सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 453 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1गुरु से मिलकर मैंने विषम जगत रूपी अखाड़ा जीत लिया है।

2मैंने यह जगत रूपी अखाड़ा गुरु से मिलकर जीत लिया है। जब मैंने परमात्मा का नाम याद किया तो मेरे मन में बनी भ्रम के किले की दीवार टूट गई।

3मुझे अनेक खजानों की निधि (दौलत) प्राप्त हो गई है और प्रभु स्वयं मेरी सहायता के लिए खड़ा हुआ है।

4वही पुरुष श्रेष्ठ ज्ञानी एवं सर्वोच्च है, जिसे प्रभु ने अपना बना लिया है।

5हे नानक ! जब स्वामी पक्षधर हो गया है तो उसके सभी मित्र एवं भाई भी खुश हो गए है॥ ४॥ १ ॥

6आसा महला ५ ॥

7हरि की कथा अकथनीय है और वह थोड़ी-सी भी जानी नहीं जा सकती।

8देवताओं, मनुष्यों और मुनिजनों ने बड़ा सहजता से हरि-कथा का वर्णन किया है।

9जिन्होंने भगवान के सुन्दर चरणों से प्रेम लगाया है, उन्होंने सहज ही अमृत वाणी का बखान किया है।

10एक अलक्ष्य एवं निरंजन प्रभु का जाप करने से उन्होंने मनोवांछित फल पा लिया है।

11अभिमान, मोह, द्वैतभाव एवं विकारों को त्याग कर वे ज्योति ज्योत समा गए हैं।

12नानक प्रार्थना करता है कि गुरु की कृपा से वे सर्वदा हरि रंग का आनंद लेते रहते हैं।॥ १॥

13हरि के संतजन ही मेरे सज्जन, मित्र एवं साथी हैं।

14हे राम ! बड़े सौभाग्य से मुझे सत्संगति प्राप्त हुई है।

15अहोभाग्य से मुझे सत्संगति मिली है और मैंने प्रभु का नाम सुमिरन किया है तथा मेरे दुःख एवं संताप निवृत्त हो गए हैं।

16मैं गुरु के चरणों से लगा हूँ, जिससे मेरा भ्रम एवं भय भाग गए हैं। परमात्मा ने स्वयं मेरा अहंत्व मिटा दिया है।

17प्रभु ने कृपा-दृष्टि करके मुझे अपने साथ मिला लिया है और अब मैं न जुदा होऊँगा और न ही कहीं जाऊँगा।

18नानक वन्दना करता है कि हे हरि ! मैं तेरा दास हूँ और सदा अपनी शरण में रखो ॥ २॥

19हे हरि ! तेरे द्वार पर तेरे प्यारे भक्त शोभा देते हैं।

20हे राम ! मैं उन (भक्तों) पर सदा बलिहारी जाता हूँ।

21मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ और सदा उन पर कुर्बान जाता हूँ, जिन से भेंट करने से मैंने भगवान को जान लिया है।

22पूर्ण अकालपुरुष विधाता प्रत्येक हृदय में समाया हुआ है।

23जिसने पूर्ण गुरु को पाकर परमात्मा का नाम स्मरण किया है, वह अपना जीवन जुए में नहीं हारता।

24नानक प्रार्थना करता है-हे प्रभु ! मैंने तेरी शरण ली है, कृपा करके मेरी रक्षा करो।॥ ३॥

25हे राम ! तेरे गुण बेअंत हैं। फिर उनमें से कौन-से गुणों का गायन करूँ ?

26तेरे चरण एवं चरण-धूलि मुझे सौभाग्य से प्राप्त हुई है।

27हरि की चरण-धूलि में स्नान करने से पापों की मैल धुल जाती है और जन्म-मरण का दुःख समाप्त हो जाता है।

28भीतर एवं बाहर परमेश्वर सदा जीव के साथ रहता है।

29प्रभु का कीर्तन करने से कल्याण प्राप्त होता है, दुःख मिट जाते हैं और मनुष्य दोबारा योनियों के चक्र में नहीं आता।

30नानक प्रार्थना करता है कि गुरु की शरण में आने से मनुष्य का संसार सागर से उद्धार हो जाता है और अपने प्रभु को वह प्रिय लगने लगता है॥ ४॥ २॥

31आसा छंत महला ५ घरु ४

32ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

33मेरा मन हरि के चरण-कमलों में बिंध गया है, इसलिए प्रभु के अलावा मुझे अन्य कुछ भी मीठा (अच्छा) नहीं लगता।

34संतों की संगति में मिलकर मैंने हरि की आराधना की है और सबके हृदय में प्रभु के दर्शन करता हूँ।

35मैं हरि को प्रत्येक हृदय में देखता हूँ और उसका नामामृत मुझ पर बरस गया है तथा जन्म-मरण का दु:ख मिट गया है।

36गुणों के भण्डार परमात्मा का गुणगान करने से मेरे सभी दु:ख नाश हो गए हैं और मेरी अहंत्व की गांठ खुल गई है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं