गुरु ग्रंथ साहिब 430 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji
1अल्लाह की भक्ति बड़ी निराली है जो गुरु के उपदेश द्वारा ही समझी जाती है।
2हे नानक ! जिसके हृदय में परमात्मा का नाम बस जाता है वह प्रभु-भय एवं भक्ति द्वारा उसके नाम से अपना जीवन संवार लेता है॥ ६॥ १४॥ ३६॥
3आसा महला ३ ॥
4दूसरे पदार्थों के स्वादों में फँसकर मनुष्य भटकता ही रहता है और नाम के बिना बड़ा दु:ख प्राप्त करता है।
5उसे सच्चे गुरु जैसा महापुरुष नहीं मिलता जो सत्य की सूझ प्रदान करता है। १ ॥
6हे मेरे बावले मन ! हरि-रस को चखकर उसका स्वाद प्राप्त कर।
7दूसरे रसों से जुड़ कर तुम भटकते फिरते हो और अपना अनमोल जन्म व्यर्थ ही गंवा रहे हो। १॥ रहाउ ।
8इस युग में गुरुमुख पवित्र-पावन हैं जो सत्यनाम में लगन लगाकर रखते हैं।
9तकदीर के बिना कुछ भी प्राप्त नहीं होता और इस बारे हम क्या कह अथवा कर सकते हैं ? ॥ २ ॥
10जो अपने मन से विकारों को निकाल देता है और गुरु के शब्द द्वारा मर जाता है, वह अपने आपको पहचान लेता है।
11जो गुरु की शरणागत भाग कर चले जाते है,उनको क्षमावान परमात्मा है क्षमा कर देता है ॥३॥
12नाम के बिना सुख प्राप्त नहीं होता और न ही भीतर से दु:ख दूर होता है।
13यह दुनिया माया के मोह में लिप्त है और द्वैतवाद एवं भ्रम में कुमार्गगामी हो गई है। ४ ।
14दुहागिन जीव-स्त्रियाँ अपने पति-प्रभु की कद्र को नहीं जानती।
15वह श्रृंगार करके क्या करेंगी ! वह रात-दिन सदा (तृष्णाओं में) जलती रहती हैं और अपने पति-प्रभु के साथ सेज पर रमण नहीं करतीं। ५ ।
16सुहागिन जीव-स्त्रियाँ अपने अहत्च को भीतर से दूर करके अपने प्रभु के महल को प्राप्त कर लेती हैं।
17गुरु के शब्द से उन्होंने श्रृंगार किया हुआ है और उनका प्राणनाथ उन्हें अपने साथ मिला लेता है। ६॥
18माया-मोह के अन्धकार में मनुष्य ने अपने मन में से मृत्यु को भुला दिया है।
19स्वेच्छाचारी मनुष्य बार-बार मरते और यम के द्वार पर दु:खी होते हैं। ७ ।
20जिन्हें भगवान आप मिलाता है वह गुरु-शब्द का चिन्तन करके उससे मिल जाते हैं।
21हे नानक ! जो प्रभु-नाम में समाए हुए हैं, उस सच्चे दरबार में उनके मुख उज्ज्वल हो जाते हैं ॥८॥२२॥१५॥३७॥
22आसा महला ५ असटपदीआ घरु २
23ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
24सत्य, दया, धर्म, संतोष एवं ज्ञान-पाँचों गुणों को जब मैंने अपना मित्र बनाया तो कामादिक पांचो विकार - काम, क्रोध लोभ, मोह, अहंकार, नाराज होकर मेरी अंतरात्मा से निकल कर भाग गए। इस तरह पाँचों गुण भीतर बसने लगे और पाँच विकार दूर हो गए। १॥
25हे मेरे भाई! इस विधि से मेरा शरीर रूपी नगर बस गया।
26पाप-विकार दूर हो गए और गुरु ने मेरे भीतर ज्ञान दृढ़ कर दिया। १॥ रहाउ ।
27इस शरीर रूपी नगर के चारों ओर रक्षा हेतु सत्य धर्म की बाड़ लगा दी।
28गुरु प्रदत ज्ञान एवं मनन के मजबूत द्वार लगा दिए गए। २ ।
29हे मेरे भाई! हे मित्र ! प्रभु-नाम की फसल बीज।
30नित्य गुरु की सेवा का सौदा करो। ३॥
31शांति एवं सहज सुख की सभी दुकानें भरी हुई हैं।
32गुरु शाह एवं शिष्य व्यापारी एक ही स्थान पर बसते हैं। ४ ॥
33कोई यम जजिया, दण्ड एवं महसूल चुंगी नहीं लगते,
34क्योकि सतिगुरु ने प्रभु की मोहर लगा दी है ॥ ५ ॥
35हे भाई ! तुम भी नाम-सुमिरन का सौदा लादकर व्यापार किया करो।
36इस तरह तुम गुरु की शिक्षा पर चलकर लाभ प्राप्त करके अपने घर आ जाओगे ॥ ६॥
37सतिगुरु नाम धन का शाह है और उसके शिष्य व्यापारी हैं।
38पूँजी प्रभु का ही नाम है और परमात्मा की आराधना लेखा-जोखा है। ७ ॥
39हे नानक ! जो मनुष्य पूर्ण गुरु की सेवा करता है, वही इस घर में रहता है
40और प्रभु की नगरी अविचल (अटल) है॥ ८ ॥ १॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं