सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 441 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji

1सच्चे गुरु से मिलकर दुविधाओं में भटकता हुआ मन टिक जाता है और दसम द्वार में प्रवेश कर लेता है।

2वहाँ अमृत भोजन का आनंद मिलता है और सहज ध्वनि उत्पन्न हो जाती है और गुरु के शब्द से संसार के आकर्षण को अंकुश लगाता है।

3वंहा सदैव आनंद बना रहता है और अनेक प्रकार के बाजे बजते है, व्यक्ति की सुरति प्रभु में समाई रहती है।

4नानक इस तरह कहता है कि सच्चे गुरु को मिलने से मोह-माया की दुविधाओं में भटकता मन टिक जाता है और आकर प्रभु-चरणों में निवास कर लेता है॥ ४॥

5हे मेरे मन ! तू ज्योति स्वरूप है, इसलिए अपने मूल (प्रभु-ज्योति) को पहचान।

6हे मेरे मन ! भगवान तेरे साथ रहता है, गुरु की मति द्वारा उसके प्रेम का आनंद प्राप्त कर।

7यदि तुम अपने मूल को पहचान लो तो तुम अपने प्रभु को जान लोगे और जीवन मृत्यु की तुझे सूझ हो जाएगी।

8गुरु की कृपा से यदि तुम एक ईश्वर को समझ लो तो तुम्हारी मोह-माया की अभिलाषा मिट जाएगी।

9मेरे मन में शांति आ गई है और शुभकामना के वाद्ययन्त्र बजने लग गए हैं और मैं प्रभु-दरबार में स्वीकृत हो गया हूँ।

10नानक इस तरह कहता है कि हे मेरे मन ! तू ज्योति स्वरूप (भगवान का अंश) है और अपने मूल को पहचान ॥ ५ ॥

11हे मन ! तुम अहंकार से भरे हुए हो और अहंकार से भरे ही चले जाओगे।

12मोहिनी माया ने तुझे मुग्ध किया हुआ है और बार-बार तुम योनियों में भटकते रहते हो।

13हे मूर्ख मन ! अहंकार से भरे हुए तुम चलते फिरते हो और अंत में संसार से जाते वक्त पश्चाताप करोगे।

14तुझे अहंकार एवं तृष्णा का रोग लगा हुआ है और तुम अपना जन्म व्यर्थ ही गंवा रहे हो।

15स्वेच्छाचारी मूर्ख प्रभु को याद नहीं करता और परलोक को जाते हुए पश्चाताप करता है।

16नानक इस तरह कहता है कि हे मन ! तुम अहंकार से भरे हुए हो और अहंकार से लदे ही चले जाओगे॥ ६॥

17हे मन ! तुम इस बात का घमण्ड मत करना कि तुम कुछ जानते हो अपितु गुरुमुख एवं विनीत बन जाना।

18तेरे भीतर अज्ञानता एवं बुद्धि का अहंकार है इसलिए गुरु के सच्चे शब्द से इसकी मैल को स्वच्छ कर ले।

19सच्चे गुरु के समक्ष विनीत बन और खुद पर गर्व मत करना कि मैं महान् हूँ।

20अपने अहंकार में यह जगत जल रहा है, इसलिए तू भी अपने आपको इस तरह नष्ट मत कर लेना।

21सच्चे गुरु की इच्छानुसार अपना कार्य कर और सच्चे गुरु की इच्छा के साथ लगा रह।

22नानक इस तरह कहता है कि हे मन ! तू अपना अहंकार छोड़ दे और विनीत बना रह, इस तरह तुझे सुख प्राप्त होगा।॥ ७॥

23वह समय बड़ा धन्य है, जब मुझे सच्चा गुरु मिला और मुझे परमात्मा याद आया।

24मेरे अन्तर्मन में सहज ही महा-आनंद अनुभव हुआ और मन-तन में सुख प्राप्त हो गया।

25मैंने उस पति-प्रभु को याद किया है, उसे अपने मन में बसाया है और तमाम अवगुण भुला दिए हैं।

26जब प्रभु को अच्छा लगा तो मुझ में गुण प्रगट हो गए, और सच्चे गुरु ने आप मुझे संवार दिया है।

27जिन्होंने एक नाम को अपने मन में बसाया है और पराया मोह-प्यार त्याग दिया है, वे प्रभु के दरबार में स्वीकृत हो गए हैं।

28नानक इस तरह कहता है कि वह समय धन्य है जब मुझे सच्चा गुरु मिला और उस प्रभु-पति को याद किया ॥ ८ ॥

29कुछ लोग मोह-माया की दुविधा में कुमार्गगामी हो गए हैं और उन्हें प्रभु-पति ने स्वयं ही कुमार्गगामी कर दिया है।

30वे द्वैतभाव के प्रेम में भटकते हैं और अहंकार में अपना कर्म करते हैं।

31उनके वश में भी कुछ नहीं क्योंकि प्रभु ने स्वयं ही उन्हें भुलाकर कुमार्ग लगाया है।

32हे परमपिता ! उन जीवों की अच्छी-बुरी गति तू ही जानता है, क्योंकि तूने खुद ही यह दुनिया की रचना रची है।

33तेरे हुक्म पर अनुसरण करना बहुत कठिन है, लेकिन गुरुमुख बनकर कोई विरला पुरुष ही हुक्म को समझता है।

34नानक इस तरह कहता है कि हे प्रभु! जीव बेचारे क्या कर सकते हैं, जबकि तुम ने स्वयं ही उन्हें भ्रम में डालकर कुमार्गगामी किया हुआ है॥ ६॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं