गुरु ग्रंथ साहिब 459 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1प्रभु के चरण-कमल के साथ प्रेम करने से बुराइयाँ एवं पाप नष्ट हो चुके हैं।
2फिर दुःख, भूख एवं दारिद्रता भाग गए हैं और सन्मार्ग प्रत्यक्ष दिखाई दिया है।
3सत्संगति में सम्मिलित होकर प्रभु-नाम से रंग गया हूँ और मेरी मनोकामना पूरी हो गई है।
4हरि के दर्शन करके मेरी इच्छा पूरी हो गई है और समस्त वंशावलि भी पार हो गई है।
5हे नानक ! दिन-रात सदैव ही हरि-परमेश्वर का भजन करने से आनंद बना रहता है॥४॥६॥९॥
6आसा महला ५ छंत घरु ७
7ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
8श्लोक॥
9मैं शुभ चिंतन करता रहूँ, गोविंद का नाम याद करता रहूँ और साधु की निर्मल संगति करता रहूँ।
10नानक की प्रार्थना है कि हे भगवान ! मुझ पर ऐसी कृपा करो कि मैं एक क्षण भर के लिए भी तेरा नाम न भूलूं।॥ १॥
11छंद॥
12जब ओस से भीगी हुई रात्रि में तारे चमकते हैं
13तो मेरे राम के प्यारे संतजन इस सुहावनी रात्रि को जागते रहते हैं।
14वे राम के प्यारे संतजन सदैव ही जागते हैं और नित्य ही नाम को याद करते रहते हैं।
15वे अपने हृदय में प्रभु के चरण-कमल का ध्यान करते हैं और एक क्षण भर के लिए भी उसे विस्मृत नहीं करते।
16वे मन का अहंकार, मोह, विकार इत्यादि बुराइयों को त्याग कर दु:खों को नाश कर देते हैं।
17नानक वन्दना करता है कि हरि के दास प्यारे संतजन सदैव ही जागते रहते हैं॥ १ ॥
18मेरे मन के सेज की भव्य सजावट हो गई है।
19जब से मैंने सुना है कि मेरा प्रभु आ रहा है तो मेरे मन में आनंद उत्पन्न हो गया है।
20स्वामी प्रभु को मिलकर मैं सुखी हो गई हूँ और चाव, मंगल के रस से भर गई हूँ।
21प्रभु मेरे अंग-संग लग गया है, जिससे दुःख भाग गए हैं और मेरा मन-तन फूल की तरह खिल गया है।
22प्रभु का ध्यान करने से मेरी मनोकामना पूरी हो गई है, मैं अपने विवाह संयोग के समय को शुभ मानती हूँ।
23नानक वन्दना करता है कि श्रीधर प्रभु से मिलकर मुझे समस्त खुशियों का रस प्राप्त हो गयाहै॥ २॥
24मेरी सखियाँ मुझसे मिलकर पूछती हैं कि हमें अपने प्रियतम-पति की कोई निशानी बताओ।
25उसके प्रेम के रस से मैं इतनी भर गई थी कि मैं कुछ भी कह न सकी।
26जगत-रचयिता प्रभु के गुण गहन, गुप्त एवं अपार हैं और वेद भी उसका अन्त नहीं पा सकते।
27मैं भक्ति-भाव से ज्ञान से पूर्ण होने के कारण मैं अपने प्रभु को अच्छी लगने लग गई हूँ।
28सभी गुणों और आध्यात्मिक ज्ञान से भरी हुई , मैं अपने भगवान को प्रसन्न हो गई हूँ।
29नानक विनती करता है कि वह प्रभु के प्रेम रंग में रंगी हुई है और सहज ही उसमें समा गई है॥ ३॥
30जब मैं भगवान की खुशी के गीत गाने लग गया तो मेरे सज्जन-सत्य, संतोष, दया एवं धर्म इत्यादि प्रसन्न हो गए मेरे दुश्मन-काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि दुःख भाग गए।
31मेरी खुशी एवं सुख बढ़ गए, मैं प्रभु के नाम में आनंद प्राप्त करने लगा क्योंकि भगवान ने स्वयं मुझ पर कृपा की है।
32मैं हरि के सुन्दर चरणों से जुड़ गया हूँ और सदा सावधान रहने के कारण मैं बनवारी प्रभु से मिल गया हूँ।
33अब शुभ दिन आ गए हैं और मैंने सहज सुख प्राप्त कर लिया है। प्रभु के चरणों की सेवा करने से मुझे निधियाँ मिल गई हैं।
34नानक प्रार्थना करता है कि हे जगत के स्वामी ! भक्तजन सदैव ही तेरी शरण चाहते हैं॥ ४ ॥ १ ॥ १० ॥
35आसा महला ५ ॥
36हे पथिक ! उठ और यहाँ से चल दे, तू देरी क्यों कर रहा है ?
37तेरे जीवन का नियत समय पूरा हो गया है, फिर तुम झूठे लोभ में क्यों फंसे हुए हो ?
38झूठे लोभ में फँस कर तुम माया के छल के कारण असंख्य पाप करते जा रहे हो।
39यह तन तो भस्म की ढेरी है जिस पर यम ने दृष्टि कर ली है तथा काल ने बेचारे प्राणी को जीत लिया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं