गुरु ग्रंथ साहिब 419 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1योगी, भोगी एवं फटे-पुराने वस्त्र पहनने वाले फकीर निरर्थक ही परदेसों में भटकते रहते हैं।
2वह गुरु के शब्द एवं निरन्तर श्रेष्ठ सच्चाई को नहीं खोजते ॥ ३ ॥
3पण्डित, प्रचारक एवं ज्योतिषी नित्यही पुराण इत्यादि ग्रंथों को पढ़ते हैं।
4लेकिन वह अन्तर में नाम वस्तु को नहीं पहचानते, परब्रह्म हृदय में छिपा हुआ है॥ ४॥
5कई तपस्वी वनों में तपस्या करते हैं और कई नित्य ही तीथों पर निवास करते हैं।
6वह तामसी पुरुष अपने आत्मस्वरूप को नहीं समझते, वह किसके लिए विरक्त हुए हैं ? ॥ ५॥
7कई प्रयास करके वीर्य को संयमित करते हैं, इस प्रकार वे ब्रह्मचारी कहलाए जाते हैं।
8लेकिन फिर भी गुरु के शब्द बिना उनकी मुक्ति नहीं होती और भ्रम में पड़कर जन्म-मरण के चक्र में पड़े रहते हैं।॥ ६॥
9कई गृहस्थी, प्रभु के सेवक, साधक हैं और वह गुरु की मति अनुसार चलते हैं।
10वह नाम, दान, स्नान को सुदृढ़ करते हैं और प्रभु की भक्ति में सचेत रहते हैं।॥ ७॥
11गुरु के माध्यम से ही प्रभु का घर-द्वार जाना जाता है और मनुष्य उस स्थान को पहचान लेता है
12हे नानक ! उसे प्रभु का नाम कभी नहीं भूलता, उसका मन सत्य की स्मृति में रम गया है ॥८॥१४॥
13आसा महला १ ॥
14अपनी इच्छाओं को मन में ही नियंत्रित करके सत्य द्वारा भवसागर से पार हआ जा सकता है।
15हे ठाकुर ! तू जगत के आदि युगों-युगान्तरों से ही सब पर दयालु है और मैं तेरी ही शरण में आया हूँ॥ १॥
16तू दाता है और मैं तेरे दर का भिखारी हूँ। हे हरि ! मुझे दर्शन देकर कृतार्थ करो।
17गुरु के माध्यम से नाम का ध्यान करने से मन-मन्दिर हरि-नाम से भीग जाता है।॥ १॥ रहाउ॥
18जब मनुष्य झूठे लालच को छोड़ देता है तो वह सत्य को पहचान लेता है।
19गुरु के शब्द में समाया हुआ वह जीवन के परमार्थ को समझ लेता है॥ २॥
20यह लोभी मन शरीर रूपी नगरी का बादशाह है जो सदैव लोभ में आकर्षित हुआ (मोहिनी का) लोभ करता है।
21गुरु के माध्यम से लोभ दूर हो जाता है और मनुष्य का प्रभु से प्रेम बन जाता है॥ ३॥
22बंजर भूमि में फसल बीज कर मनुष्य कैसे लाभ प्राप्त कर सकता है?
23मनमुख सत्य से खुश नहीं होता। ऐसा झूठा मनुष्य झूठ में फँसा रहता है। ४॥
24हे अन्धे जीवो ! मोहिनी का लालच त्याग दो अन्यथा लालच का भारी दु:ख सहना पड़ेगा।
25यदि सत्यस्वरूप साहिब मन में बस जाए तो अहंकार का विष निवृत्त हो जाता है॥ ५॥
26हे मेरे भाई ! दुविधा के कुमार्ग को त्याग दो अन्यथा लूटे जाओगे।
27दिन-रात गुरु की शरण में नाम का स्तुतिगान करो ॥ ६ ॥
28मनमुख (का हृदय) एक पत्थर एवं चट्टान है और उसका जीवन धिक्कार योग्य एवं नीरस है।
29पत्थर को कितनी ही देर तक पानी में रखा जाए तो भी अभ्यंतर से सूखा ही रहता है।॥ ७ ॥
30पूर्ण गुरु ने मुझे हरि का नाम दिया है, जो गुणों का भण्डार है।
31हे नानक ! जिस व्यक्ति ने नाम रूपी अमृत को मंथन करके पी लिया है, वह नाम को कभी भी नहीं भूलता॥॥ ८॥१५॥
32आसा महला १ ॥
33जीव रूपी मुसाफिर सद्मार्ग से विचलित होकर कुमार्ग पर चल रहे हैं।
34यह नश्वर संसार सांसारिक धन्धों में लीन है और सत्य से स्नेह नहीं करता ॥ १॥
35जिस व्यक्ति को गुरु-शब्द ने सत्य (परमात्मा) दिखा दिया है, फिर वह इधर-उधर क्यों भटकता फिरे और क्यों खोज-तलाश करे।
36अब वह ममता एवं मोह को त्याग कर अपने घर (प्रभु के पास) आ गया है॥ १॥ रहाउ॥
37सत्यवादियों को ही सत्य (प्रभु) मिलता है। झूठ से यह पाया नहीं जाता।
38सत्य के साथ चित्त लगाने से मनुष्य दोबारा जगत में नहीं आता॥ २॥
39हे बन्धु ! तुम मृतक संबंधी हेतु क्यों रोते हो ? तुम्हें यथार्थ तौर पर रोना ही नहीं आता।
40सत्यस्वरूप प्रभु की सराहना करते हुए प्रेम में विलाप करो और उसके हुक्म को पहचानो ॥ ३॥
41जिसके भाग्य में भगवान ने नाम के निर्वाह की प्राप्ति लिखी है, उसका आगमन सफल है।
42उसके हुक्म को अनुभव करने से प्राणी लाभ प्राप्त कर लेता है॥ ४॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं