गुरु ग्रंथ साहिब 42 · Siree Raag · Guru Raam Daas Ji
1वह सदैव मृत्यु को अपने नेत्रों के समक्ष रखते हैं और प्रवास हेतु व्यय के लिए परमेश्वर के नाम की राशि एकत्र करते हैं, जिससे लोकों में उन्हें मान-यश प्राप्त होता है।
2गुरमुख जीवों की प्रभु के दरबार भरपूर प्रशंसा होती है। ईश्वर इन जीवों को आलिंगन में ले लेता है॥ २॥
3गुरमुख जीवों हेतु यह मार्ग प्रत्यक्ष है। ईश्वर के दरबार में प्रवेश करने में कोई बाधा नहीं आती।
4वे सदैव हरिनाम का यशगान करते हैं, उनके नाम में चित्त को भीतर रखते हैं तथा नित्य हरिनाम के यश में लिवलीन रहते हैं।
5प्रभु के दर पर अनाहत ध्वनि होती है, जो गुरमुख प्राणी प्रभु आश्रय में पहुँचते हैं तथा प्रभु के सच्चे दरबार में सम्मान प्राप्त करते हैं।॥ ३॥
6जो गुरमुख प्राणी गुरुओं द्वारा प्रभु का यशोगान करते हैं, उन्हें सबकी प्रशंसा प्राप्त होती है।
7हे मेरे परमेश्वर ! मुझे उन पवित्र आत्माओं की संगति प्रदान करो, मैं तेरा याचक यही वंदना करता हूँ।
8हे नानक ! उन गुरमुख प्राणियों के बड़े सौभाग्य हैं, जिनके हृदय के भीतर भगवान के नाम का प्रकाश उज्ज्वल है॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥
9श्रीरागु महला ५ घरु १ ॥
10हे मूर्ख ! तुम अपने पुत्रों, स्त्री व सांसारिक पदार्थों को देखकर इतने मुग्ध क्यों हो रहे हो ?
11तू संसार के विभिन्न रस भोग रहा है, हर्ष, आनंद तथा अनंत स्वादों में रत हो।
12तुम बहुत सारे आदेश प्रदान करते हो और लोगों से अहंभाव से व्यवहार करते हो।
13कर्ता-पुरुष परमात्मा तुझे स्मरण नहीं होता, इसलिए तुम मनमुख, अज्ञानी एवं गंवार हो।॥१॥
14हे मेरे मन ! वास्तविक सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला वह भगवान है।
15मनुष्य के सुकर्मो द्वारा ही उसे गुरु मिलता है और गुरु की अपार कृपा से ही परमेश्वर प्राप्त होता है।॥१॥ रहाउ॥
16हे मूर्ख ! तुम सुन्दर वस्त्र पहनने, नाना प्रकार के व्यंजन सेवन करने तथा सोने-चांदी के आभूषण व सम्पति इत्यादि एकत्र करने में लगे हो।
17ये अश्व, हाथीं तथा अनेक प्रकार के रथ इत्यादि तुम्हारे पास हैं। वह न थकने वाली गाड़ियों जमा करता है।
18इस वैभव में वह किसी अन्य को स्मरण ही नहीं करता। अपने समस्त संबंधियों की भी उपेक्षा कर दी है।
19उसने इस सृष्टि के रचनाकार प्रभु को विस्मृत कर दिया है और नाम के बिना वह अपवित्र है॥ २॥
20लोगों की बद-दुआएँ ले-लेकर तुमने इतनी धनराशि जमा कर ली है।
21जिन संबंधियों की प्रसन्नता हेतु तुम यह सब करते हो, वे भी तुम्हारे सहित नश्वर हैं।
22हे अहंकारी मनुष्य ! तुम अभिमान करते हो तथा घमंड में लीन होकर मन-मति पर चलते हो।
23जिस प्राणी ने कुमार्ग पर चलकर प्रभु को विस्मृत कर दिया है, उसकी न तो कोई जाति है और न ही कोई मान-सम्मान ॥३ ॥
24सतिगुरु ने कृपावश उस परम-पुरुष से मुझे मिला दिया है जो कि मेरा अद्वितीय मित्र तथा एकमात्र सहारा है।
25प्रभु-भक्तों का एक परमेश्वर ही रक्षक है। अहंकारी मनुष्य अहंकारवश व्यर्थ क्यों विलाप करते रहते हो।
26परमेश्वर वही करता है, जो कुछ भक्तों को अच्छा लगता है। ईश्वर के दरबार से भगवान के भक्तों को कोई लौटा नहीं सकता।
27हे नानक ! जो मानव जीव भगवान के प्रेम रंग में मग्न हैं वह सम्पूर्ण संसार में प्रकाश पुंज बन जाता है ॥ ४॥ १ ॥ ७१ ॥
28श्रीरागु महला ५ ॥
29हे मानव ! तेरा मन आनंद-उल्लास, गहरे तथा अनेकों विलास मनाने तथा नेत्रों के दृश्यों के रस में डूबा होने के कारण जीवन का मनोरथ भूल गया है।
30छत्रपति बादशाह जिन्हें सिंहासन प्राप्त हुआ हैं, वह भी संशय में पड़े हुए हैं।॥ १॥
31हे भाई ! सत्संग के भीतर बड़ा सुख प्राप्त होता है।
32उस विधाता ने जिस पुरुष का शुभ भाग्य लिख दिया है उसकी समस्त चिंताएँ मिट जाती हैं॥१॥ रहाउ ॥
33मैं इतने स्थानों के भीतर चक्र काट आया हूँ कि जितनी की सर्वत्र हैं।
34धन के स्वामी एवं बड़े-बड़े जमींदार ‘यह मेरी है, यह मेरी है' पुकारते हुए नश्वर हो गए हैं। २॥
35वे निर्भय होकर आदेश जारी करते हैं तथा अहंकारवश होकर समस्त कार्य करते हैं।
36उसने सारे वश में कर लिए हैं, परन्तु हरि-नाम के बिना वे मिट्टी में मिल जाते हैं।॥ ३॥
37प्रभु के दरबार में तेतीस करोड़ देवी-देवता, सिद्ध इत्यादि कर्मचारियों तथा अभ्यासी अनुचरों की भाँति खड़े थे
38और जो पहाड़ों, समुद्रों पर साम्राज्य कायम करके शासन करते थे, हे नानक ! ये सारे ही स्वप्न हो गए हैं॥ ४॥ २॥ ७२ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं