सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 446 · Raag Aasaa · Guru Raam Daas Ji

1तदनन्तर परमात्मा ने कलियुग बनाया, जिसमें धर्म के तीन पैर खिसक गए और धर्म'एक पैर पर ही कायम रहा।

2इस युग के जीवों ने गुरु-शब्द की कमाई की और दुखों की औषधि हरि नाम पा लिया, हरि ने उसका कीर्तिगान करने वाले भक्तजनों के हृदय में शांति प्रदान की।

3कलियुग में हरि के भजन-कीर्तन की ऋतु आई और हरि-नाम की शोभा होने लगी, शरीर रूपी खेत में परमेश्वर के नाम को लोग बोने लगे।

4में यदि मनुष्य नाम के बिना कोई दूसरा बीज बोता है तो वह अपना सारा लाभ एवं मूल पूँजी गंवा लेता है।

5नानक ने पूर्ण गुरु को पा लिया है, जिसने उसके मन एवं हृदय में ही नाम प्रगट कर दिया है।

6परमात्मा ने कलियुग की रचना की, जिसमें धर्म के तीन पैर खिसक गए और धर्म (रूपी वैल) का चौथा पैर ही कायम रहा ॥ ४॥ ४॥ ११॥

7आसा महला ४ ॥

8जिस व्यक्ति के मन में हरि की कीर्ति अच्छी लग गई है, उसने परमगति पा ली है, उसके मन-तन को परमात्मा मीठा लगने लग गया है।

9जिसने गुरु की मति द्वारा भगवान का ध्यान किया है, उसने हरि रस पा लिया है, आदि से ही उसके मस्तक पर पूर्व लिखित भाग्य जाग गए हैं।

10आदि से मस्तक पर लिखा उसका भाग्य उदय हो गया है और जब उसने हरि-नाम द्वारा भगवान का गुणगान किया तो हरि नाम द्वारा उसे सुहाग मिल गया।

11अब उसके मस्तक पर प्रभु के प्रेम की मणि चमक उठी है और भगवान ने अपने हरि-नाम द्वारा उसे सुन्दर बना दिया है।

12उसकी ज्योति परम ज्योति से मिल गई है और उसने अपने प्रभु को पा लिया है, सच्चे गुरु को मिलने से उसका मन तृप्त हो गया है।

13हरि की कीर्ति-महिमा जिसके मन में भा गई है उसने परमगति पा ली है और उसके मन एवं तन को प्रभु मीठा लगने लग गया है॥ १॥

14जिस व्यक्ति ने परमेश्वर का यशगान किया है, उसे परम पद प्राप्त हो गया है, वे लोग उत्तम एवं प्रधान हैं।

15जिन्हें हरि मीठा लगने लग गया है, हम उनके चरणों की सेवा करते हैं और क्षण-क्षण उनके चरण घोते हैं।

16जिसे हरि मीठा लग गया है, उसे परम सुख प्राप्त हो गया है और उसका मुख भाग्यशाली एवं सुन्दर हो गया है।

17गुरु के उपदेश द्वारा उसने प्रभु का गुणगान किया है, प्रभु को हार के रूप में हृदय में पहना है और हरि के नाम को अपनी जिव्हा एवं कण्ठ में धारण किया है।

18वे सभी को एक द्रष्टि से समान देखते है और सभी की अंतरात्मा में प्रभु का वास जानते है।

19जिस व्यक्ति ने परमेश्वर का यशगान किया है, उसे परम पद मिल गया है, वे लोग उत्तम एवं प्रधान हैं॥ २ ॥

20जिसके मन में सत्संगति अच्छी लगती है, वे हरि रस का आस्वादन करते हैं, सत्संगति में हरि का रस बसता है।

21वह हरि-परमेश्वर की आराधना करता है और गुरु के शब्द द्वारा प्रसन्न रहता है, प्रभु के अलावा वह किसी दूसरे को नहीं जानता।

22उस हरि अमृत के अतिरिक्त दूसरा कोई अमृत नहीं, जो इसका पान करते हैं, वही इसकी विधि को जानते हैं।

23पूर्ण गुरु धन्य-धन्य है, जिसके माध्यम से प्रभु प्राप्त होता है, सुसंगति में सम्मिलित होकर प्रभु-नाम को पहचाना जाता है।

24मैं नाम की पूजा करता हूँ, मैं नाम की ही आराधना करता हूँ एवं नाम के अलावा दूसरा कुछ भी नहीं।

25जिसके मन को सत्संगति प्यारी लगती है, वह हरि अमृत का स्वाद प्राप्त करता है, सत्संगति में ही प्रभु का नामामृत बसता है॥ ३॥

26हे हरि-प्रभु ! दया करो एवं हम पत्थरों को पार लगा दो, अपने शब्द द्वारा सहजता से हमें संसार के मोह से निकाल लो।

27हम नश्वर प्राणी मोह के कीचड़ में फँसे हुए डूबते जा रहे हैं, हे हरि प्रभु ! हमें अपनी बांह पकड़ा दीजिए।

28प्रभु ने जब बांह पकड़ा दी तो उत्तम बुद्धि प्राप्त हो गई और सेवक गुरु के चरणों में लग गया।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं