गुरु ग्रंथ साहिब 448 · Raag Aasaa
1आसा महला ४ छंत ॥
2मेरा गोविन्द ही सबसे बड़ा है, वह अगम्य, अगोचर, जगत का आदि निरंजन निरंकार है।
3उसकी गति कही नहीं जा सकती, उसका प्रताप अपरिमित है, मेरा गोविन्द अलक्ष्य एवं अपार है।
4अलक्ष्य, अपार, अपरंपार गोविंद स्वयं ही अपने आपको जानता है।
5हे भगवान ! ये बेचारे जीव भी क्या विचार उच्चारण करें, जो तेरी व्याख्या एवं वर्णन कर सकें।
6जिस पर तू अपनी करुणा-दृष्टि करता है, वही गुरु द्वारा तेरे बारे में कुछ विचार करता है।
7मेरा गोविन्द ही सबसे बड़ा है, वह अगम्य, अगोचर, जगत का आदि, निरंजन निरंकार है॥ १॥
8हे मालिक ! तू आदिपुरुष, अपरंपार एवं जगत का रचयिता है और तेरा पार पाया नहीं जा सकता।
9हे प्रभु ! तू कण-कण एवं प्रत्येक शरीर में निरंतर मौजूद है, तू सब में समाया रहता है।
10वह परब्रह्म-परमेश्वर प्रत्येक हृदय में विद्यमान है, जिसका अंत नहीं पाया जा सकता।
11उसका कोई रूप एवं रेखा नहीं, वह अदृष्ट एवं अगोचर है।
12गुरु ने जिस व्यक्ति को अलक्ष्य परमात्मा दिखा दिया है, वह दिन-रात सदा आनंदमय रहता है और सहज ही उसके नाम में समाया रहता है।
13हे मालिक ! तू आदिपुरुष, अपरंपार एवं जगत का रचयिता है और तेरा पार नहीं पाया जा सकता ॥ २॥
14हे श्रीहरि ! तू सदैव सत्य परमेश्वर है एवं सदा अबिनाशी है, तू ही गुणों का भण्डार है।
15हे हरि-प्रभु ! सारे विश्व में एक तू ही है और तेरे समान अन्य कोई नहीं है, तू आप ही एक चतुर पुरुष है।
16हे चतुर पुरुष ! विश्व में तू ही प्रधान है और तेरे जैसा अन्य कोई बड़ा नहीं।
17हे प्रभु ! तेरा ही शब्द (हुक्म) सक्रिय है, तू सर्वव्यापक है, जो कुछ तू स्वयं करता है वही होता है।
18वह एक परमात्मा ही सबमें समाया हुआ है, गुरुमुख बनकर ही हरि का नाम जाना जाता है।
19हे भगवान ! तू सदैव सत्य परमेश्वर है जो सदा अबिनाशी है, एक तू ही गुणों का भण्डार है॥ ३॥
20हे दुनिया बनाने वाले ! हर जगह तू ही है, संसार में चारों ओर तेरा ही प्रताप है, जैसे तुझे भाता है, वैसे ही दुनिया को चलाते हो।
21जैसे तुम्हें स्वयं पसंद है, वैसे ही तुम सृष्टि को चलाते हो, सभी जीव तेरे शब्द में ही समाए हुए हैं।
22यदि तुझे अच्छा लग जाए तो सभी तेरे शब्द में समा जाते हैं, मनुष्य तेरे शब्द द्वारा ही बड़ाई पा लेता है।
23गुरुमुख बनकर ही मनुष्य बुद्धि प्राप्त करता है और अपना अहंकार मिटा कर प्रभु में समाया रहता है।
24हे प्रभु ! गुरुमुख बनकर ही तेरा अगोचर शब्द प्राप्त होता है, हे नानक ! मनुष्य नाम में समाया रहता है।
25हे विश्व को पैदा करने वाले ! सृष्टि में चारों ओर तेरा ही प्रताप है, जैसे तुझे मंजूर है, वैसे ही तू सृष्टि को चलाता है॥ ४॥ ७॥ १४॥
26ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
27आसा महला ४ छंत घरु ४ ॥
28हरि के नामामृत से मेरे नेत्र भीग गए हैं और मेरा मन उसके प्रेम रंग में रंगा हुआ है।
29मेरे राम ने मेरे मन को कसौटी पर परखा है और यह शुद्ध कचन बन गया है।
30गुरुमुख बनकर मेरा मन-तन प्रभु के प्रेम में भीग कर गहरा लाल हो गया है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं