सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 434 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji

1वह समस्त जीव-जन्तुओं को अपनी गोटियां बनाकर स्वयं ही गोटियां फॅक कर खेलने लग गया ॥ २६॥

2भ-गुरु की कृपा से जिनके मन में प्रभु का भय टिक जाता है, वह खोजते हुए फल के तौर पर उसे पा लेते हैं।

3स्वेच्छाचारी मूर्ख मनुष्य भटकते फिरते हैं और प्रभु को याद नहीं करते, परिणामस्वरूप वे चौरासी लाख योनियों के चक्र में पड़े रहते हैं॥ २७ ॥

4म-दुनिया के मोह के कारण जीव को मृत्यु एवं मधुसूदन याद नहीं आता लेकिन जब मृत्यु का समय आता है, तभी प्राणी में प्रभु स्मरण का विचार उत्पन्न होता है।

5जब तक काया में प्राण है, वह दूसरी बातें पढ़ता रहता है और ‘म' अक्षर मृत्यु एवं मधुसूदन को विस्मृत कर देता है॥ २८ ॥

6य-यदि मनुष्य सत्य को पहचान ले तो वह दोबारा कदाचित जन्म नहीं लेता।

7गुरुमुख बनकर ही प्रभु के बारे में कहा जा सकता है, गुरुमुख बनकर ही मनुष्य उसके भेद को समझता है और गुरुमुख ही एक ईश्वर को जानता है ॥२९॥

8र-परमात्मा ने जितने भी जीव पैदा किए, वह सब जीवों के अन्तर में बस रहा है।

9प्रभु ने जीवों को उत्पन्न करके उन्हें जगत के कामकाज में लगा दिया है। जिन पर ईश्वर की करुणा होती है, वे उसका नाम-स्मरण करते हैं॥ ३० ॥

10ल-प्रभु ने जीवों की उत्पत्ति करके उन्हें विभिन्न कार्यों में लगा दिया है, उसने उनके लिए माया का मोह मीठा बना दिया है।

11वह जीवों को खाने-पीने के पदार्थ देता है। उसकी रज़ा में उसका हुक्म क्रियान्वित होता है। इसलिए सुख-दुःख को एक समान समझना चाहिए॥ ३१॥

12व-वासुदेव परमेश्वर ने देखने हेतु संसार रूपी वेष रचा है।

13वह देखता, चखता एवं सब कुछ जानता है। यह जीवों के भीतर एवं बाहर व्यापक हो रहा है। ३२ ॥

14ड़ - हे प्राणी ! तुम क्यों वाद - विवाद करते हो, इसका कोई लाभ नहीं इसलिए उस परमात्मा को याद करो जो अमर है। उसका ध्यान - मनन करो और सत्य में समां जाओ और उस पर कुर्बान होवो।

15ह-प्रभु के अलावा दूसरा कोई दाता नहीं जो जीवों को उत्पन्न करके उन्हें रोज़ी प्रदान करके उनका भरण-पोषण करता है।

16हरि-नाम का ध्यान करो, हरि के नाम में समा जाओ और रात-दिन हरिं नाम का लाभं प्राप्त करो।। ३४ ।।

17जिस परमात्मा ने आप ही दुनिया की रचना की है, वह जो कुछ करना चाहता है, वही कुछ कर रहा है।

18नानक कवि ने यही कहा है कि प्रभु खुद ही सबकुछ करता और जीवों से करवाता है। वह सबकुछ जानता है॥ ३५॥ १॥

19रागु आसा महला ३ पटी

20ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

21अयो अंडै का अर्थ यह वर्णित किया गया है कि यह समूचा जगत परमात्मा के हुक्म से पैदा हुआ है, काखे घंडै का यह अर्थ बताया गया है कि यह जगत काल (मृत्यु) के वश में पड़ गया है।

22री री लली का अर्थ यह वर्णित है कि नश्वर प्राणी पाप कर्म करता जा रहा है और अवगुणों में फॅसकर गुणों को विस्मृत किए जा रहा है॥ १॥

23हे मेरे मन ! तूने भला ऐसा लेखा क्यों पढ़ा है,

24क्योंकि तेरे सिर पर लेखा देना अभी भी शेष है॥ १॥ रहाउ ॥

25सिघंडाइऐ - हे जीव ! तुम प्रभु को याद नहीं करते। न-न ही तुम उसका नाम लेते हो।

26छ - हे मुर्ख जीव ! तुम रात दिन नाश होते जा रहे हो अर्थात अपना गवां रहे हो। जब यमदूत ने तुझे पकड़ लिया तो फिर कैसे मुक्त होवोगे। ॥२॥

27व-हे मूर्ख ! तुम सन्मार्ग नहीं समझते और भ्रम में कुमार्गगामी होकर तुम अपना जन्म व्यर्थ गंवा रहे हो।

28तुमने निरर्थक ही अपना नाम पण्डित (पांधा) रखवाया है, जबकि दूसरों का भार अपने सिर पर लादा हुआ है।॥ ३॥

29ज-हे मूर्ख ! तेरी सुमति मोह-माया ने छीन ली है, अन्तिम समय जब संसार से गमन करोगे तो पश्चाताप करोगे।

30एक शब्द (अर्थात् परमात्मा के नाम) की तुम पहचान नहीं करते जिसके परिणामस्वरूप बार-बार योनियों में आते रहोगे ॥ ४ ॥

31हे पण्डित ! जो तेरे सिर पर तकदीर का लेख लिखा हुआ है, उसे पढ़ और दूसरों को विष रूपी माया का लेखा मत पढ़ा।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं