गुरु ग्रंथ साहिब 454 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji
1मेरा प्रिय प्रभु अपने सहज-स्वभाव से मुझे छोड़कर कहीं नहीं जाता। मेरे मन को मजीठ की भाँति प्रभु का गहरा रंग लग गया है।
2हे नानक ! हरि के चरण-कमलों ने मेरा मन बिंध दिया है और उसे अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता ॥ १ ॥
3जैसे मछली जल में मस्त रहती है, वैसे ही मैं राम रस से मस्त हुआ हूँ।
4पूर्ण गुरु ने मुझे उपदेश दिया है और मैं राम से प्रेम करता हूँ जिसने मुझे जीवन-मुक्ति की देन प्रदान की है।
5जिन मनुष्यों को अंतर्यामी स्वामी अपने दामन के साथ लगा लेता है, वे जीवन में मुक्ति प्राप्त कर लेते हैं।
6हरि अपना रत्न जैसा अमूल्य नाम अपने भक्तों के हृदय में प्रगट कर देता है। वह सब जीवों में समाया हुआ है और अपने भक्तों को छोड़कर कहीं नहीं जाता।
7जगत का स्वामी प्रभु सुन्दर स्वरूप एवं बुद्धिमान है, उसकी देन कभी समाप्त नहीं होती।
8हे नानक ! जैसे मछली जल में लीन हुई है वैसे ही मैं प्रभु में समाया हुआ हूँ॥ २॥
9जैसे चातक स्वाति-बूंद की लालसा करता है वैसे ही हरि मेरे प्राणों का आधार है।
10प्रभु मुझे धन-भण्डार, पुत्र, भाई एवं मित्र सबसे प्रिय है।
11सबसे प्यारा एवं निराला आदिपुरुष मुझे सबसे प्रिय लगता है। उसकी गति कोई भी मनुष्य जान नहीं सकता।
12प्रत्येक श्वास एवं ग्रास भर के लिए भी मैं हरि को विस्मृत नहीं करता। गुरु के शब्द द्वारा मैं उसके प्रेम का आनंद प्राप्त करता हूँ।
13परमपुरुष प्रभु जगत का जीवन है। संतजन हरि-रस का पान करते हैं और उसका सुमिरन करके अपना भ्रम, मोह एवं दुःख दूर कर लेते हैं।
14जैसे चातक स्वाति-बूंद की अभिलाषा करता है वैसे ही नानक को हरि प्यारा लगता है॥ ३॥
15अपने नारायण से मिलकर मेरे मनोरथ पूरे हो गए हैं।
16शूरवीर गुरु को मिलने से भ्रम की दीवार ध्वस्त हो गई है।
17पूर्ण गुरु उन्हें ही मिला है, जिन्होंने अपने पूर्व जन्म के कर्मो अनुसार अपनी तकदीर में सर्व निधियाँ देने वाले दीन दयालु परमात्मा से शुभ लेख लिखाए हैं।
18सुन्दर गुरु गोपाल प्रभु ही सृष्टि के आदि, मध्य एवं अन्त तक विद्यमान है।
19साधुओं की चरण-धूलि पतितों को पावन कर देती है और बड़ा सुख एवं सहज आनंद प्रदान करती है।
20नानक को नारायण मिल गया है और उसका मनोरथ पूरा हो गया है॥ ४॥ १॥ ३॥
21आसा महला ५ छंत घरु ६
22ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
23श्लोक।
24जिन मनुष्यों पर प्रभु कृपालु हो जाता है, वे हरि-नाम ही जपते रहते हैं।
25हे नानक ! साधसंगत में मिलने से ही उनका प्रेम राम से लगा है॥ १॥
26छंद ॥
27हे मन ! ईश्वर से ऐसा प्रेम कर, जैसा प्रेम जल का दूध से है। जब दोनों को आग पर रखा जाता है तो जल दूध को आंच नहीं आने देता।
28जैसे भैवरा कमल की सुगन्धि में मग्न होकर फंस जाता है तो एक क्षण भर को भी इससे दूर नहीं होता।
29हे मन ! इस तरह एक क्षण भर के लिए प्रभु के प्रेम से पीछे नहीं हटना चाहिए। अपने सारे श्रृंगार एवं रस प्रभु को अर्पण कर देने चाहिए।
30जहाँ दु:ख सुना जाता और यम का मार्ग बताया जाता है, वंहा सत्संगति के प्रभाव से कोई भय प्रभावित नहीं करता।
31गोविंद की कीर्ति का गुणगान करते रहो, इससे सब दुख एवं पाप दूर हो जाएँगे।
32नानक का कथन है की हे मन ! गोविन्द की महिमा के गीत गाता रह और हरी से प्रेम बनाये रख। हे मन ! ऐसा प्रेम बनाये रख ॥ १
33जैसे मछली जल के बिना धैर्य नहीं करती, हे मन ! वैसे ही प्रभु से प्रेम कायम कर।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं