सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 455 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1जैसे चातक को स्याति बून्द की प्यास रहती है और प्रत्येक क्षण कहता है हे सुन्दर मेघ ! वर्षा कर।

2वैसे ही तू अपने हरि से प्रीति कर। अपना यह मन उसको अर्पित कर देना चाहिए और अपना चित्त मुरारी लगाना चाहिए।

3हे मन अहंकार नहीं करना चाहिए, प्रभु के शरण में आकर उस पर कुर्बान हो जाना चाहिए

4जब गुरु सुप्रसन्न होता है तो जीव -स्त्री अपने सच्चे प्रेम का सन्देश भेजती है और उसका बिछड़ा हुआ प्रभु पति आकर उसे मिल जाता है।

5नानक का कथन है की हे मेरे मन ! तू अनंत ठाकुर की महिमा के गीत गायन कर, तू हरी से प्रेम कर तथा उससे तू ऐसा स्नेह कर ॥ २ ॥

6चकवी का सूर्य से इतना स्नेह है कि वह रात को उसे याद करती रही है और उसे अत्यंत आशा बनी रहती है की कब दिन निकलेगा और कब सूर्य के दर्शन करेगी।

7कोयल का आम से प्रेम है और वो मीठा गीत गाती है।

8है मेरे मन ! इस तरह तू भी हरि से प्रेम कर और प्रेम का अहंकार मत कर क्योकि हम सभी एक रात्रि के अतिथि है।

9अब तुम कोन से रंगरलियों में फँस कर मोह में लीन हो गए हो ? क्यों की जीव नंग्न ही दुनिया में आता और जाता है।

10साधु की शरण लेने एवं उसके चरणों पर नतमस्तक होने से सांसारिक मोह जो तुम अब अनुभव करते हो, वह मिट जाएगा और तुम स्थिर अनुभव करोगे।

11नानक का कथन है कि हे मन ! दयालु परमात्मा की महिमा के गीत गायन कर और हरि से प्रीति लगा, अन्यथा तुम हरि रूपी सूर्य को कैसे देखोगे ? ॥ ३ ॥

12हे मन ! तू प्रभु से ऐसी प्रीति कर जैसे रात को हिरण नाद सुनकर अपना हदय नाद को अर्पित कर देता है।

13जैसे अपने पति के प्रेम में लीन हुई पत्नी अपने प्रियतम की सेवा करती है, वैसे ही तू यह मन अपने प्रिय-प्रभु को अर्पण कर दे।

14अपना मन अपने प्रियतम को दे दे और उसके साथ रमण कर। इस तरह तुझे समस्त खुशियाँ एवं आनंद प्राप्त हो जाएगा।

15मैंने अपने प्रियतम प्रभु को पा किया है और प्रेम का लाल रंग बना लिया है तथा चिरकाल से अपने मित्र हरि को मिला हूँ।

16जब गुरुदेव मध्यस्थ बने तो मैंने अपने नेत्रों से प्रियतम-प्रभु के दर्शन कर लिए तथा दूसरा कोई भी मुझे मेरे प्रियतम जैसा दिखाई नहीं देता।

17नानक का कथन है कि हे मन ! तू दयालु एवं मोहन प्रभु की महिमा के गीत गाता रह, हरि के चरण पकड़ तथा अपने हृदय में ऐसा प्रेम बनाकर रख ॥ ४॥ १ ॥४ ॥

18आसा महला ५ ॥

19श्लोक॥

20मैं ईश्वर को पाने के लिए वन-वन में भटकती और खोजती हुई बहुत थक गई हूँ।

21हे नानक ! जब साधु से भेंट हुई तो मैंने अपने मन में ही भगवान को पा लिया ॥ १॥

22छंद॥

23जिस प्रभु को असंख्य मुनि एवं अनेक तपस्वी खोजते हैं।

24जिसकी करोड़ों ही ब्रह्मा आराधना करते और ज्ञानी जिसके नाम का जाप जपते हैं।

25जिसकी प्राप्ति हेतु अनेक जप, तपस्या, संयम, क्रियाएं, पूजा-अर्चना, शुद्धिकरण एवं वन्दना होती रहती है।

26जिस निरंजन प्रभु को मिलने हेतु लोग पृथ्वी पर रटन करते और तीर्थों पर स्नान करते हैं।

27हे भगवान ! मनुष्य, वन, तृण, पशु-पक्षी सभी तेरी ही आराधना करते हैं।

28हे नानक ! साधसंगति में सम्मिलित होने से वह दयालु, प्यारा गोविन्द मिल जाता है और मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है॥ १॥

29हे दयालु प्रभु ! करोड़ों ही विष्णु अवतार एवं जटाधारी शंकर

30अपने मन एवं तन की अपार रुचि से तुझसे मिलने की तीव्र अभिलाषा करते हैं।

31हे गोविंद ! तू अपरंपार, अगम्य एवं सबका ठाकुर है। तू सबमें समाया हुआ है और सबका मालिक है।

32देवता, सिद्धगण एवं गंधर्व सब तेरी ही आराधना करते हैं और यक्ष एवं किन्नर तेरा ही गुणगान करते रहते हैं।

33करोड़ों ही इन्द्र एवं अनेकों ही देवगण स्वामी का जाप एवं जय-जयकार करते हैं।

34हे नानक ! दयालु प्रभु अनाथों का नाथ है और साधसंगति में सम्मिलित होकर ही मनुष्य का उद्धार हो सकता है ॥२॥

35करोड़ों ही देवियाँ एवं धन की देवी लक्ष्मी विभिन्न प्रकार से उसकी सेवा करती हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं