सिख धर्म
वापस

गुरु ग्रंथ साहिब 440 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji

1गुरु ने जिस जीव-स्त्री को अपनी संगति में मिला कर प्रभु से मिला दिया है, उसने जान लिया है कि उसका पति-प्रभु तो उसके साथ ही रहता है।

2वह शब्द द्वारा अन्तर में ही प्रभु से मिली रहती है और उसकी तृष्णा की अग्नि सहज ही बुझ गई है।

3शब्द द्वारा उसकी जलन बुझ गई है, अब उसकी अन्तरात्मा में शांति आ गई है और उसने सहज ही हरि रस को चख लिया है।

4अपने प्रियतम से मिलकर वह सदा उसके प्रेम का आनंद प्राप्त करती है और सच्चे शब्द द्वारा सुन्दर वाणी बोलती है।

5पण्डित पढ़-पढ़कर और मौन धारण करने वाले ऋषि-मुनि समाधि लगाकर थक गए हैं। धार्मिक वेष धारण करने वाले साधुओं ने मुक्ति प्राप्त नहीं की।

6हे नानक ! प्रभु-भक्ति के बिना दुनिया बावली हो गई है। लेकिन सच्चे शब्द से जीव-स्त्री प्रभु से मिल जाती है॥ ३॥

7जिस जीव-स्त्री को हरि-प्रभु अपने चरणों में मिला लेता है तो उसके मन में आनंद उत्पन्न हो जाता है।

8गुरु के अपार शब्द द्वारा जीव-स्त्री हरि रस में लीन रहती है।

9गुरु के अपार शब्द से वह अपने प्यारे-प्रभु से मिल जाती है और वह उसके गुणों को अपने मन में सदा याद करती एवं बसाती है।

10जब प्रियतम-प्रभु उससे रमण करता है तो उसकी सेज सुहावनी हो जाती है और अपने प्रियतम से मिलकर उस जीव-स्त्री के अवगुण नाश हो जाते हैं।

11जिस हृदय-घर में सदा हरि-नाम का सुमिरन होता है वहाँ चारों युगों में मंगल गीत गाए जाते हैं।

12हे नानक ! प्रभु नाम में अनुरक्त होने से जीव हमेशा आनंद में रहता है। हरि-प्रभु को मिलने से उसके सभी कार्य सम्पूर्ण हो जाते हैं।॥ ४॥ १॥६॥

13ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

14आसा महला ३ छंत घरु ३ ॥

15हे मेरे प्रिय सज्जनो ! तुम भगवान की भक्ति करते रहो।

16हमेशा अपने गुरु की श्रद्धापूर्वक सेवा करो एवं उससे नाम का धन प्राप्त करो।

17तुम अपने भगवान की ऐसी भक्ति करो, जो भक्ति प्रभु को अच्छी लगती है।

18यदि तुम अपनी मनमर्जी करोगे तो फिर प्रभु तुम पर खुश नहीं होगा।

19इस भक्ति-भाव का मार्ग बहुत कठिन है, लेकिन गुरु के द्वार पर आने से कोई विरला पुरुष ही इसे पाता है।

20हे नानक ! जिस मनुष्य पर प्रभु कृपा करता है, वह हरि की भक्ति को अपने चित्त से लगाता है॥ १॥

21हे मेरे वैरागी मन ! तुम वैरागी बन कर किसे दिखाते हो ?

22जो मनुष्य हरि का गुणगान करते हैं, वे सदैव ही हरि की प्रसन्नता में रहते हैं।

23इसलिए तू पाखंड को छोड़ कर वैराग्य धारण कर क्योंकि प्रभु सब कुछ जानता है।

24एक ईश्वर ही जल, थल, पृथ्वी एवं गगन में सर्वत्र बसा हुआ है, गुरुमुख मनुष्य प्रभु के हुक्म को पहचानते हैं।

25जो व्यक्ति प्रभु के हुक्म को पहचानता है वही सर्व सुख प्राप्त करता है।

26नानक इस तरह कहता है कि दरअसल वैरागी वही है, जो रात-दिन हरि की लगन में लीन रहता है।॥ २॥

27हे मेरे मन ! जहाँ-जहाँ तू दौड़ता है, वहाँ वहाँ ही हरि तेरे साथ है।

28हे मेरे मन ! तू अपनी चतुराई छोड़ दे और गुरु के शब्द का मनन कर।

29वह मालिक प्रभु सदैव तेरे साथ रहता है, इसलिए तू एक क्षण भर के लिए ही हरि का नाम याद कर लिया कर।

30तेरे जन्म-जन्मांतर के पाप मिट जाएँगे और अंततः परमगति प्राप्त हो जाएगी।

31गुरुमुख बनकर सदैव ही उसको याद कर, इस तरह तेरा सच्चे प्रभु के साथ अटूट प्रेम बन जाएगा।

32नानक इस तरह कहता है कि हे मेरे मन ! जहाँ कहीं भी तू दौड़ता है, वहाँ हरि-प्रभु तेरे साथ रहता है॥ ३॥

33यदि सच्चा गुरु मिल जाए तो मोह-माया की ओर दौड़ता मन टिक जाता है और आकर अपने सच्चे घर प्रभु-चरणों में बस जाता है।

34तब यह नाम को खरीदता है, नाम का जाप करता है और नाम में ही समाया रहता है।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं