गुरु ग्रंथ साहिब 450 · Raag Aasaa · Guru Raam Daas Ji
1हे हरि ! नानक को भी तूने अपनी भक्ति का भण्डार प्रदान किया है॥ २॥
2हे स्वामी ! हम तेरे कौन-से गुणों का वर्णन कर सकते हैं ? हे राजन प्रभु ! तू तो अपरंपार है।
3मैं रात-दिन हरि-नाम की सराहना करता हूँ केवल यही मेरी आशा एवं आधार है।
4हे प्रभु! हम मूर्ख हैं और कुछ भी नहीं जानते। हम तुम्हारा अन्त किस तरह पा सकते हैं ?
5नानक हरि का दास है, वास्तव में हरि के दासों का पनिहार है॥ ३॥
6हे प्रभु ! जैसे तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही हमें बचा लीजिए। हम तेरी शरण में आए हैं।
7हम दिन-रात जीवन-पथ से भ्रष्ट होकर अपने जीवन को नष्ट कर रहे हैं। हे हरि ! हमारी मान प्रतिष्ठा रखें।
8हम तेरी संतान हैं तुम हमारे गुरु एवं पिता हो, हमें सुमति देकर सन्मार्ग लगाओ।
9हे प्रभु ! नानक हरि का दास कहलाता है, इसलिए उसकी मान-प्रतिष्ठा रखो ॥ ४ ॥ १० ॥ १७ ॥
10आसा महला ४ ॥
11जिन लोगों के मस्तक पर प्रारम्भ से ही हरि ने लेख लिखा है, उन्हें सच्चा गुरु मिल गया है।
12गुरु ने उनके अज्ञान के अन्धेरे को मिटा दिया है और उनके अन्तर्मन में गुरु, ज्ञान का दीपक प्रज्वलित हो गया है।
13उन्होंने हरि-नाम रूपी रत्न ढूंढ लिया है और वे दोबारा जन्म-मरण के चक्र में नहीं भटकते।
14नानक ने नाम की आराधना की है और आराधना द्वारा वह हरि-प्रभु से मिल गया है ॥ १॥
15जिन्होंने ऐसे हरि के नाम को याद नहीं किया, वे इस जगत में क्यों आए हैं ?
16यह मानव-जन्म बड़ा दुर्लभ है और प्रभु-नाम के बिना यह व्यर्थ ही चला जाता है।
17अब जीवन रूपी योग्य ऋतु में मनुष्य हरि का नाम नहीं बोता तदुपरांत आगे (परलोक में) भूखा क्या खाएगा ?
18मनमुख मनुष्य बार-बार जन्म लेते हैं, हे नानक ! परमात्मा को यही मंजूर है ॥ २॥
19हे हरि ! तू समस्त जीवों का स्वामी है और यह सब कुछ तेरा ही है। तूने ही सब को पैदा किया है।
20जीवों के वश में कुछ भी नहीं, जैसे तुम चलाते हो वैसे ही वे जीवन-आचरण करते हैं।
21हे मेरे प्रिय प्रभु ! वही जीव तुझसे मिलते हैं, जिन्हें तुम स्वयं मिलाते हो और जो तेरे मन को अच्छे लगते हैं।
22नानक की सतिगुरु से भेंट हो गई है, जिसने हरि के नाम द्वारा उसे भवसागर से पार कर दिया है॥ ३॥
23कुछ लोग अनेक प्रकार से राग गाकर, शंख बजाकर एवं वेदों के अध्ययन द्वारा भगवान का गुणगान करते हैं लेकिन इन विधियों से परमात्मा प्रसन्न नहीं होता।
24जिनके मन में छल-कपट एवं विकार हैं, उनके विलाप करने का क्या अभिप्राय है ?
25विश्व का रचयिता परमात्मा सब कुछ जानता है चाहे मनुष्य अपने पाप छिपाने का कितना ही प्रयास करता रहे।
26हे नानक ! जिन गुरुमुखों का हृदय शुद्ध है, वे हरि-भक्ति करके हरि को पा लेते हैं॥ ४ ॥ ११ ॥ १८ ॥
27आसा महला ४ ॥
28जिनके मन में भगवान का प्यार है, वे लोग सुघड़ एवं बुद्धिमान हैं।
29यदि वे बाहर से बोलने में भूल चूक भी करते हैं तो भी वे भगवान को बहुत अच्छे लगते हैं।
30भगवान के संतजनों का उसके सिवाय दूसरा कोई स्थान नहीं। प्रभु ही मानविहीन लोगों का सम्मान है।
31हे नानक ! हरि का नाम ही संतों भक्तों का सहारा है और उसका बल ही उन्हें बलवान बनाता है॥ १॥
32जहाँ भी जाकर मेरा सच्चा गुरु विराजमान होता है, वह स्थान अति सुन्दर है।
33गुरु-सिक्ख उस स्थान को ढूंढ लेते हैं और उसकी धूलि लेकर अपने माथे पर लगाते हैं।
34जो गुरु के सिक्ख हरि-नाम का ध्यान करते हैं, उनकी सेवा सफल हो जाती है।
35हे नानक ! जिन्होंने सतिगुरु की पूजा की है, प्रभु उनकी पूजा दुनिया से करवाता है॥ २॥
36गुरु-सिक्खों के मन में परमात्मा के नाम से ही प्रेम हैं। हे प्रभु ! वह तुझे प्रेम करते हैं।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं