सिख धर्म
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गुरु ग्रंथ साहिब 408 · Raag Aasaa · Guru Arjan Dev Ji

1अपना यह मन प्रभु के समक्ष अर्पण करने से ही उससे मिला जा सकता है।

2नानक का कथन है कि हे प्रभु जी ! अपनी दया करो ताकि मुझे तेरा नाम मिल जाए॥२॥१॥१५०॥

3आसा महला ५ ॥

4हे मेरे प्यारे राम ! मुझे आकर मिलो, तेरे सिवाय मुझे कोई धैर्य नहीं दे सकता ॥ १॥ रहाउ॥

5हे प्रभु! जिन लोगों ने स्मृतियाँ एवं शास्त्र पढ़े हैं और बहुत धर्म-कर्म किए हैं, उन्हें भी तेरे दर्शनों के बिना कोई सुख उपलब्ध नहीं हुआ ॥ १॥

6मनुष्य व्रत, संकल्प, संयम करते हुए थक गए हैं। हे नानक ! साधुओं की शरण में जाने से ही इन्सान प्रभु के साथ जा बसता है॥२॥२॥१५१॥

7आसा महला ५ घरु १५ पड़ताल

8ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।

9मनुष्य विकारों एवं माया के नशे में सोया हुआ है और उसे कोई सूझबूझ नहीं आती।

10जब यमदूत उसे बालों से पकड़ कर उठाता है तो तभी उसे अपने असल घर की होश आती है॥ १॥

11जो मनुष्य लोभ एवं विषय-विकारों के विष से लगा हुआ है, वह पराया धन चुराकर दूसरों के दिल को दुखाते हैं।

12एक क्षण में नाश होने वाले माया के नशे में असुर मस्त हुए हैं परन्तु प्रभु को नहीं जानते॥ १॥ रहाउ॥

13वेद, शास्त्र एवं संतजन पुकार-पुकार कर उपदेश करते हैं परन्तु माया के नशे के कारण बहरा मनुष्य सुनता ही नहीं।

14जब जीवन की बाजी खत्म हो जाती है और इसे हार कर वह मर जाता है तो मूर्ख मनुष्य अपने मन में पश्चाताप करता है॥ २॥

15सारा दण्ड उसने बिना कारण के ही भरा है। प्रभु के दरबार में यह स्वीकृत नहीं हुआ।

16जिस कर्म से उसके पापों पर पर्दा पड़ना था, वह कर्म उसने किया ही नहीं ॥ ३॥

17जब गुरु ने मुझे ऐसा जगत दिखा दिया तो मैं एक ईश्वर का ही भजन-कीर्तन करने लग गया।

18अपने गर्व एवं बल का अभिमान छोड़कर नानक ने प्रभु की शरण ली है॥ ४॥ १॥ १५२॥

19आसा महला ५ ॥

20मैं गोविंद के नाम का व्यापार करता हूँ।

21मैंने साधु-संतों को मना लिया है अर्थात् प्रसन्न कर लिया है और अपने प्रिय-प्रभु को पा लिया है। मैं भगवान के गुण गाता रहता हूँ और मेरे मन में पाँच प्रकार के नाद गूंजते रहते हैं।॥ १॥ रहाउ॥

22जब मुझ पर प्रभु की कृपा हुई तो मुझे सहज ही उसके दर्शन प्राप्त हो गए और अब मैं गोविंद के प्रेम से रंगा हुआ हूँ।

23संतों की सेवा करने से मुझे अपने नाथ की प्रीति प्राप्त हो गई॥ १॥

24मैंने गुरु के ज्ञान को अपने मन में बसा लिया है और मैं प्रसन्न हूँ कि मैं आवागमन में नहीं आऊँगा, मैंने सहज ही नाम का भण्डार अपने मन में पा लिया है।

25मैंने अपने मन की सभी कामनाओं को छोड़ दिया है।

26बहुत देर हो गई है, जब से मेरे मन में प्रभु दर्शनों की बहुत प्यास लगी हुई है।

27हे हरि ! मुझे अपने दर्शन दीजिए, आप स्वयं ही मेरा मार्गदर्शन कीजिए।

28नानक का कथन है कि हम दीन तेरी शरण में आए हैं, हमें अपने गले से लगा लो ॥ २ ॥ २॥ १५३॥

29आसा महला ५ ॥

30कोई विरला पुरुष ही मोह-माया के विषम किले को ध्वस्त करता है

31और अपने मन को आशा, प्यास, छल, मोह एवं भ्रम से रोकता है॥ १॥ रहाउ॥

32काम, क्रोध, लोभ, अभिमान के इस रोग को कोई विरला ही दूर कर सकता है॥ १॥

33मैं संतों की संगति में मिलकर नाम-रंग में लीन होकर गोविंद के गुण गाता रहता हूँ।

34मैं हर रोज प्रभु का ध्यान करता रहता हूँ ताकि

35भ्रम की दीवार को जीतकर मिटा दूँ।

36हे नानक ! इस भ्रम की दीवार को तोड़ने के पश्चात् नाम-निधि मेरी हो जाएगी ॥ २ ॥ ३॥ १५४॥

37आसा महला ५ ॥

38(हे भाई !) कामवासना, क्रोध एवं लालच को त्याग कर

39अपने मन में गोविन्द का नाम याद करते रहो।

40हरि का भजन करने से सारे कार्य सफल हो जाते हैं। १ ॥ रहाउ ॥

स्रोत: Sri Guru Granth Sahib · BaniDB

WEBREATH · 11:11

«हे ईश्वर, तुम ही जीवन की श्वास के आधार हो» — गुरु ग्रंथ साहिब 208

श्वास सबकी एक है: हर कोई इसी से जीता है, चाहे वह कोई भी हो और किसी में भी आस्था रखता हो। हर दिन स्थानीय समय 11:11 पर लोग साठ सेकंड के लिए रुकते हैं, साँस लेते हैं और साँस के लिए ईश्वर को धन्यवाद देते हैं — हर कोई अपने शब्दों में, हर कोई अपने भीतर। इस मिनट में हम एक ही श्वास हैं।

WEBREATH — आपके स्थानीय समय 11:11 पर मिनट — हम एक ही श्वास हैं