सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 436 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1स्वामी-प्रभु जब स्वयं कृपा करता है तो जीव-स्त्री का अपने पिया के साथ मिलन हो जाता है।

2अपने पिया के साथ उसकी सेज सुहावनी हो जाती है, और उसके सातों सरोवर अर्थात् इन्द्रियाँ अमृत से भर जाती हैं।

3हे दयालु सच्चे प्रभु ! मुझ पर दया एवं कृपा करो चूंकि संगत में मिलकर सच्चे शब्द द्वारा तेरा गुणगान करूँ।

4हे नानक ! अपने वर हरि को देखकर मुग्धा नारी फूल की तरह खिल गई है और उसके मन में उमंग उत्पन्न हो गई है॥ १॥

5हे सहज सलोनी मुग्धा ! अपने राम के समक्ष एक प्रेम भरी विनती कर।

6मेरे तन-मन को हरि अच्छा लगता है और मैं प्रभु राम के संगम पर मोहित हो गई हूँ।

7मैं प्रभु के प्रेम से रंग गई हूँ। हरि के समक्ष मैं विनती करती रहती हूँ और हरि के नाम द्वारा मैं सुखपूर्वक रहती हूँ।

8यदि तुम उसके गुणों को पहचान लो तो तुम प्रभु को जान लोगे। इस तरह गुण तेरे भीतर प्रवेश कर जाएँगे और अवगुण नाश हो जाएँगे।

9हे प्रभु! तेरे बिना मैं एक क्षण भी नहीं रह सकती, केवल सुनने एवं कहने से ही मुझे धैर्य नहीं होता।

10हे नानक ! जो जीव रूपी नारी प्रिय-प्रिय पुकार कर प्रभु को याद करती रहती है, उसका मन एवं जिव्हा प्रभु के अमृत से भीग जाते हैं।॥ २॥

11हे मेरी सखियो एवं सहेलियो ! मेरा पिया राम नाम का व्यापारी है।

12हरि का नाम मैंने उससे खरीदा है अर्थात् उसके साथ नाम का व्यापार किया है। उस राम की मिठास अमूल्य है।

13वह नाम प्राप्त करके मूल्य में अमूल्य बन गई है। वह अपने पिया के सत्य के घर में रहती है। यदि मुग्धा प्रियतम प्रभु को अच्छी लगने लग जाए तो वह प्रिया बन जाती है।

14कई तो प्रभु के साथ आनंदपूर्वक रमण करती रहती हैं जबकि मैं उसके द्वार पर खड़ी पुकार करती रहती हूँ।

15श्रीधर प्रभु सब कुछ करने एवं करवाने में समर्थ है। वह स्वयं ही सभी कार्य सिद्ध कर देता है।

16हे नानक ! अपने पति-प्रभु की कृपा-दृष्टि से जीव रूपी नारी सुहागिन बन गई है। शब्द ने उसके हृदय को सहारा दिया है॥ ३॥

17मेरे हृदय घर में सत्य का स्तुतिगान है।चूंकि मेरा मित्र प्रभु राम मेरे हृदय घर में आकर बस गया है।

18प्रेम में अनुरक्त हुआ प्रभु मेरे साथ रमण करता है।उस राम का मन मैंने मोहित कर लिया है और अपना मन उसे अर्पित कर दिया है।

19मैंने अपना मन अर्पित करके हरि वर के रूप में पा लिया है।जैसे उसे भला लगता है, वैसे ही वह मुझ से रमण करता है।

20मैंने अपना यह तन-मन प्रियतम-प्रभु के समक्ष अर्पित किया है और नाम द्वारा सौभाग्यशाली बन गई हूँ।अपने हृदय घर में मैंने अमृत फल प्राप्त कर लिया है।

21बुद्धि, पूजा-पाठ एवं अधिक चतुरता द्वारा प्रभु प्राप्त नहीं होता।जो कुछ मन चाहता है, वह प्रेम भाव से प्राप्त होता है।

22हे नानक ! ठाकुर मेरा मित्र है।हम लोगों के नहीं अर्थात् प्रभु के हैं।॥ ४॥ १ ॥

23आसा महला १ ॥

24मेरे मन में रुणझुन धुंघरुओं एवं वाद्य यन्त्रों की ध्वनि करने वाला अनहद शब्द निरन्तर बज रहा है।

25मेरा मन अपने प्रियतम राम के प्रेम में रंग गया है।

26वैरागी मन रात-दिन एक ईश्वर में लीन रहता है और शून्य मण्डल में बसेरा पा लेता है।

27सतिगुरु ने मुझे अपरम्पार, अदृष्ट एवं प्यारा आदिपुरुष दिखा दिया है।

28अपने आसन पर बैठने वाला नारायण सदैव स्थिर रहता है। मेरा मन उसके प्रेम में मग्न रहता है और उसका ही सिमरन करता रहता है।

29हे नानक ! जो परमात्मा के नाम में मग्न रहते हैं, उनके मन में वैराग्य पैदा हो जाता है और उनके मन में अनहद शब्द की सुरीली रुणझुनकार होती रहती है॥ १॥

30कहो, मैं अगम्य राम के उस अगम्य नगर में किस विधि से पहुँच सकता हूँ?

31सत्य, संयम एवं प्रभु के गुणों को ग्रहण करके गुरु के शब्द को कमाना चाहिए।

32सत्य शब्द के अनुकूल आचरण बनाने से मनुष्य प्रभु के घर पहुँच जाता है और गुणों के भण्डार को प्राप्त कर लेता है।

33उस भगवान का आश्रय लेने पर उसकी शाखाओं, डालियों, जड़ एवं पत्तों की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि वह खुद ही सबके सिर पर प्रधान स्वामी है।

34लोग जप, तप एवं संयम करके थक गए हैं। हठ निग्रह द्वारा भी उन्हें भगवान प्राप्त नहीं होता।

35हे नानक ! सहजता में रहकर ही जगजीवन प्रभु मिलता है, पर इसकी सूझ सतगुरु से ही जानी जाती है॥ २॥

36गुरु एक सागर एवं रतनागर हैं, जिसमें अनेक रत्न विद्यमान हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं