सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 40 · Siree Raag · Guru Raam Daas Ji

1हजार चतुराईयों का प्रयोग करके प्राणी असफल हो गए हैं। उनके कोरे मन पर ईश्वर के प्रेम का रंग धारण नहीं हुआ।

2झूठ एवं छल-कपट का प्रयोग करके कोई भी प्राणी परमेश्वर को नहीं पा सकता। प्राणी जैसे बीज बोता है वैसा ही फल उसे प्राप्त होता है॥ ३॥

3हे पारब्रह्म ! इस जगत् के समस्त प्राणी तुम्हारे ही हैं, उन जीवों की समस्त पूँजी तुम ही हो और तुम्हीं से उनकी आशा-उम्मीद हैं।

4हे अकालपुरुष ! तेरी शरण में आने वाला प्राणी कदापि खाली हाथ नहीं जाता, तुम कृपालु एवं दयालु हो। तेरे दर में आने वाला गुरमुख प्रशस्ति का अधिकारी बन जाता है।

5गुरु जी वचन करते हैं कि हे परमेश्वर ! मेरी सादर विनती है कि मनुष्य पापों के भयानक समुद्र के भीतर डूब रहे हैं, इनकी रक्षा करो। हे प्रभु ! जगत् के जीवों को भवसागर में डूबने से बचा लो॥ ४॥ १॥ ६५॥

6श्रीरागु महला ੪ ॥

7भगवान का नाम मिलने से मन तृप्त हो जाता है लेकिन नामविहीन मनुष्य का जीवन धिक्कार योग्य है।

8इस बारे गुरु जी उत्तर देते हैं कि यदि सतिगुरु से मिलन हो जाए तो वही मुझे गुणनिधान ईश्वर के बारे में ज्ञान प्रदान करे।

9जो मुझे नाम का आलोक दे मैं उस पर चार टुकड़े होकर कुर्बान जाऊँ ॥ १॥

10हे मेरे प्रियतम प्रभु! नाम-सिमरन से ही मेरा यह समूचा जीवन है।

11नाम के बिना मनुष्य जीवन व्यर्थ है। इसलिए हे मेरे सतिगुरु ! मुझ पर प्रभु के नाम का रहस्य दृढ़ करवा दो॥ १॥ रहाउ॥

12भगवान का नाम अमूल्य रत्न है, जो सतिगुरु के पास विद्यमान है।

13सतिगुरु वह उज्ज्वल नाम रूपी रत्न निकाल कर प्रकाशमान कर देते है, जो उनकी श्रद्धापूर्वक सेवा करता है।

14भाग्यवानों में भी सौभाग्यशाली वे धन्य हैं, जो गुरु के पास आकर उनसे मिलते हैं और नाम रूपी उस खजाने को प्राप्त कर लेते हैं ॥२॥

15जो प्राणी सतिगुरु महापुरुष के मिलन से वंचित हैं, वे भाग्यहीन काल (मृत्यु) के अधीन हैं।

16ऐसे प्राणी पुनः पुनः जन्म-मरण के चक्कर में पड़कर विभिन्न योनियों में भटकते रहते हैं। ऐसे प्राणी मलिनता के भयानक कीट बने पड़े हैं।

17उनके समीप आकर छूना भी नहीं चाहिए, क्योंकि हृदय के भीतर दुश्वृतियाँ पनपती हैं॥ ३॥

18महापुरुष सतिगुरु अमृत के सरोवर हैं, जहाँ पर भाग्यशाली इसमें आकर स्नान करते हैं। अर्थात् उनकी कृपा-दृष्टि से कृपा-पात्र बनते हैं।

19उनकी जन्म-जन्मांतर की मलिनता धुल जाती है और उनके भीतर पवित्र नाम सुदृढ़ हो जाता है।

20गुरु जी कहते हैं कि हे नानक ! सतिगुरु की ओर सुरति लगाने से (गुरु-भक्तों को) परम पद की प्राप्ति होती हे॥ ४॥ २॥ ६६॥

21श्रीरागु महला ੪ ॥

22हे मेरी माता ! मैं तो उस पारब्रह्म का ही यश गान करता हूँ उसकी प्रशंसा में प्रत्यक्ष करता हूँ और उनके गुणों की व्याख्या करता हूँ।

23प्रभु प्रेमी गुरमुख परोपकारी एवं गुणों के भण्डार हैं, उनसे मिलकर मैं पारब्रह्म का यश-कीर्ति करता हूँ।

24गुरु रूपी रत्न से मिलकर मेरा ह्रदय बंध गया है और हरिनाम से गहन लाल वर्ण रंग गया है॥ १॥

25हे मेरे गोविन्द ! तेरा गुण-गान करने से मेरा मन तृप्त हो गया है।

26मेरे हृदय के भीतर तेरे नाम की तृष्णा है। परमात्मा कृपा-दृष्टि करे तो गुरु जी हर्षित होकर वह नाम (प्रभु) मुझे प्रदान करें ॥ १॥ रहाउ॥

27हे प्राणी ! अपने हृदय को प्रभु के प्रेम से रंग लो । हे सौभाग्यशालियो ! गुरु जी आपकी सेवा भावना से प्रसन्न होकर आपको अपनी दातें प्रदान करेंगे।

28मैं उस सतगुरु पर बलिहार जाता हूँ, जो मेरे भीतर हरि नाम को प्रीत से दृढ़ करते हैं।

29सतिगुरु के बिना अकालपुरुष का नाम प्राप्त नहीं होता। चाहे प्राणी लाखों करोड़ों कर्मकाण्ड संस्कार इत्यादि करता रहे, उसे ईश्वर प्राप्त नहीं होता ॥ २॥

30प्राणी को भाग्य के बिना सच्चा गुरु प्राप्त नहीं होता चाहे वह गृह में सदा इसके निकट एवं पास ही बैठा है।

31मनुष्य के भीतर मूर्खता एवं संदेह की पीड़ा ने वास किया हुआ है। मनुष्य एवं परमात्मा के बीच अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ है। जब अज्ञान निवृत्त हो तो ज्ञान के उजाले से मनुष्य एवं परमात्मा के बीच का पर्दा निवृत्त हो जाता है।

32सतिगुरु के मिलन के बिना प्राणी स्वर्णमय नहीं होता। अपितु अधर्मों लोहे की भाँति डूब जाता है, जबकि नाव इतनी करीब ही हो ॥ ३॥

33सतिगुरु जी हरि-नाम रूपी जहाज है, किस विधि द्वारा उस पर सवार हुआ जा सकता है ?

34गुरु जी कथन करते हैं कि जो सतिगुरु की आज्ञानुसार चलता है, वह हरि नाम रूपी जहाज में बैठ जाता है।

35हे नानक ! वे व्यक्ति धन्य-धन्य एवं भाग्यवान हैं जिनको सतिगुरु जी अपने साथ मिला कर परमात्मा से मिलन करवाते हैं॥ ४ ॥ ३॥ ६७ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं