सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 410 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1वह अलख एवं भेद-रहित है।

2उसके साथ तू अपना प्रेम लगा।

3उसका कभी नाश नहीं होता और वह जन्म-मरण से रहित है।

4नानक का कथन है कि हे मन ! गुरु के माध्यम से ही प्रभु जाना जाता है।

5प्रभु के साथ मेरा मन संतुष्ट हो गया है॥२॥३॥१५९॥

6आसावरी महला ५ ॥

7हे मेरे मन ! एक ईश्वर की ओट लो,

8सदैव गुरु का शब्द उच्चारण करो।

9भगवान की आज्ञा को सत्य मानकर सहर्ष स्वीकार करो।

10अपने मन में मौजूद नाम के भण्डार को प्राप्त करो।

11इस तरह तुम सहज सुख में समाहित हो जाओगे॥ १॥ रहाउ॥

12हे मेरे मन ! जो व्यक्ति सांसारिक कार्य करता हुआ मोह-माया से निर्लिप्त रहता है,

13वह भयानक संसार सागर से पार हो जाता है।

14जो सबकी चरण-धूलि हो जाता है,

15तू उसे ही निर्भय कह।

16तमाम फिक्र मिट जाते हैं

17संतों के उपदेश से, हे मेरे मन !।॥ १॥

18हे मेरे मन ! जिस मनुष्य के पास प्रभु नाम का सुख है,

19उसके पास कोई दुख नहीं आता।

20जो मनुष्य परमात्मा का यशोगान सुनते हैं,

21दुनिया के सभी लोग उसका मान-सन्मान करते हैं।

22नानक का कथन है कि हे मेरे मन ! इस संसार में उसका आगमन सफल है,

23जो प्रभु को अच्छा लगता है॥ २॥ ४ ॥ १६० ॥

24आसावरी महला ५ ॥

25आओ हम मिलकर हरि का यशोगान करें

26एवं परम पद प्राप्त करें।

27जो इस रस को पाते हैं वे

28समस्त ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ प्राप्त कर लेते हैं।

29जो इन्सान रात-दिन (विकारों से) सचेत रहता है,

30नानक का कथन है कि, हे मेरे मन ! वह बड़ा भाग्यशाली है॥ १॥ रहाउ॥

31आओ, इम मिलकर संतों के चरण धोएं और

32अपनी दुर्मति को शुद्ध करें।

33प्रभु के सेवकों की चरण-धूलि होने से

34मनुष्य को कोई दु:ख नहीं सताता।

35भक्तजनों की शरण लेने से

36मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

37वे स्थिर हो जाते हैं

38हे मेरे मन ! जो मनुष्य हरि-नाम का जाप करते हैं ।॥ १॥

39हे पूज्य परमेश्वर ! तू ही मेरा साजन एवं मित्र है।

40मेरे मन में अपना नाम बसा दो।

41उसके अलावा दूसरा कोई नहीं।

42इसलिए अपने मन में मैं उसकी आराधना करता हूँ।

43एक निमिष मात्र भी मैं उसे विस्मृत नहीं करता।

44उसके अतिरिक्त मेरा किस तरह निर्वाह हो सकता है ?

45में अपने गुरु पर कुर्बान जाता हूँ।

46हे मेरे मन ! नानक तो परमात्मा का नाम ही जंपता रहता है। ॥२॥५॥१६१॥

47आसावरी महला ५ ॥

48हे प्रभु ! एक तू ही जग का रचयिता है,

49तेरे सिवाय मुझे अन्य कोई नहीं सूझता।

50जो कुछ तू दुनिया में करता है, वही होता है।

51मैं इसलिए सहज सुख में सोता हूँ।

52मेरे मन में धैर्य हो गया है

53हे मेरे मन ! जब से मैंने प्रभु के द्वार की शरण ली है ॥ १॥ रहाउ ॥

54मैं साधुओं की संगति से जुड़ गया हूँ,

55मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ पूर्णतया मेरे वश में हैं।

56जब से मैंने अहंत्व से छुटकारा पा लिया है,

57तब से मेरे दुःख-संताप मिट गए हैं।

58हे मेरे मन ! प्रभु ने मुझ पर कृपा की है।

59हे जग के मालिक ! मुझ शरण में आए की लाज रखो॥ १॥

60केवल उसे ही सुख समझना चाहिए,

61हे मेरे मन ! भगवान जो कुछ करता है, उसे सहर्ष मानना चाहिए ।

62दुनिया में कोई भी मनुष्य बुरा नहीं।

63मैं संतों की चरण-धूलि बन गया हूँ।

64हे मेरे मन ! जिस व्यक्ति की परमात्मा खुद रक्षा करता है,

65वही हरि नाम रूपी अमृत चखता है॥ २॥

66जिस मनुष्य का कोई नहीं,

67उसका वह प्रभु है।

68प्रभु सबके अन्तर्मन की अवस्था को समझता है।

69वह तमाम बातों को जानता है।

70हे मेरे मन ! ईश्वर के दरबार में यू वन्दना कर - हे प्रभु ! पतितों का उद्धार करो,

71नानक की यही वन्दना है॥ ३॥ ६ ॥ १६२॥

72आसावरी महला ५ इकतुका ॥

73हे जीव ! इस दुनिया में तू परदेसी है,

74यह सन्देश ध्यानपूर्वक सुन ॥ १॥ रहाउ ॥

75जिस माया के साथ तुम मोहित हुए हो,

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं