गुरु ग्रंथ साहिब 435 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji
1क्योंकि पहले तो पण्डित के अपने गले में माया का फन्दा पड़ता है और तदुपरांत अपने शिष्यों के गले में भी वही फाँसी पड़ जाती है॥ ५॥
2स-हे मूर्ख ! तूने अपना संयम गंवा दिया है। एक तो तूने अयोग्य दान ले लिया है।
3यजमान की पुत्री तेरी अपनी ही पुत्री है और उसका विवाह कराकर दान लेकर पाप किया है। इस धन को लेकर तूने अपने जन्म का सत्यनाश कर लिया है॥ ६॥
4म-हे मुर्ख ! तेरी बुद्धि भष्ट हो गई है, अहंकार का बड़ा रोग तुझे लग गया है।
5अपनी अन्तरात्मा में तुम ब्रह्म को नहीं पहचानते और माया के मोहताज बनकर रह गए हो ॥ ७ ॥
6क-हे मूर्ख ! तुम कामवासना एवं क्रोध में भटकते फिरते हो और सांसारिक ममता के साथ लग कर तूने हरि को भुला दिया है।
7तुम धार्मिक ग्रंथ पढ़ते रहते हो, उनके गुणों के बारे में सोचते रहते हो और बहुत ऊँची-ऊँची बोलकर दूसरों को सुनाते रहते हो। परन्तु ज्ञान को समझे बिना तुम डूब कर मर चुके हो॥ ८॥
8त-हे मूर्ख ! क्रोधाग्नि ने तुझे जला कर रख दिया है। थ-जिस स्थान पर तुम रहते हो, वह भी भृष्ट हो गया है।
9घ-हे मूर्ख (पण्डित) ! तुम घर-घर पर माँगते फिरते हो। द-प्रभु नाम का दान तूने अभी तक किसी गुरु से नहीं लिया।॥९॥
10प-हे मूर्ख ! तुम दुनिया के प्रपंचों में इतने लिपटे हुए हो कि तुम्हारा भवसागर से पार उतारा नहीं होना।
11सत्य (प्रभु) ने तुझे स्वयं मोह-माया में कुमार्गगामी किया है। हे मूर्ख ! तेरे सिर पर यही भाग्य लेख लिखा हुआ था ॥ १०॥
12भ-हे मूर्ख ! तू माया में इतना लीन हो चुका है कि भवसागर में डूबता जा रहा है।
13जो गुरु की कृपा से एक ईश्वर को समझता है, वह एक क्षण में ही भवसागर से पार हो जाता है॥ ११॥
14व-हे मूर्ख ! किस्मत से तेरी अब मानव जन्म में गोविन्द मिलन की बारी आई है। लेकिन तूने वासुदेव को भुला दिया।
15हे मूर्ख ! यह शुभावसर तुझे दोबारा प्राप्त नहीं होना, तुम यमदूतों के वश में आ जाओगे॥ १२ ॥
16झ-हे मूर्ख ! तुझे कभी दु:ख क्लेश नहीं होगा यदि तू सच्चे गुरु का उपदेश सुनकर देख ले।
17सच्चे गुरु के बिना दूसरा कोई गुरु नहीं और निगुरे का नाम ही बुरा है॥ १३॥
18ध-हे मूर्ख ! विषय-विकारों में भटकते हुए मन को अंकुश लगा क्योंकि तेरे अन्तर्मन में ही प्रभु नाम का खजाना है।
19यदि मनुष्य गुरुमुख बन जाए तो वह हरि रस का पान करता है और युग-युगांतरों तक वह इसका पान करता रहता है॥ १४॥
20ग-हे मूर्ख ! गोबिन्द को याद कर, केवल निरर्थक बातें करने से ही किसी ने कभी उसे प्राप्त नहीं किया।
21हे मूर्ख ! गुरु के चरण अपने हृदय में बसा, वह तेरे पिछले गुनाह सब क्षमा कर देंगे॥ १५॥
22ह-हे मूर्ख ! हरि की कथा को समझ, तभी तुझे सदैव सुख प्राप्त होगा।
23मनमुख जितना भी पढ़ते हैं उतना ही अधिक दु:ख प्राप्त करते हैं, सच्चे गुरु के बिना उनकी जीवन-मृत्यु से मुक्ति नहीं होती।॥ १६ ॥
24र-हे मूर्ख ! जिनके हृदय में राम बस रहा है, उनकी संगति करके तू राम को याद कर।
25गुरु की कृपा से जिन्होंने राम को पहचान लिया है, उन्होंने समझकर निर्गुण राम को पा लिया है॥ १७ ॥
26हे प्रभु ! तेरा अन्त नहीं पाया जा सकता। अकथनीय हरि का कथन नहीं किया जा सकता।
27हे नानक ! जिन्हें सच्चा गुरु मिल गया है उनका (कर्मो का) लेखा मिट गया है॥ १८॥ १॥ २॥
28रागु आसा महला १ छंत घरु १
29ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
30हे मुग्धा यौवन बाला ! मेरा पिया राम बड़ा ही रंगीला आनंद विनोदी है।
31यदि पति-पत्नी में बड़ा प्रेम हो जाए तो दयालु राम और भी प्रीति प्रदान करता है।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं