा है।

43हे नानक ! एक सत्यस्वरूप निरंकार परमात्मा ही निर्भय है॥ १॥

44महला १॥

45हे नानक ! एक निरंकार प्रभु ही निडर है, अन्य तो राम जैसे कितने ही उसके चरणों की धूल हैं।

46कृष्ण-कन्हैया की लीला की अनेक कहानियों दुनिया में प्रचलित हैं और कितने ही पण्डित वेदों का उच्चारण करने वाले हैं।

47अनेक भिखारी नाचने वाले हैं और बार-बार ताल पर झूमते हैं।

48रासधारी बाजार में आते हैं और झूठी रास दिखाते हैं।

49वे राजे-रानियाँ बनकर गाते हैं और उल्ट-पुल्ट बोलते हैं।

50वे लाखों रुपए के कानों के कुण्डल एवं लाखों रुपए के हार पहनते हैं।

51हे नानक ! जिन शरीरों पर वे आभूषण पहनते हैं, वह शरीर तो राख बन जाते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं