सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 428 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji

1सच्चे शब्द का चिंतन करने से उन्हें अपने हृदय घर में प्रभु मिल गया है। १॥

2उन्होंने अपने गुणों द्वारा अपने अवगुणों को क्षमा करवा लिया है और हरि से लगन लगा ली है।

3इस तरह जीव-स्त्री ने हरि-प्रभु को वर के रूप में प्राप्त कर लिया है और यह मिलन गुरु ने करवाया है। १ ॥रहाउ ॥

4कुछ जीव-स्त्रियाँ पति-प्रभु को अपने आस-पास नहीं जानती और द्वैतभाव एवं दुविधा में पड़कर कुमार्गगामी हुई रहती हैं।

5दुहागिन कैसे अपने पति-प्रभु को मिल सकती है। उसकी जीवन रात्रि दु:ख में ही व्यतीत हो जाती है। २ ।

6जिनके मन में सत्य निवास करता है, वे सत्य की कमाई करती हैं।

7वह रात-दिन सहजता से प्रभु की सेवा करती रहती हैं और सत्य में समा जाती हैं॥ ३॥

8दुहागिन जीव-स्त्रियाँ दुविधा में भटकती हैं और झूठ बोलकर माया के मोह का विष खाती हैं।

9वह अपने प्राणनाथ को नहीं जानती और सूनी सेज पर दु:ख सहन करती हैं। ४ ।

10हे मेरे मन ! सच्चा साहिब एक प्रभु ही है, इसलिए तुम दुविधा में कुमार्गगामी होकर भटक मत जाना।

11गुरु से पूछ कर अपने प्रभु की निष्ठा से सेवा करो और निर्मल सत्य नाम को अपने मन में बसाओ ॥ ५॥

12सुहागिन जीव-स्त्री सदा अपने पति-प्रभु को पा लेती है और अपने अहंकार एवं द्वैतवाद को दूर कर देती है।

13वह रात-दिन अपने पति-प्रभु से जुड़ी रहती है और सत्य की सेज पर सुख प्राप्त करती है॥ ६॥

14जो इस दुनिया में यही कहते रहते हैं कि यह धन मेरा है, यह सम्पत्ति मेरी है, उनके पास कुछ भी नहीं रहता और बिना कुछ प्राप्त किए ही संसार से चले जाते हैं।

15दुहागिन जीव-स्त्री अपने प्रभु के महल को प्राप्त नहीं होती और अंततः पश्चाताप करती हुई चली जाती है। ७ ॥

16मेरा प्रियतम प्रभु केवल एक ही है और मैं सिर्फ एक से ही प्रेम करता हूँ।

17हे नानक ! यदि जीव-स्त्री सुख चाहती है तो उसे हरि का नाम अपने मन में बसाना चाहिए। ॥८॥११॥३३॥

18आसा महला ३ ॥

19जिन्हें भगवान ने नामामृत स्वयं चखाया है, उन्हें सहज स्वभाव ही स्वाद प्राप्त हुआ है।

20वह सच्चा पातशाह बेपरवाह है और उसे तिल मात्र भी लोभ-लालच नहीं ॥ १ ॥

21भगवान का सच्चा अमृत सर्वत्र बरस रहा है लेकिन यह अमृत गुरुमुख लोगों के मुँह में पड़ रहा है।

22गुरुमुखों का मन सदैव खिला रहता है और वे सहज ही भगवान का गुणगान करते रहते हैं। १॥ रहाउ ॥

23मनमुख जीव-स्त्रियाँ सदा दुहागिन रहती हैं और भगवान के द्वार पर खड़ी विलाप करती रहती हैं।

24जिन्हें पति-परमेश्वर के मिलन का स्वाद नहीं मिला, वे वही कर्म करती रहती हैं, जो उनके लिए प्रारम्भ से लिखा हुआ है। २॥

25गुरुमुख हृदय रूपी खेत में सत्य नाम का बीज बोते हैं और जब यह अंकुरित हो जाता है तो वे केवल सत्यनाम का ही व्यापार करते हैं।

26जिन लोगों को भगवान ने इस लाभप्रद कार्य में लगाया है, उन्हें वह अपनी भक्ति का भण्डार प्रदान करता है| ३॥

27गुरुमुख जीव-स्त्री सदा सुहागिन है, उसने प्रभु-भय एवं भक्ति का श्रृंगार किया हुआ है।

28वह रात-दिन अपने प्राणनाथ के साथ रमण करती है और सत्य को अपने हृदय के साथ लगाकर रखती है॥४॥

29में उन पर कुर्बान जाता हूँ, जिन्होंने अपने पति-प्रभु के साथ रमण किया है।

30अपने मन का अहंत्व नाश करके वह सदा अपने पति-परमेश्वर के साथ रहती हैं। ५ ।

31अपने पति-परमेश्वर के प्रेम के कारण उनका तन-मन शीतल एवं मुख उज्ज्वल बना रहता है।

32वे अपना अहंकार एवं तृष्णा का नाश करके सुखदायक सेज पर अपने पति-प्रभु के साथ रमण करती हैं। ६॥

33गुरु के अपार प्रेम के कारण प्रभु कृपा धारण करके जीव-स्त्री के हृदय घर में आ जाता है।

34सुहागिन जीव-स्त्री को एक मुरारी प्रभु वर के रूप में प्राप्त हो जाता है॥ ७॥

35गुरु उसके सारे गुनाह क्षमा कर देता है और मिलाने वाला उसे अपने साथ मिला लेता है।

36हे नानक ! ऐसी स्तुतिगान की बात कहनी चाहिए, जिसे सुनकर तेरा स्वामी तुझसे प्रेम करने लग जाए। ८ ॥ १२॥ ३४॥

37आसा महला ३ ॥

38जब प्रभु हमें सच्चे गुरु से मिला देता है तो हम गुरु से गुण प्राप्त करते हैं।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं