गुरु ग्रंथ साहिब 418 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1मुगलों ने पठानों के घर, सुख के निवास एवं मजबूत महल जला दिए और टुकड़े-टुकड़े किए हुए शहजादों को मिट्टी में मिला दिया।
2कोई मुगल अन्धा न हुआ और किसी ने भी कोई करामात नहीं दिखाई॥ ४॥
3मुगलों एवं पठानों के बीच भयंकर लड़ाई हुई और रणभूमि में खूब तलवार चलाई गई।
4मुगलों ने अपनी बन्दूकों के निशाने लगा-लगाकर गोलियाँ चलाई और उन पठानों ने हाथियों से आक्रमण किया!
5हे भाई ! प्रभु के दरबार से जिनकी आयु की चिट्टी फाड़ दी जाती है, उन्हें अवश्य ही मरना पड़ता है॥ ५॥
6क्या हिन्दू नारियाँ, क्या मुसलमान औरतें, क्या भाटों एवं ठाकुरों की स्त्रियाँ-
7कितनी ही औरतों के वस्त्र सिर से पैरों तक फटे हुए थे और कितनी ही औरतों का निवास श्मशान में हो गया था।
8जिनके सुन्दर पति घरों में नहीं आए, उनकी रात्रि कैसे बीती होगी॥ ६॥
9यह दर्द भरी दास्तान किसे कहकर सुनाई जाए ? क्योंकि कर्ता प्रभु स्वयं ही करता और जीवों से करवाता है।
10हे जग के रचयिता ! जीवों को दुख-सुख तेरी रज़ा में ही होता है। तेरे सिवाय किसके पास जाकर अपना दुःख रोएं।
11हे नानक ! अपने हुक्म का स्वामी परमात्मा अपने हुक्म में ही दुनिया का कार्य चलाता है और प्रसन्न होता है। इन्सान अपनी तकदीर में लिखे लेख अनुसार ही दु:ख सुख भोगता है॥ ७॥ १२॥
12ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।
13आसा काफी महला १ घरु ८ असटपदीआ ॥
14जिस प्रकार ग्वाला चरागाह में अल्प समय के लिए पशु लेकर आता है, वैसे ही इन्सान थोड़े समय के लिए संसार में आता है।
15आदमी झूठ की कमाई करते हैं और अपना घर-द्वार निर्मित करते हैं।॥ १॥
16हे अज्ञानता की निद्रा में सोए हुए जीवो ! जागो, देखो कि वणजारा जीव दुनिया में से जा रहा है॥ १॥ रहाउ ॥
17हमेशा रहने वाले घर तभी बनाने चाहिए, यदि दुनिया में सदैव जीवित रहना हो।
18परन्तु यदि कोई विचार करे तो उसे ज्ञान हो जाएगा कि जब आत्मा चली जाती है तो शरीर भी पार्थिव हो जाता है॥ २॥
19तुम क्यों क्यों हाय ! हाय !! करते हो। आत्मा तो अब भी है और सदैव रहेगी।
20यदि तुम किसी की मृत्यु पर रोते हो तो तुम्हें कौन रोएगा ॥ ३॥
21हे मेरे भाई ! तुम लोग सांसारिक धन्धों में ग्रस्त हुए हो और झूठ की कमाई करते हो।
22वह मृतक बिल्कुल नहीं सुनता। तुम केवल दूसरे लोगों को ही अपना रोना सुनाते हो।॥ ४॥
23हे नानक ! जिस मालिक ने अपने हुक्म से उसे सुलाया है, वही उसे जगाएगा।
24यदि मनुष्य अपने असली घर को समझ ले उसे नींद नहीं आती॥ ५॥
25यदि परलोक को जाता हुआ मनुष्य कुछ संपति साथ ले गया है
26तो तू भी धन संचित करके देख, सोच-समझ और विचार कर॥ ६॥
27ऐसा नाम का व्यापार कर जिससे जीवन-मनोरथ का लाभ प्राप्त हो सके, अन्यथा पछताना पड़ेगा।
28अवगुण छोड़कर गुण ग्रहण करो, इस तरह तुझे सच्ची कमाई प्राप्त होगी॥ ७॥
29शरीर रूपी धर्मभूमि में सत्य का बीज बोओ। इस प्रकार की कृषि करो।
30यदि तुम लाभ प्राप्त करके ले जाओगे तो बुद्धिमान व्यापारी समझे जाओगे॥ ८॥
31यदि प्रभु की मेहर हो तो जीव सतिगुरु से मिलता है और उसके उपदेश को समझता है।
32वह नाम उच्चरित करता है, नाम सुनता एवं नाम का ही व्यापार करता है॥ ६॥
33जैसे नाम सुनने से लाभ है, वैसे ही नाम भुलाने से नुक्सान है। संसार की यह मर्यादा सदा से ही चली आ रही है।
34हे नानक ! ईश्वर को जो कुछ भला लगता है वही होता है, यही उसकी महिमा है॥ १०॥ १३॥
35आसा महला १ ॥
36मैंने चारों दिशाओं में खोज की है परन्तु मेरा कोई भी हितैषी नहीं है।
37हे मेरे मालिक ! यदि तुझे अच्छा लगे तो तू मेरा रखवाला है और मैं तेरा सेवक हूँ॥ १॥
38मेरे लिए तेरे बिना दूसरा कोई शरण-द्वार नहीं है, मैं किसे वन्दना करूँ ?
39तू ही मेरा स्वामी है, तेरा सत्य नाम मेरे मुँह में हमेशा रहता है॥ १॥ रहाउ ॥
40कुछ लोग सिद्धों एवं पीरों की सेवा करते हैं और उनसे ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ मॉगते हैं।
41मुझे एक परमात्मा का नाम न भूले, सतिगुरु ने मुझे यह सुमति प्रदान की है॥ २ ॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं