सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 457 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1एक प्रभु का चमत्कार एवं प्रकाश वह दसों दिशाओं में देखते हैं।

2नानक वन्दना करता है कि मैं प्रभु के चरणों की आराधना करता हूँ।प्रभु ने भक्त वत्सल होने का अपना विरद् आप बनाया है॥ ४॥ ३॥ ६॥

3आसा महला ५ ॥

4संतजनों का सुहाग ईश्वर सदैव स्थिर है क्योंकि वह न ही मरता है और न ही कहीं जाता है।

5जिसके हृदय घर में प्रभु-पति बसता है, वह सदा ही उसके साथ रमण करती है।

6वह प्रभु अबिनाशी एवं अविगत है और वह सदैव नूतन एवं निर्मल है।

7ठाकुर कहीं दूर नहीं अपितु सदा आसपास है और वह सदैव ही दसों दिशाओं में मौजूद है।

8उस प्राणपति से मुक्ति एवं सुमति प्राप्त होती है। मुझे प्रियतम की प्रीति प्रिय लगती है।

9नानक वही बखान करता है जो उसने गुरु के वचन से समझा है। संतजनों का सुहाग (प्रभु) अटल है क्योंकि वह न ही मरता है और न ही कहीं जाता है॥ १॥

10जिसका पति राम है, वह अत्यंत आनंद प्राप्त करती है।

11वही नारी सुखवंती है और उसी की पूरी शोभा बनती है।

12हरि का यशगान करके वह आदर, सुख एवं कल्याण प्राप्त कर लेती है। वह चतुर प्रभु सदा उसके साथ है।

13सर्व सिद्धियाँ एवं नवनिधियाँ उसके पास हैं। उसके घर में कोई कमी नहीं अपितु सब कुछ उसके पास है।

14प्रियतम-प्रभु द्वारा आदर दिए जाने के कारण उसकी मधुरवाणी हो जाती है और उसका सुहाग भी स्थिर रहता है।

15नानक वही बखान करता है जो कुछ उसने गुरु के वचन द्वारा जाना है कि जिसका पति राम है, वह बड़ा आनन्द प्राप्त करती है॥ २॥

16हे सखी ! आओ, हम संतों के पास सेवा में जुट जाएँ।

17आओ, हम उसके दाने पीसें, उसके चरण धोएं और अपना अहंकार त्याग दें।

18अपना अहंकार त्याग देने से दुःख-संताप मिट जाता है। अपने आप का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।

19हे सखी ! आओ, हम संतों की शरण ले लें, उनकी आज्ञा का पालन करें और जो कुछ भी वह करते हैं, उससे सुखी रहें।

20हमें खुद को दासों की दासी बनाकर मन की चिंता मिटाकर दोनों हाथ जोड़ कर दिन-रात उनकी सेवा में जागना चाहिए।

21नानक वही बखान करता है जो कुछ उसने गुरु के वचन से जाना है। हे सखी ! आओ, संतों के पास आकर हम उनकी सेवा में तत्पर हो जाएँ॥ ३॥

22जिसके माथे पर भाग्य लिखा हुआ है, उसे ही प्रभु अपनी सेवा में लगाता है।

23जिन्हें सत्संगति की प्राप्ति होती है, उनकी आशा पूर्ण हो जाती है।

24सत्संगति में जीव हरि के रंग में लीन हो जाता है और गोविन्द का सिमरन करने लग जाता है।

25भ्रम, मोह, विकार एवं द्वैतवाद वह सब को त्याग देता है।

26जब उसने आनंद से हरि का मंगल गुणगान किया तो उसके मन में सहज स्वभाव शांति आ गई।

27नानक वही वर्णन करता है, जो उसने गुरु के वचन से जाना है कि जिसके माथे पर भाग्य लिखा होता है, वही सेवा में लगता है॥ ४॥ ४॥ ७ ॥

28आसा महला ५ ॥

29श्लोक ॥

30हरि-प्रभु का नाम जपने से यमदूत जीव को कुछ भी नहीं कहता।

31हे नानक ! नाम जपने से मन-तन सुखी हो जाता है और अंततः गोपाल प्रभु मिल जाता है॥ १॥

32छंद॥

33हे हरि ! संतजनों की संगति में मुझसे आकर मिलो और मेरा उद्धार कीजिए।

34मैं दोनों हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि तुम मुझे अपना अनमोल हरि-नाम प्रदान करो।

35हे हरि ! मैं तेरा नाम माँगता हूँ और तेरे चरणों में लगता हूँ यदि तुम दया करते हो तो अपना अहंकार दूर करता हूँ।

36हे करुणामय प्रभु ! मुझ पर मेंहर करो तांकि मैं तेरी शरण में पड़ा रहूँ तथा कहीं ओर न दौडूं।

37हे समर्थ ! अकथनीय, अपार एवं निर्मल स्वामी ! मेरी यह विनती सुनो।

38नानक दोनों हाथ जोड़कर यह दान माँगता है, कृपा-दृष्टि करके मेरा जन्म-मरण का चक्र समाप्त कर दो ॥ १॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं