गुरु ग्रंथ साहिब 462 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1मेरे अनेक जन्म-मरण बीत गए हैं परन्तु प्रिय के संग बिना गति नहीं होती।
2मैं कुल, रूप, शोभा एवं ज्ञान से विहीन हूँ, हे प्रभु ! तेरे अलावा मेरा कौन है।
3हे प्रिय नाथ ! नानक हाथ जोड़कर तेरी शरण में आया है, मेरी मुक्ति करो।॥ १॥
4जैसे मछली पानी के बिना बिछुड़ कर तन-मन से क्षीण हो जाती है वैसे ही प्रिय-पति प्रभु के बिना मेरा जीवन कैसे कायम रह सकता है ?
5मृग शिकारी के सन्मुख होकर उसका बाण सहता है और मधुर नाद (ध्वनि) से बिंधा हुआ वह अपना मन, तन एवं प्राण अर्पित कर देता है।
6अपने प्रिय से मेरी प्रीति हो गई है, उससे मिलने हेतु मैं वैरागी हो गया हूँ, उस तन को धिक्कार है जो प्रिय प्रभु के बिना एक क्षण भी रहता है।
7अपने प्रिय के प्रेम में इतनी मग्न हो गई हूँ कि मेरी पलकें बन्द ही नहीं होती, मेरा मन रात-दिन प्रभु को याद करता है।
8श्रीरंग प्रभु के रंग में रंगकर और उसके नाम में मस्त होकर मैंने सभी भय, भ्रम, दुविधा निवृत्त कर दिए हैं।
9नानक प्रार्थना करता है कि हे दयालु एवं पूर्ण हरि ! अपनी दया एवं कृपा करो तांकि मैं तेरे प्रेम में मग्न हो जाऊँ॥ २॥
10भैवरा फूल पर गूंजता रहता है, फूलों के रस, सुगन्धि, एवं शहद से मस्त हुआ कमल के प्रेम के कारण यह अपने आपको फंसा लेता है।
11चातक के चित्त में स्वाति बूंद की प्यास है, इसका चित्त मेघ की विचित्र बूंदों हेतु तरसता है, जिनका पान करने से चातक का ताप नाश हो जाता है।
12हे ताप दूर करने वाले ! हे दु:खों का नाश करने वाले हरि ! मुझे मिलो मेरे तन-मन में अत्यंत ही घना प्रेम है।
13हे सुन्दर, चतुर, सुजान स्वामी ! मैं कौन-सी जिह्य से तेरे गुणों का गायन करूँ ?
14हे स्वामी ! मेरी भुजा पकड़ लीजिए और अपना नाम प्रदान करें, जिस पर तू दया-दृष्टि करता है, उसके पाप मिट जाते हैं।
15नानक का कथन है कि मैं तो पतितपावन हरि का ही नाम जपता रहता हूँ और हरि-दर्शन करने से अब मुझे कोई दुख नहीं लगता ॥ ३॥
16मैं अपने चित्त में नाथ को ही याद करता हूँ, हे नाथ ! मुझ अनाथ को अपनी शरण में रखो, तुझे मिलकर मुझे बहुत चाव होता है और मेरे प्राणों को तेरी ही चाहत है।
17हे प्रभु ! तेरे सुन्दर तन पर ही मेरा ध्यान लगा हुआ है, हे गोपाल ! तेरे ज्ञान ने मेरा मन मोहित कर दिया है, तुम ही अपने याचक सेवकों का मान-सम्मान बरकरार रखते हो।
18हे प्रभु ! तुम ही पूर्ण मान-सम्मान प्रदान करते हो, दु:खों का भी तुम नाश करते हो, मेरी समस्त इच्छाएँ तुमने पूरी कर दी हैं।
19वह दिन बड़ा भाग्यवान था, जब प्रभु ने मुझे अपने गले से लगाया, अपने कांत प्रभु को मिलने से मेरी हृदय रूपी सेज सुन्दर हो गई है।
20जब प्रभु ने कृपा-दृष्टि धारण की तो वह मुरारि प्रभु मुझे आ मिला और तब मेरे सभी पाप नष्ट हो गए।
21नानक वन्दना करता है कि मेरी आशा पूर्ण हो गई है क्योंकि गुणों के भण्डार श्रीधर प्रभु मुझे मिल गए हैं॥ ४॥ १॥ १४ ॥
22सबका मालिक वह परमपिता एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला है। वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है, उसका किसी से वैर नहीं, वस्तुतः सब पर उसकी समान दृष्टि है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह स्वयं प्रकाशमान हुआ है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है।
23आसा महला १ ॥
24वार श्लोकों सहित। श्लोक भी महला पहला के लिखे गए हैं। पौड़ियां ढुंडे असराज की ध्वनि पर गायन करना |
25श्लोक महला १॥
26मैं अपने उस गुरु पर दिन में सौ बार बलिहारी जाता हूँ,
27जिसने मनुष्य को देवता बनाने में कोई विलम्ब नहीं किया ॥ १ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं