सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 437 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1हे मेरे मन ! सात सागर रूपी गुरु की संगति का स्नान करने से मन निर्मल हो जाता है।

2जब प्रभु को अच्छा लगता है तो मनुष्य पवित्र जल में स्नान कर लेता है और जीभ एवं काया इत्यादि यह पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ मन से मिलकर प्रभु के गुणों का विचार करते हैं।

3काम, क्रोध, कपट एवं विकारों को छोड़कर प्राणी सत्यनाम को अपने हृदय में पा लेता है।

4जब अहंकार, लोभ की लहर एवं मिथ्या इत्यादि मिट जाते हैं तो मनुष्य दीनदयालु प्रभु को प्राप्त कर लेता है।

5हे नानक ! गुरु के समान कोई तीर्थ स्थान नहीं, वह स्वयं ही गुरु गोपाल हैं।॥ ३॥

6मैं वन-वन में देख रही हूँ और सारी वनस्पति को देख चुकी हूँ।

7हे प्रभु ! तीनों लोक एवं सारा जगत तेरा ही बनाया हुआ है।

8यह सब कुछ तेरा ही उत्पन्न किया है, केवल तुभ ही सदैव स्थिर हो। तेरे समान कोई नहीं।

9हे प्रभु ! तू दाता है और शेष सभी तेरे याचक हैं। तेरे बिना मैं किस का स्तुतिगान करूँ ?

10हे दाता ! तुम तो बिना माँगे ही दान दिए जाते हो, तेरी भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं।

11नानक का विचार है कि राम नाम के बिना किसी जीव को मुक्ति प्राप्त नहीं होती।॥ ४॥ २॥

12आसा महला १ ॥

13मेरा मन अपने प्यारे राम के प्रेम में रंग गया है।

14वह सच्चा प्रभु सबका मालिक एवं अपरम्पार आदिपुरुष है। उसने सारी धरती को सहारा प्रदान किया हुआ है।

15वह अगम्य, अगोचर, अपरंपार परब्रह्म सारे विश्व का बादशाह है।

16परमात्मा युगों के आरम्भ में भी था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगा। शेष दुनिया को झूठा मानो !

17मनुष्य कर्म-धर्म की सार नहीं जानता। फिर वह सुरति एवं मुक्ति को कैसे प्राप्त कर सकता है?

18हे नानक ! गुरुमुख केवल शब्द को ही जानता है और रात-दिन परमात्मा के नाम का ध्यान करता रहता है। १॥

19अब मेरे मन को आस्था हो चुकी है कि प्रभु का नाम ही लोक-परलोक में मनुष्य का सखा है।

20अहंत्व, ममता एवं माया मनुष्य के साथ नहीं जाती।

21माता, पिता, भाई, पुत्र, चतुराई, संपति एवं नारी उसका आगे साथ नहीं देते।

22प्रभु के सुमिरन द्वारा मैंने समुद्र की पुत्री लक्ष्मी अर्थात् माया को त्यागकर उसे अपने पैरों तले कुचल दिया है।

23आदिपुरुष ने एक अलौकिक कौतुक दिखाया है कि जहाँ कहीं भी मैं देखता हूँ, वहाँ मैं उसे ही पाता हूँ।

24हे नानक ! मैं हरि की भक्ति को नहीं छोडूंगा, सहज रूप में जो होना है वह होता रहे॥ २॥

25मेरा मन उस सत्यस्वरूप राम के सुमिरन द्वारा निर्मल हो गया है।

26मैंने अपने अवगुणों को मिटा दिया है, इसलिए गुण मेरे साथ चलते हैं और गुणों के फलस्वरूप मेरा प्रभु के साथ संगम हो गया है।

27अवगुणों को त्यागकर मैं शुभ कर्म करता हूँ और सत्य के दरबार में सत्यवादी बन जाता हूँ।

28मेरा जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो गया है क्योंकि गुरुमुख बनकर मैंने परम तत्व प्रभु का चिन्तन किया है।

29हे प्रभु ! तू ही मेरा साजन, मित्र, सुजान एवं सखा है। तेरे सत्य-नाम द्वारा मुझे बड़ाई मिलती है।

30हे नानक ! मुझे ऐसी गुरमति प्राप्त हुई है कि नाम-रत्न मेरे भीतर प्रकाशमान हो गया है॥ ३॥

31सत्य एक अंजन है और इस सत्य के अंजन को मैंने सैंभालकर अपने नयनों में लगा लिया है तथा मैं निरंजन प्रभु के साथ रंग गया हूँ।

32मेरे तन-मन के भीतर जगजीवन दाता राम बस रहा है।

33मेरा मन जगजीवन दाता हरि के साथ लीन हुआ है और सहजता से मिलाने से ही मिलन हो गया है।

34साधुओं की सभा एवं संतों की संगति में मुझे प्रभु की कृपादृष्टि से ही सुख उपलब्ध हुआ है।

35वैरागी पुरुष हरि की भक्ति में लीन रहते हैं तथा उनका मोह एवं तृष्णा मिट जाते हैं।

36हे नानक ! कोई विरला ही वैरागी प्रभु का दास है जो अपना अहंकार मिटाकर प्रसन्न रहता है॥ ४॥ ३॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं