गुरु ग्रंथ साहिब 433 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1छ-हे भगवान ! तेरी ही माया रूपी छाया समस्त जीवों के भीतर अग्रसर है। भ्रम तेरा ही बनाया हुआ है।
2भ्रम उत्पन्न करके तुम स्वयं ही जीवों को कुमार्गगामी करते हो। जिन पर तेरी मेहर है, उन्हें गुरु मिल जाता है। १० ॥
3ज-हे प्रभु! तेरा यह याचक जो चौरासी लाख योनियों में भीख माँगता था, तुझसे तेरा ज्ञान माँगता है।
4एक प्रभु ही (दान) ले जाता है और एक वही दान देता है। किसी दूसरे के बारे में मैंने अभी तक नहीं सुना। ॥११॥
5झ - हे प्राणी ! तुम क्यों संवेदनाओ से मर रहे हो। जो कुछ भगवान् ने हमें निर्वाह हेतु देना है, वह हमें देता जा रहा है।
6जैसे-जैसे प्राणियों हेतु विधि के विधान अनुसार भोजन निश्चित है, भगवान सबको दे रहा है, वह सबका भरण-पोषण कर रहा है ॥ १२ ॥
7ज-जब मैं अपनी दृष्टि से हर तरफ देखता हूँ तो मुझे भगवान के अलावा कोई भी दिखाई नहीं देता।
8एक ईश्वर समस्त स्थानों में मौजूद है और वही मन में बसता है। १३॥
9ट-हे प्राणी! तुम क्यों छल-कपट कर रहे हो। इस दुनिया से तुम एक क्षण एवं पल भर में ही उठकर चले जाओगे अर्थात् प्राण त्याग दोगे।
10अपने जन्म खेल को जुए में मत हारो और भाग कर हरि की शरण में चले जाओ। १४ ॥
11ठ-जिनका चित्त हरि के चरणों से लग जाता है, उनके अन्तर्मन में सुख-शांति बस जाती है।
12हे प्रभु! जिनका चित्त तुझसे जुड़ा हुआ है, वे मनुष्य संसार-सागर से पार हो जाते हैं और तेरी कृपा से उन्हें सुख प्राप्त होता है। १५॥
13ड-हे नश्वर प्राणी ! तुम क्यों व्यर्थ के आडम्बर करते हो, सृष्टि में जो कुछ उत्पन्न हुआ है, वे सब नाशवान है।
14यदि प्रभु की भक्ति करोगे तभी तुझे आत्मिक सुख प्राप्त होगा। प्रभु समस्त जीवों में निरन्तर व्यापक है। १६ ॥
15ढ-प्रभु स्वयं ही सृष्टि रचना को ध्वस्त करता है और स्वयं ही निर्मित करता है। जैसे उसको मंजूर है वह वैसे ही करता है।
16सृष्टि की रचना करके वह देखता एवं अपना हुक्म जीवों पर लागू करता है। वह जिस जीव पर अपनी करुणा-दृष्टि करता है, उसे मुक्ति प्रदान कर देता है॥ १७ ॥
17ण-जिस प्राणी के अन्तर में प्रभु समाया हुआ है, वह हरि का गुणगान करता रहता है।
18कर्ता प्रभु जिसे अपने साथ मिला लेता है, वह बार-बार जन्म नहीं लेता। १८ ॥
19त-यह भयानक संसार-सागर बहुत गहरा है, इसका कोई भी अन्त (किनारा) नहीं पाया जा सकता।
20हमारे पास न कोई नैया है और न ही कोई तुला है। हे तारनहार प्रभु ! मैं डूब रहा हूँ, मुझे पार कर दीजिए॥१९॥
21थ-समस्त स्थानों एवं हर जगह पर ईश्वर मौजूद है। उसका किया ही सृष्टि में सब कुछ होता है।
22भ्रम क्या है? माया किसे कहते हैं ? जो कुछ उसे मंजूर है, वही भला है॥२०॥
23द-हमें किसी पर दोष नहीं लगाना चाहिए क्योंकि दोष तो हमारे अपने कर्मो का है।
24जो कुछ (अच्छा-बुरा) कर्म मैंने किया था, उसका फल मुझे मिल गया है। इसलिए मैं किसी दूसरे पर दोष नहीं लगाता ॥२१ ॥
25ध-जिस परमात्मा की कला (शक्ति) ने धरती को टिकाया एवं स्थापित किया हुआ है, जिसने प्रत्येक वस्तु को रंग (अस्तित्व) प्रदान किया है,
26जिसका दिया सभी प्राप्त करते हैं और उसका हुक्म प्राणियों के कर्मो अनुसार क्रियाशील है॥२२॥
27न-मैं अपने मालिक-प्रभु के दिए पदार्थ नित्य भोगती रहती हूँ लेकिन मैंने आज तक उसे न कभी देखा है और न कभी याद किया है।
28हे बहन ! बातों से तो कहने को मैं सुहागिन कही जाती हूँ परन्तु मेरा पति-प्रभु मुझे कभी नहीं मिला ॥२३॥
29प-पातशाह परमेश्वर ने सृष्टि की रचना अपने देखने के लिए की है।
30प्रभु जीवों को देखता, समझता एवं सब कुछ जानता है। भीतर एवं बाहर वह सबमें समाया हुआ है॥ २४॥
31फ-समूचा जगत फाँसी में फँसा हुआ है और यम ने जंजीर से बांधा हुआ है।
32गुरु के प्रसाद (कृपा) से वही नर पार होते हैं जो भागकर हरि की शरण लेते हैं।॥ २५॥
33ब-चारों ही युगों को अपनी चौपड़ बनाकर प्रभु ने खेल खेलना शुरू कर दिया।
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं