सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 458 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1हे भगवान ! मैं अपराधी, बुद्धिहीन, गुणहीन, अनाथ तथा नीच हूँ।

2हे ठाकुर ! मैं मूर्ख, कठोर, कुलहीन मोह के कीचड़ में फँसा हुआ हूँ।

3भ्रम रूपी कर्मों की मैल एवं अहंत्व की ममता के कारण मृत्यु का ख्याल मेरे मन में याद नहीं आता।

4अज्ञानता के कारण में स्त्री के विनोद एवं माया के आनंद में लिपटा हुआ हूँ।

5मेरा यौवन खत्म होता जा रहा है और बुढ़ापा बढ़ता जा रहा है। मेरी साथी मृत्यु मेरे जीवन के दिन देख रही है।

6नानक प्रार्थना करता है, हे प्रभु ! मुझे तेरी ही आशा है इसलिए मुझ नीच को साधु की शरण में रखो ॥ २॥

7हे नाथ ! मैं अनेक जन्मों में भटका हूँ और योनियों में बहुत संकट उठाए हैं।

8धन-दौलत एवं पदार्थों के भोग को मीठा समझते हुए मैं उन से लिपटा रहा हूँ।

9पापों के बेअंत भार से मैं योनियों में भटकता हुआ संसार में आया हूँ और बहुत सारे प्रदेशों में भाग-दौड़ कर चुका हूँ।

10अब मैंने मुरारि प्रभु की शरण ली है और हरि के नाम द्वारा सर्व सुख प्राप्त कर लिए हैं।

11हे रखवाले प्यारे प्रभु ! मुझ से न कुछ हुआ है और न ही होगा।

12नानक का कथन है कि हे प्रभु ! अब मुझे सहज सुख एवं आनंद मिल गया है और तेरी कृपा से मैं भवसागरं से पार हो गया हूँ॥ ३॥

13जो लोग नाममात्र के ही भक्त हैं, भगवान ने उन्हें भी बचा लिया है। सच्चे भक्तों को क्या संशय होना चाहिए ?

14प्रत्येक यथायोग्य विधि से जैसे भी संभव हो, अपने कानों से हरि-परमेश्वर का यश सुनो।

15हे ज्ञानी पुरुष ! उस प्रभु की वाणी को अपने कानों से सुनो और अपने मन में नाम के भण्डार को प्राप्त कर लो।

16जो व्यवित हरि के रंग में रंग जाते हैं, वे विधाता प्रभु राम के ही गुण गाते रहते हैं।

17यदि धरती कागज बन जाए, वनराज कलम बन जाए और पवन लिखने हेतु लेखक बन जाए

18तो भी बेअंत प्रभु का अन्त नहीं पाया जा सकता। हे नानक ! मैंने उस प्रभु के चरणों की शरण ली है॥ ४॥ ५ ॥ ८॥

19आसा महला ५ ॥

20भगवान सभी पुरुषों का मालिक है और मैंने उसकी शरण ली है।

21अब मेरे प्राण निडर हो गए हैं और मेरी सारी चिन्ता मिट गई है।

22मैं भगवान को ही अपना माता-पिता, पुत्र, मित्र, शुभ-चिन्तक, इष्ट एवं बंधु जानता हूँ।

23गुरु ने मुझे उससे मिलाया है और उसने मुझे बांह से पकड़ कर गले से लगा लिया है, जिसका निर्मल यश संतजन उच्चरित करते हैं।

24वह बेअंत है और उसमें अनेक गुण हैं, उसकी महिमा की कीमत आंकी नहीं जा सकती।

25प्रभु एक है, जिसे अनेक प्रकार से अलक्ष्य ठाकुर कहा जाता है तथा नानक ने उसकी शरण ली है॥ १॥

26जब भगवान स्वयं मेरा मददगार बन गया है तो संसार मेरे लिए अमृत का कुण्ड बन गया।

27राम के नाम की गले में पुष्पमाला पहनने से मेरे दु:ख के दिवस मिट गए हैं।

28मेरे मन में से भ्रम चला गया है, काम, क्रोध, लोभ, अहंकार एवं मोह रूपी विकार नष्ट हो गए हैं। मेरे योनियों के चक्र भी समाप्त हो गए हैं।

29साधु का आंचल पकड़ने से तृष्णा रूपी अग्नि सागर शीतल हो गया है।

30हे साधुओ ! गोविन्द, गोपाल, दयालु समर्थ हरि की जय-जयकार करो।

31हे नानक ! साधु की संगति में मिलकर पूर्ण परमात्मा के नाम का ध्यान करके मैंने परमगति पा ली है॥ २॥

32मैं जहाँ कहीं भी देखता हूँ मैं वहाँ ही उसे अपने साथ व्यापक पाता हूँ।

33एक परमात्मा ही सब जीवों में बसा हुआ है। वह स्वयं ही प्रत्येक हृदय में मौजूद है लेकिन कोई विरला पुरुष ही इसे अनुभव करता है।

34वह जल, धरती, गगन में हर जगह मौजूद है और चींटी एवं हाथी में भी एक समान समाया हुआ है।

35परमात्मा जगत-रचना के प्रारम्भ में भी था, जगत के अन्त में भी होगा और वह अब भी मौजूद है और गुरु की दया से ही वह जाना जाता है।

36हर तरफ ब्रह्म का ही प्रसार है और यह जगत प्रसार ब्रह्म की रचित लीला हो रही है। भक्तजन उस गोविंद को गुणों का भण्डार कहते हैं।

37हे नानक ! अन्तर्यामी स्वामी की आराधना करो; एक प्रभु ही सर्वव्यापी है॥ ३॥

38हरि का नाम-सिमरन करने से दिन-रात सुहावने आ गए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं