सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 456 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1गुप्त एवं प्रगट सभी जीव, पवन, पानी दिन-रात उसकी आराधना करते हैं।

2जिसकी नक्षत्र, चाँद एवं सूर्य वन्दना करते हैं और जिसकी स्तुति गगन एवं धरती गाते रहते हैं।

3जिसकी तमाम उत्पत्ति के स्रोत एवं वाणियों सदैव ही सुमिरन करती रहती हैं।

4स्मृतियाँ, पुराण, चार वेद, छ:शास्त्र जिसका जाप करते रहते हैं।

5हे नानक ! वह पतितपावन भक्तवत्सल प्रभु सत्संगति द्वारा ही मिलता है॥ ३॥

6सृष्टि का जितना ज्ञान मुझे प्रभु ने प्रदान किया है, उतना मेरी जिव्हा ने वर्णन कर दिया है।

7मेरे ज्ञान से बाहर जो तेरी सेवा करते हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती।

8जगत का ठाकुर प्रभु अविगत, अगणित एवं अथाह है।सब जीवों में एवं बाहर प्रभु ही विद्यमान है।

9हे प्रभु ! हम सभी भिखारी हैं और एक तू ही दाता है। तू कहीं दूर नहीं अपितु हमारे पास ही प्रत्यक्ष है।

10वह प्रभु अपने भक्तों के वश में है। जो प्राणी प्रभु से मिल चुके हैं, उनकी उपमा मैं किस तरह कर सकता हूँ?

11नानक की यही कामना है कि वह परमात्मा से यह दान एवं सम्मान प्राप्त करे कि वह अपना शीश साधुओं के चरणों पर रख दे ॥ ४॥ २॥ ५॥

12आसा महला ५ ॥

13श्लोक II

14हे भाग्यशाली जीवो ! थोड़ा-सा उद्यम करो एवं जगत के मालिक परमात्मा को याद करो।

15हे नानक ! उस प्रभु का सिमरन करने से सर्व सुख प्राप्त होते हैं तथा दु:ख, दर्द एवं भ्रम दूर हो जाते हैं।॥ १॥

16छंद ॥

17गोविन्द का नाम जपने में आलस्य नहीं करना चाहिए।

18साधु की संगति में रहने से यमपुरी नहीं जाना पड़ता।

19प्रभु का नाम याद करने से प्राणी सदा सुखी रहता है और उसे दुःख-दर्द एवं भय नहीं सताते।

20हे बन्धु ! हरेक श्वास के साथ हरि-परमेश्वर की आराधना करते रहो और मुख एवं मन से प्रभु को ही याद करो।

21हे अमृत के घर ! हे गुणों के भण्डार ! हे कृपालु एवं दयालु प्रभु ! दया करके मुझे अपनी सेवा-भक्ति में लगाओ।

22नानक प्रार्थना करता है कि हे प्रभु! मैं तेरे चरणों में ही पड़ता हूँ और तेरे चरणों की ही पूजा करता हूँ। गोविन्द का नाम-जपने में आलस्य नहीं करना चाहिए॥ १॥

23निरंजन प्रभु का पुनीत नाम पतितों को पावन करने वाला है।

24गुरु के ज्ञान का सुरमा भ्रम के अन्धेरे का विनाश कर देता है।

25गुरु के ज्ञान का सुरमा यह ज्ञान प्रदान करता है कि निरंजन प्रभु जल, धरती एवं गगन में हर जगह समाया हुआ है।

26जिस मनुष्य के हृदय में प्रभु एक क्षण भर के लिए निवास कर लेता है, उसके दुःख-संताप मिट जाते हैं।

27जगत का स्वामी प्रभु अगाध ज्ञान वाला है और वह सब कुछ करने में समर्थ है तथा सभी के भय नाश करने वाला है।

28नानक प्रार्थना करता है और प्रभु-चरणों की पूजा करता है। निरंजन प्रभु का पुनीत नाम पतितों को पावन करने वाला है॥ २॥

29मैंने कृपानिधि दयालु गोपाल की ओट ली है।

30हे प्रभु ! मुझे तेरे चरणों का सहारा है और तेरी ही शरण में मेरी सफलता है।

31सब कुछ करने एवं कराने वाले जगत के स्वामी हरि के चरणों में लगकर पतितों का उद्धार हो जाता है।

32भगवान का नाम ही भयानक संसार-सागर से पार करने वाला है और उसका नाम-सुमिरन करके बहुत सारे जीव पार हो गए हैं।

33आदि से अंत तक बेअंत लोग ईश्वर को खोजते रहे हैं लेकिन मैंने सुना है कि संतों की संगत ही मुक्ति का मार्ग है।

34नानक वन्दना करता है कि मैं प्रभु-चरणों की आराधना करता हूँ और कृपानिधि, दयालु गोपाल प्रभु की ओट ली है॥ ३॥

35भक्तवत्सल हरि ने अपना विरद् आप बनाया है।

36जहाँ कहीं भी संतजन प्रभु की आराधना करते हैं, वह वही प्रगट हो जाता है।

37यह अपने भक्तों को सहज-स्वभाव ही अपने साथ मिला लेता है और उनके सभी कार्य सम्पूर्ण कर देता है।

38प्रभु के यश में वह आनंद एवं महा मंगल को पाते हैं और सभी दु:खों को भूल जाते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं