सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 45 · Siree Raag · Guru Arjan Dev Ji

1हे मेरे मन ! तू हरि-परमेश्वर के नाम का ध्यान किया करो।

2चूंकि भगवान का नाम-सिमरन ही सदैव साथ रहता है और सहायक होता है जो आगे जाकर यमों के कष्टों से छुड़ा लेता है॥ १॥ रहाउ॥

3हे जीव ! दुनिया का दिया हुआ सम्मान कभी काम नहीं आता।

4माया का रंग फीका है, जो अन्त में नष्ट हो जाता है।

5जिसके हृदय में प्रभु वास करता है, वही आदरणीय पूर्ण एवं मुख्य है॥२॥

6हे प्राणी ! अपनी अहं-भावना त्याग कर संतों के चरणों की धूल हो जाओ।

7व्यर्थ के उपाय तथा चतुराईयों समस्त त्याग दे और गुरु के चरणाश्रय में आ जा।

8केवल वहीं नाम रूपी रत्न को प्राप्त करता है, जिसके मस्तक पर भाग्य रेखाएँ उज्ज्वल होती हैं॥३ ॥

9हे सज्जनो ! जिसको परमात्मा स्वयं प्रदान करता है, वही नाम को प्राप्त करता है।

10जिस मनुष्य ने अपना अहंत्व रूपी रोग दूर कर लिया है, वही सतिगुरु की सेवा कर सकता है।

11हे नानक ! जिसे गुरु मिला है, उसके सभी दुःख-संताप नष्ट हो गए हैं ॥ ४॥ ८ ॥ ७८ ॥

12श्रीरागु महला ५ ॥

13एक परमात्मा ही मनुष्य का ज्ञाता है तथा वही एक उसका संरक्षक है।

14केवल वही मन का सहारा है और प्राणाधार वही एक प्रभु है।

15उस पारब्रह्म परमात्मा की शरण लेने से सदैव सुखों की उपलब्धि होती है॥ १॥

16हे मेरे मन ! प्रभु-प्राप्ति के अपने अन्य सभी उपाय त्याग दे।

17केवल परिपूर्ण गुरु की नित्य आराधना करो तथा गुरु के मार्गदर्शन से उसी एक परमात्मा में लिवलीन हो जाओ ॥१॥ रहाउ ॥

18एक ईश्वर ही सच्चा भ्राता, मित्र एवं माता-पिता है।

19मेरे मन के भीतर उस प्रभु का ही आश्रय है, जिसने मुझे आत्मा तथा यह देह प्रदान की है।

20उस प्रभु को, जो संसार की प्रत्येक वस्तु अपने अधीन रखता है, मुझे अपने मन में कदापि विस्मृत न हो।॥ २॥

21वह सर्वव्यापक परमेश्वर हृदय रूपी घर में भी विद्यमान है और शरीर के बाहर भी मौजूद है। वह स्वयं ही समस्त स्थानों के भीतर बसा हुआ है।

22जिस सृष्टिकर्ता ने मनुष्य एवं अन्य जीवों की रचना की है, उसकी आठों पहर आराधना करनी चाहिए।

23यदि एक ईश्वर के प्रेम में मग्न हो जाओगे तो तुम्हारे समस्त शोक-संतापों का विनाश हो जाएगा। ३॥

24एक परमात्मा ही पारब्रहा है, अन्य कोई नहीं।

25मनुष्य का जीवन एवं शरीर समस्त उसी की देन हैं, जो कुछ उसे अच्छा लगता है, वही होता है।

26हे नानक ! परिपूर्ण गुरु द्वारा मनुष्य भी सम्पूर्ण हो गया है, क्योंकि उसने गुरुन्मुख होकर भगवान का नाम-सिमरन किया है॥ ४॥ ६॥ ७६॥

27श्रीरागु महला ५ ॥

28जिन्होंने सतिगुरु के उपदेश का चिन्तन किया है, वह मनुष्य पूर्ण व श्रेष्ठ हो जाते हैं।

29जिन पर भगवान स्वयं कृपालु होता है, उनके मन में ज्ञान उत्पन्न होता है,

30जिनके माथे पर शुभ भाग्य अंकित होते हैं, वही भगवान का नाम-सिमरन प्राप्त करते हैं।॥ १॥

31हे मेरे मन ! इसीलिए तुम उस एक परमात्मा के नाम का ध्यान करो,

32क्योंकि नाम-सिमरन से ही मानव के जीवन में श्रेष्ठ सुख उत्पन्न होते हैं तथा प्रभु के दरबार में यह प्रतिष्ठित पोशाक पहन कर जाएगा ॥ १॥ रहाउ॥

33भगवान की प्रेमा-भक्ति करने से मनुष्य जन्म-मरण के भय से मुक्त होता है।

34संतों की संगति करने से मनुष्य निर्मल हो जाता है जिसके फलस्वरूप स्वामी (प्रभु) स्वयं उसका पालन-पोषण करता है।

35उनके आवागमन (जन्म-मरण) की मैल कट जाती है और वे सतिगुरु का दर्शन करके कृतार्थ हो जाता है। २ ॥

36परम-परमेश्वर कण-कण में विद्यमान है।

37केवल परमात्मा ही समस्त प्राणियों का स्वामी है, अन्य दूसरा कोई नहीं।

38उसकी शरण में आने से जीव को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है, जो कुछ परमेश्वर करना चाहता है, वही होता है॥३॥

39जिनके हृदय में सर्वज्ञाता परमेश्वर वास करता है, वह सम्पूर्ण एवं प्रमुख है।

40वह जीव शुभ गुणों के कारण श्रेष्ठ पुरुष हो जाते हैं। उनकी सुकीर्ति पवित्र होकर सम्पूर्ण विश्व में फैल जाती है।

41हे नानक ! जिन्होंने मेरे परमात्मा का ध्यान किया है, मैं उन पर कुर्बान हूँ॥ ४॥ १०॥ ८०॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं