गुरु ग्रंथ साहिब 413 · Raag Aasaa · Guru Nanak Dev Ji
1जिसे गुरु-पीर मिल जाता है, वह सदा सुख भोगता है।
2एक परमात्मा ही दुनिया का बादशाह है और खुद ही अपना एक वजीर है॥ ५ ॥
3यह समूचा जगत मोह-माया की कैद में है। जो अपना अभिमान मिटा देता है, वह मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
4जगत में कोई विरला ही ज्ञानी है, जिसका आचरण उस ज्ञान के अनुसार है।
5जगत में पण्डित भी कोई विरला है, जो सही विचारक है।
6सतिगुरु को मिले बिना सभी अहंकार में भटकते हैं।॥ ६॥
7जगत दुखी है परन्तु कोई विरला पुरुष ही सुखी है।
8जगत भोगी होने के कारण रोगी है और अपने गुणों को गंवा कर रोता है।
9जगत जन्मता है और अपनी प्रतिष्ठा गंवा कर यह मर जाता है।
10जो गुरुमुख बन जाता है, वह इस तथ्य को समझ लेता है।७॥
11प्रभु मूल्य में महंगा एवं भार में अनन्त है।
12हे प्राणी ! गुरु की मति से अटल एवं अछल प्रभु को अपने हृदय में धारण कर।
13प्रेम द्वारा मनुष्य उससे मिल जाता है जो प्रभु के भय में कार्य करता है, वह उसे अच्छा लगने लग जाता है।
14नानक यही विचारणीय बात कहता है॥ ८ ॥ ३ ॥
15आसा महला १ ॥
16जब एक मरता है तो पाँचों संबंधी मिलकर रोते हैं।
17यह अहंत्व की मैल तब दूर होती है, जब इन्सान यह मैल शब्द द्वारा शुद्ध कर लेता है।
18जो इस तथ्य को समझता है वह सहज घर में प्रवेश कर जाता है।
19ज्ञान के बिना मनुष्य सारी प्रतिष्ठा गंवा लेता है॥ १॥
20कौन मरता है और कौन उसे रोता है।
21हे प्रभु ! एक तू ही जग का रचयिता है, तेरा हुक्म सबके सिर पर है॥ १॥ रहाउ॥
22यदि कोई मृतक को रोता है, वह वास्तव में दुख व्यक्त करता है।
23केवल रोता वही है जिस पर विपदा आ जाती है।
24जिसके साथ बीतती है, उसकी दशा वह प्रभु ही जानता है।
25जो कुछ कर्ता प्रभु स्वयं करता है, वही कुछ होता है॥ २॥
26अहंकार को मारकर जीना ही भवसागर से पार करने के लिए एक नाव का काम करता है।
27उस जगदीश की जय करो, जिसकी शरण लेने से परमगति प्राप्त होती है।
28मैं सतिगुरु के चरणों पर बलिहारी जाता हूँ।
29गुरु जहाज है और उसके शब्द द्वारा भयानक संसार सागर से पार हुआ जा सकता है॥ ३॥
30प्रभु स्वयं निर्भय है और उसकी ज्योति सबमें विद्यमान रहती है।
31नाम के बिना संसार में कहीं सूतक एवं कहीं छूत का वहम है।
32दुर्बुद्धि से मनुष्य नष्ट हो गया है इसलिए वह क्यों पुकार करता रोता है ?
33प्रभु-भक्ति एवं भजन सुने बिना मनुष्य जन्म-मरण के चक्र में फँसकर आता-जाता रहता है।॥ ४ ॥
34मरे हुए को असल में सच्चे मित्र ही रोते हैं।
35तीन गुणों (रजो, सतो, तमो) वाले मनुष्य सदैव ही रोते रहते हैं।
36दुख-सुख को त्याग कर अपने हृदय में प्रभु को धारण करो।
37अपना तन-मन भगवान के प्रेम में समर्पित कर दो ॥ ५॥
38अनेक प्रकार के असंख्य ही जीव हैं पर सबके भीतर एक परमात्मा ही बसता है।
39बहुत सारे कर्म धर्म हैं, जिनकी संख्या असंख्य है।
40प्रभु के भय एवं भक्ति के बिना मनुष्य जन्म निरर्थक है।
41हरि का गुणगान करने से परमार्थ मिल जाता है।॥ ६॥
42किसी प्राणी की मृत्यु में मानो वही मरता है और उस प्राणी को प्रभु ही मारता है।
43प्रभु स्वयं पैदा करता है और पैदा करके वह स्वयं ही नाश कर देता है।
44हे ज्योतिस्वरूप भगवान ! तूने स्वयं ही सृष्टि की रचना की है और स्वयं ही अपनी ज्योति स्थापित कर दी है।
45जो शब्द का चिन्तन करता है, वह प्रभु से मिल जाता है, इसमें कोई भ्रांति नहीं ॥ ७॥
46अग्नि में भी सूतक है, जब अग्नि भड़कती है तो वह जगत को भस्म कर देती है।
47जल, धरती हर कहीं सूतक विद्यमान है।
48हे नानक ! सूतक में प्राणी जन्मते-मरते रहते हैं,
49गुरु की कृपा से हरि रस का पान करते रहना चाहिए॥८॥ ४॥
50रागु आसा महला १ ॥
51जो मनुष्य आप विचार करता है वह नाम रूपी हीरे की परख कर लेता है।
52पूर्ण गुरु अपनी एक कृपादृष्टि से ही मनुष्य का (संसार सागर से) उद्धार कर देता है।
53जो इन्सान सच्चे दिल से गुरु पर श्रद्धा धारण करता है, उसका मन चंचल नहीं होता ॥ १॥
54गुरु ऐसा साहुकार है जो अपने शिष्यों को परखता है।
55उसकी अचूक दयादृष्टि से मनुष्य को प्रभु-प्रेम की देन मिल जाती है और उसका उद्धार हो जाता है॥ १॥ रहाउ॥
56निरंजन प्रभु के नाम की राशि-पूंजी सर्वोत्तम है।
57जो सत्य से रंगा हुआ है, वह महापुरुष पवित्र है।
58उसकी प्रशंसा गान करने से वह गुरु-कर्तार को सहज ही अपने हृदय-घर में बसा लेता है॥ २॥
59जो अपनी आशा एवं तृष्णा को शब्द द्वारा जला देता है,
60वह राम-नारायण के नाम का स्वयं भजन करता है और दूसरों से भी भजन करवाता है।
61वह गुरु के माध्यम से प्रभु के महल एवं घर का मार्ग खोज लेता है॥ ३॥
WEBREATH · 11:11
«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208
श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।
WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं