सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 460 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1धन-दौलत एवं यौवन को छोड़कर तुम चले जाओगे तथा तेरा खाना पहनना भी खत्म हो गया है।

2नानक का कथन है कि तेरे कर्म तेरे साथ जाएँगे, कर्मो का प्रभाव मिटाया नहीं जा सकता॥ १॥

3हे जीव ! जिस तरह हिरण रात्रि में शिकारी द्वारा किए गए चंद्रायण जैसे प्रकाश को देखकर उसके जाल में फंस जाता है, वैसे ही तू झूठी माया के मोह में फँसा हुआ है।

4पाप करने से सुख से हटकर नित्य दु:ख उत्पन्न होते हैं।

5तेरे किए हुए पाप तेरा पीछा नहीं छोड़ेंगे, यमदूत तेरे गले में फँदा डालकर तुझे आगे ले चले हैं।

6राजा हरि चन्द की नगरी जैसी झूठी माया को देखकर तू धोखा खा रहा है और अपनी सेज पर तू मोहिनी रूपी झूठी नारी से भोग कर रहा है।

7लोभ, लालच एवं अहंकार से तुम मस्त हो गए हो और अभिमान से भर गए हो।

8हे नानक ! जिस तरह मृग अज्ञानता में फँस कर नष्ट हो रहा है वैसे ही तेरा भी जन्म-मरण का चक्र नहीं मिटता॥ २ ॥

9मक्खी मीठे में फँसकर ही मर जाती है और उड़ नहीं पाती।

10हाथी गड्ढे में गिर जाए तो तैर कर निकल नहीं सकता।

11जिस जीव-स्त्री को अपना पति-प्रभु एक क्षण भर के लिए भी याद नहीं आया, उसका संसार-सागर से पार होना कठिन हो गया।

12उसके दुःख एवं दण्ड गणना से बाहर हैं, वह अपने कर्मो का फल भोगती है।

13छिपकर किए गए पाप कर्म भी प्रगट हो जाते हैं और लोक-परलोक में वह तबाह हो जाती है।

14हे नानक ! सच्चे गुरु के बिना स्वेच्छाचारिणीरी जीव-स्त्री ठगी जाती है॥ ३॥

15हरि के दास प्रभु-चरणों से लगकर आत्मिक जीवन जीते हैं।

16जो ठाकुर जी की शरण लेते हैं, वह उन्हें अपने गले लगा लेता है।

17वह उन्हें बल, बुद्धि, ज्ञान एवं ध्यान प्रदान करता है और स्वयं ही उनसे अपने नाम का जाप करवाता है।

18प्रभु स्वयं ही सत्संगति है और स्वयं ही संसार का उद्धार कर देता है।

19जिन मनुष्यों के कर्म सदा निर्मल होते हैं, रक्षक प्रभु उनकी रक्षा करता है।

20हे नानक ! हरि के संत हरि की शरण में ही रहते हैं और कभी नरक में नहीं जाते ॥ ४ ॥ २ ॥ ११॥

21आसा महला ५ ॥

22हे मेरे आलस्य ! मुझसे दूर हो जा, मैंने अपने प्रभु के पास प्रार्थना करनी है।

23मैं अपने कांत-प्रभु से रमण करती हूँ और प्रभु की संगति में ही सुन्दर लगती हूँ।

24मैं अपने कांत-स्वामी की संगति में सुन्दर लगती हूँ और रात-दिन उससे रमण करती हूँ।

25मैं श्वास-श्वास से प्रभु को याद करके उसके दर्शन करके जीवित रहती हूँ, मैं हरि का गुणगान करती रहती हूँ।

26विरहा लज्जा करता है, क्योंकि मैंने अपने पति-प्रभु के दर्शन कर लिए हैं और उसकी अमृत से भरी हुई दृष्टि मेरे स्नेह को सींचती है।

27नानक वन्दना करता है कि मेरी इच्छा पूरी हो गई है, जिस पति-प्रभु को मैं खोजता था, वह मुझे मिल गया है॥ १॥

28हे महा पापो ! यहाँ से दौड़ जाओ, क्योंकि जगत का रचयिता प्रभु मेरे हृदय-घर में आया है।

29जब गोविंद मेरे हृदय में प्रगट हुआ तो मेरे भीतर के पाँचों दूत (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) जल गए।

30जब मैंने साधसंगत में शामिल होकर स्तुतिगान किया तो प्यारा गोविंद गोपाल मेरे हृदय में प्रगट हो गया।

31मैंने अदभुत प्रभु के दर्शन कर लिए हैं, वह मुझ पर अमृत बरसा रहा है तथा गुरु की दया से मैंने उसे जान लिया है।

32मेरे मन में अब शांति आई है और खुशी के वाद्य-यन्त्रों से मुझे शुभ कामनाएँ मिल रही हैं, प्रभु का अन्त पाया नहीं जा सकता।

33नानक वन्दना करता है कि सहज सुख का मेल प्रभु ने आप बनाया है॥ २॥

34नारायण का सिमरन करने वाले इन्सान को कभी नरक नहीं देखना पड़ा।

35धर्मराज स्वयं उसकी जय-जयकार करता है और यमदूत भाग जाते हैं।

36साधसंगति में हरि का भजन करने से मनुष्य को धर्म, धैर्य, सहज सुख प्राप्त हो जाता है।

37अपनी अनुकंपा करके प्रभु ने उनका संसार-सागर से उद्धार कर दिया है, जिन्होंने मोह, ममता एवं अहंत्व को त्याग दिया है।

38गुरु ने उनको प्रभुसे मिला दिया है और प्रभु ने उन्हें अपने गले से लगा लिया है, गोविन्द का भजन करने से वे तृप्त हो गए हैं।

39नानक वन्दना करता है कि प्रभु की आराधना करने से समस्त आशाएँ पूरी हो जाती हैं।॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं