सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 452 · Raag Aasaa · Guru Raam Daas Ji

1हे मेरे प्यारे ! मेरी आँखे अपने प्रियतम के प्रेम में यूँ रंगी हुई है जैसे पपीहा स्वाति बूंद हेतु उत्सुक होता देखता है।

2हे प्यारे ! हरी नाम रूपी स्वाति बूंदो का पान करने से मेरा मन शीतल हो गया है।

3हे मेरे प्यारे ! मेरे तन में उपजा हुआ जुदाई का दर्द मुझे जगाये रखता है और किसी तरह भी मुझे नींद नहीं आती।

4हे मेरे प्यारे ! नानक की गुरु प्रेम से प्रभु प्राप्त हो गया है।

5हे मेरे प्यारे ! चैत्र के माह में बसंत की सुहावनी ऋतू आ गयी है।

6लेकिन प्रियतम प्रभु के बिना मेरे हृदय आँगन में धूल ही उड़ती है।

7मेरे उदास मन में अभी भी आशा कायम है और मेरे दोनों नेत्र उस प्रियतम का इंतजार कर रहे है।

8नानक का कथन है कि हे मेरे प्यारे ! अब गुरु को देखकर मेरा मन यूँ प्रसन्न हो गया है जैसे बालक अपनी माता को देखकर खिल जाता है॥ ४॥

9हे मेरे प्यारे ! मेरे सच्चे गुरु ने मुझे हरि की कथा-कहानियाँ सुनाई हैं।

10हे मेरे प्यारे ! मैं अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ, जिन्होंने मुझे प्रभु से मिला दिया है।

11हे मेरे प्यारे ! प्रभु ने मेरी सभी आशाएँ पूरी कर दी हैं और मुझे मनोवांछित फल प्राप्त हो गया है।

12हे मेरे प्यारे ! जब प्रभु प्रसन्न हुआ तो नानक उसके नाम में समा गया है॥ ५॥

13हे प्यारे ! अपने प्रियतम प्रभु के अलावा में किसी दूसरे से प्रेम की खेल नहीं खेलूंगा।

14मैं गुरु को कैसे प्राप्त करूँ, जिसके द्वारा प्रभु के दर्शन कर सकता हूँ?

15हे दाता हरि ! मुझे गुरु से मिला दे। केवल गुरु के द्वारा ही मैं तुझसे मिल सकता हूँ।

16नानक का कथन है कि हे मेरे प्यारे ! मुझे गुरु प्राप्त हो गया है, क्योंकि आदि से ही माथे पर ऐसा लेख लिखा हुआ था॥ ६॥ १४॥ २१॥

17ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

18रागु आसा महला ५ छंत घरु १ ॥

19मेरी अन्तरात्मा में आनंद ही आनंद हो गया है क्योंकि मैंने भगवान के दर्शन कर लिए हैं।

20मैंने भीठा हरि रस चख लिया है।

21मीठा हरि रस मेरे मन में बरसा है जिससे सतिगुरु की प्रसन्नता द्वारा सहज भाव शांति मिल गई है।

22मेरा हृदय-घर अब बस गया है और मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ मंगल गीत गा रही हैं क्योंकि काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार - पाँचों ही दुष्ट विकार भाग गए हैं।

23अमृतमयी वाणी से मैं शीतल एवं तृप्त हो गया हूँ, साजन संत गुरुदेव मेरे वकील बने हैं।

24हे नानक ! मेरा मन ईश्वर के साथ लीन हो गया है और अपने नयनों से उसके दर्शन कर लिए हैं॥ १॥

25हे राम ! मेरे मन के सुन्दर द्वार शोभायमान हो गए हैं।

26मेरे प्यारे संत अतिथि बने हुए हैं।

27जब मैं उन्हें प्रणाम करके उनकी सेवा में जुट गया तो उन्होंने मेरा विवाह कार्य सम्पूर्ण कर दिया।

28प्रभु स्वयं ही बराती है, स्वयं ही कन्या पक्ष, स्वयं ही स्वामी और स्वयं ही देवा है।

29वह अपना कार्य स्वयं ही संवारता है और स्वयं ही सृष्टि को सहारा प्रदान करता है।

30हे नानक ! पति-परमेश्वर मेरे हृदय-घर में विराजमान हो गया है और हृदय-घर के सुन्दर द्वार शोभा से युक्त हुए हैं।॥ २॥

31हे राम ! मेरे हृदय घर में विश्व की नवनिधियों आ गई हैं।

32राम नाम का ध्यान करने से मैंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है।

33सहज-स्वभाव से नाम का ध्यान करने से गोविन्द सदैव के लिए सखा बन गया है।

34उसकी तमाम गणनाएँ मिट गई हैं, मन की दुविधा भी दूर हो गई है और उसके मन को कभी चिन्ता नहीं आती।

35जब गोविन्द प्रगट हो जाता है तो अनहद नाद बजता है और आश्चर्यजनक शोभा का दृश्य बन जाता है।

36हे नानक ! जब मेरा प्रियतम-प्रभु मेरे साथ है तो मुझे विश्व की नवनिधियाँ प्राप्त हो गई हैं।॥ ३॥

37हे राम ! मेरे सभी भाई एवं मित्र सुप्रसन्न हो गए हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं