सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 423 · Raag Aasaa · Guru Amar Daas Ji

1उसके रूप जाने नहीं जा सकते, वर्णन करने एवं सोचने से मनुष्य क्या कर सकते हैं ? ॥ २॥

2हे स्वामी ! इस सृष्टि में तीन गुण (रजो, तमो, सतो) तेरे द्वारा उत्पादित हैं। सृष्टि रचना के चार स्रोत तेरे द्वारा ही निर्मित हैं।

3यदि तुम दयालु हो जाओ तो ही मनुष्य परम पदवी प्राप्त करता है और तेरी अकथनीय कहानी को कथन करता है॥ ३॥

4हे भगवान ! तू जग का रचयिता है। सब कुछ तेरा ही किया हुआ है, कोई प्राणी क्या कर सकता है?

5हे परमेश्वर ! जिस मनुष्य पर तू कृपादृष्टि करता है केवल वही सत्य में समा जाता है॥ ४॥

6प्रत्येक जीव जो आता एवं जाता है अर्थात् जन्म-मरण के चक्र में पड़ा है, वह तेरे नाम का जाप करता है।

7यदि तुझे भला लगे तभी गुरुमुख तुझे समझता है। शेष स्वेच्छाचारी मूर्ख प्राणी भटकते ही रहते हैं।॥ ५॥

8चारों वेद (भगवान ने) ब्रह्मा जी को दे दिए लेकिन वह पढ़ पढ़ कर विचार ही करता रहता है।

9प्रभु के हुक्म को बेचारा समझता ही नहीं और नरक-स्वर्ग में जन्म लेता है॥ ६॥

10युग-युग में ईश्वर ने राम, कृष्ण इत्यादि राजा उत्पन्न किए जिन्हें लोग अवतार मान कर गुणस्तुति करते आ रहे हैं।

11लेकिन वे भी उसका अन्त नहीं पा सके, फिर मैं क्या कहकर उसके गुणों का विचार कर सकता हूँ॥ ७ ॥

12तू सदैव सत्य है और तेरा पैदा किया हुआ सब कुछ भी सत्य है। यदि तुम मुझे सत्य प्रदान करो, तभी मैं इसका वर्णन करूँगा।

13हे भगवान ! जिस मनुष्य को तुम अपने सत्य की सूझ प्रदान करते हो, वह सहज ही तेरे नाम में समा जाता है॥ ८॥ १॥ २३॥

14आसा महला ३ ॥

15सच्चे गुरु ने मेरा भ्रम दूर कर दिया है;

16उसने हरि का निरंजन नाम मेरे मन में बसा दिया है।

17शब्द की पहचान करने से मुझे सदैव सुख उपलब्ध हो गया है॥ १॥

18हे मेरे मन ! तू तत्व ज्ञान को सुन।

19देने वाला (परमात्मा) समस्त विधियाँ जानता है। गुरु की शरण में रहने से ही नाम का भण्डार प्राप्त होता है।॥ १॥ रहाउ॥

20सतिगुरु से भेंट करने की यह बड़ाई है कि

21उसने ममता एवं तृष्णाग्नि को बुझा दिया है और

22मैं सहज अवस्था में रंगा हुआ हरि का गुणगान करता रहता हूँ॥ २॥

23पूर्ण गुरु के बिना कोई भी जीव प्रभु को नहीं जानता।

24क्योंकि मनुष्य माया-मोह एवं व्यर्थ के लोभ में फँसा हुआ है।

25गुरु के माध्यम से ही मनुष्य प्रभु का नाम एवं हरि की वाणी को पा लेता है॥ ३॥

26गुरु की सेवा समस्त तपस्याओं की महान् तपस्या एवं सार है।

27तब पूज्य परमेश्वर मनुष्य के मन में बस जाता है और वह सारे दुःख दर्द को भुलाने वाला है।

28वह सत्य के दरबार में सत्यवादी दिखाई देता है॥ ४॥

29गुरु की सेवा करने से मनुष्य को तीन लोकों की सूझ प्राप्त हो जाती है और

30अपने आत्मस्वरूप को पहचान कर वह उस प्रभु को प्राप्त कर लेता है।

31सच्ची गुरुवाणी के माध्यम से प्राणी प्रभु के महल को प्राप्त कर लेता है॥ ५॥

32गुरु की सेवा करने से मनुष्य अपनी कुल (वंश) का उद्धार कर लेता है और

33निर्मल नाम को अपने हृदय में बसा कर रखता है।

34सत्य के दरबार में वह सत्य की शोभा से शोभायमान होता है॥ ६॥

35वे पुरुष बड़े भाग्यशाली हैं, जिन्हें गुरु अपनी सेवा में लगाता है।

36वे दिन-रात प्रभु-भक्ति में प्रवृत्त रहते हैं और सत्य नाम को बसाकर रखते हैं।

37प्रभु-नाम के माध्यम से समूचे कुल का उद्धार हो जाता है॥ ७॥

38नानक सत्य का विचार कहता है कि

39भगवान का नाम अपने हृदय में बसाकर रख।

40हरि की भक्ति में मग्न होने से मोक्ष द्वार प्राप्त हो जाता है॥ ८ ॥ २॥ २४॥

41आसा महला ३ ॥

42हर कोई इन्सान आशा एवं इच्छा ही करता रहता है लेकिन

43जो प्रभु के हुक्म को बूझ लेता है, वह इच्छा रहित हो जाता है।

44बहुत सारे लोग आशा में सोए हुए हैं।

45वही प्राणी जागता है, जिसे प्रभु स्वयं जगाता है॥ १॥

46सतिगुरु ने नाम का भेद बताया है। नाम के बिना भूख दूर नहीं होती।

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं