गुरु ग्रंथ साहिब 442 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji
1हे मेरे सच्चे साहिब ! तेरी महिमा सत्य है।
2तू परब्रह्म बेअंत एवं जगत का स्वामी है, तेरी कुदरत व्यक्त नहीं की जा सकती।
3तेरी महिमा सत्य है जिसके मन में तुम इसे बसा देते हो, वे सदा तेरे गुण गाता रहता है।
4जब तुझे प्राणी भले लगते हैं तो वे तेरा ही गुणगान करते हैं और सत्य के साथ ही अपना चित्त लगाते हैं।
5हे प्रभु! जिसे तू अपने साथ मिला लेता है, वह गुरुमुख बनकर तुझ में ही समाया रहता है।
6नानक इस तरह कहता है कि हे मेरे सच्चे साहिब ! तेरी महिमा सत्य है॥ १० ॥ २ ॥ ७ ॥ ५॥ २ ॥ ७ ॥
7रागु आसा छंत महला ४ घरु १
8ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
9हे भाई ! गुरु की रज़ा में मुझे जीवन में सही आत्मिक जीवन मिल गया है।
10गुरु के माध्यम से मुझे प्रभु प्रिय लगने लगा है, हर वक्त गुरु मुझे हरि का नाम देते हैं और मेरे प्राणों में उसने हरि नाम बसा दिया है।
11गुरु ने जब से हरि का नाम मेरे प्राणों में बसा दिया है, तब से मेरे तमाम संशय एवं दुःख नाश हो गए हैं।
12गुरु के शुभ वचन द्वारा मैंने अदृष्ट एवं अगोचर प्रभु का ध्यान करके पवित्र परम पद प्राप्त कर लिया है।
13सच्चे गुरु की वाणी का गायन करने से नित्य ही अनहद ध्वनि गूंजती रहती है।
14हे नानक ! दाता प्रभु ने अब मुझ पर यह अनुकंपा की है कि मेरी ज्योति परम ज्योति में लीन रहती है॥ १॥
15स्वेच्छाचारी मनुष्य ‘मेरा धन मेरा धन' पुकारते हुए मनमुखता में ही मर जाते हैं।
16ये अपने चित्त को दुर्गन्धयुक्त शरीर में लगाए रखते हैं, जो एक क्षण भर हेतु आता है और क्षण भर में ही चला जाता है।
17स्वेच्छाचारी मनुष्य अपने चित्त को दुर्गन्धयुक्त देह से लगाते हैं, जैसे कुसुंभ के फूल का रंग दिखाई देता है, जो शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
18जैसे छाया कभी पूर्व दिशा की ओर होती है और कभी पश्चिम दिशा की ओर हो जाती है, वे कुम्हार के चाक की भाँति घूमते रहते हैं।
19मनमुख व्यक्ति दुख सहन करते हैं, दु:ख संचित करते हैं और दुःख ही भोगते रहते हैं, वे अपने जीवन में दु:खों की ही वृद्धि करते रहते हैं।
20हे नानक ! जब मनुष्य गुरु की शरण में आ जाता है तो वह विषम संसार सागर से सुखपूर्वक ही पार हो जाता है॥ २॥
21मेरा ठाकुर प्रभु सुन्दर है लेकिन वह अगम्य एवं अथाह सागर की भाँति है।
22हे मेरे साहूकार सतिगुरु ! मैं तुझसे हरि नाम की पूंजी माँगता हूँ। मैं हरि-नाम की पूँजी को खरीदता हूँ और हरि-नाम का व्यापार करता हूँ।
23मैं हरि के गुण ही गाता रहता हूँ और हरि के गुण ही मुझे भाते हैं।
24मैंने निद्रा एवं भूख सब कुछ त्याग दिया है परन्तु एकाग्रता के साथ निर्गुण प्रभु में समाया रहता हूँ।
25जब हरि-नाम के व्यापारी सत्संगति में बैठते हैं तो वे हरि-नाम का लाभ कमा कर ले जाते हैं।
26हे नानक ! अपना मन-तन गुरु के समक्ष अर्पित कर दे, जिसकी किस्मत में इसकी प्राप्ति लिखी हुई है, वही प्रभु-नाम को प्राप्त करता है॥ ३॥
27यह मानव-शरीर एक सागर है जो अनेक रत्नों (गुणों) से भरा हुआ है।
28जो मनुष्य गुरुवाणी से लगाव रखते हैं, उन्हें प्रभु-नाम की प्राप्ति हो जाती है।
29जो लोग गुरुवाणी में लीन रहते हैं, उन्हें अपार प्रभु का अमूल्य नाम-रत्न प्राप्त हो जाता है।
30हे हरि ! तेरी भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं और वे मनुष्य अमूल्य हरि-नाम प्राप्त कर लेते हैं।
31हे भाई ! गुरु की अनुकंपा से जब मैंने इस शरीर रूपी समुद्र का मंथन किया तो मुझे अनूप वस्तु दिखाई दी।
32हे नानक ! गुरु गोविन्द है और गोविन्द ही गुरु है, हे भाई ! इन दोनों में कोई भेद (अन्तर) नर्हों है॥ ४॥ १॥ ८ ॥
33आसा महला ४ ॥
34हे राम ! रिमझिम रिमझिम करके तेरी अमृत की धारा बरस रही है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं